पंडितजी की रचनाओं की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इन्हे पढ़कर ऐसी अनुभूति होती है मानों स्वयं ईश्वर के साथ साक्षात्कार हो गया हो...
सनातन धर्म की जड़ों को मजबूत करने में पंडितजी का योगदान अतुलनीय रहा है और अनेक सभाओं में उन्होने सनातन ध्वज को बुलंद किया है जिसका प्रमाण उनकी रचनाओं से मिलता है ।...
पंडित रतिराम जी
श्रीमती रुक्मणि देवी
03 दिसंबर 1869, मार्गशीर्ष, कृष्ण पक्ष, अमावस्या, वार शुक्रवार, संवत 1926
दोहा –
चार बेद छः शास्त्र में, कुल बात लिखी हैं दोय ।
क्या तो मुख से हरिभजन, क्या धर्म हाथ से होय ॥
अब तो सोच समझ कै चाल
गलती में जो कुछ बनी सो बनी ॥ टेक ।
चोरी जारी बदमाशी की कहीं नहीं चटसाल
बिना पढ़ाये आपै सारी पढ़ ग....
भतेरा सो लिया रे अब तो जाग मुसाफिर जाग ॥ टेक ।
पहले तो माता के गर्भ में सोया नो दस मास
जाग्या नहीं जगावनिया कोई था ना तेरै पास 1॥
फिर सोया माता की गोद में कभी बगल के मांह
कभी पालने कभी छाती पै जद भी जाग्या नांह 2॥
फिर सो....
अबतो जाग मुसाफिर जाग
बहतेरे दिन सो लिया रे ॥ टेक ।
क्या सोवै सुख नींद मुसाफिर वन में लग रही आग
आला सूखा सब जलता आवै इस निद्रा कूं त्याग
सोया उन सब कुछ खो लिया रे 1॥
इस वन मे हैं चोर घनेरे तेरे धन पै साज रही लाग
जो कुछ त....
प्रभु जी थारी अलख अगोचर माया ॥ टेक ।
मकड़ी नै नाभि से सूत उगलकर जाल बनाया
थोड़ी देर में उल्टा ग्रस गई क्या उसके हाथ आया 1॥
बालक नै घर घुल्ला रच रच नया नया खेल रचाया.
खेल खेल करी खेल बिझानी रेत में रेत मिलाया 2॥
जल मे लहर ....
प्रभु जी थारी माया अगम अपार ॥ टेक ।
धरती अंबर चाँद और सूरज रच दिये बेसुम्मार
अग्न पवन समंदर वन पर्वत रचे हजारों हजार 1॥
लख चौरासी जीवाजून रची अलग अलग व्यवहार
कीड़ी को कण हाथी को मण निस दिन देत आहार 2॥
पता ना चलता किस क....
ज्योतिस्वरूप तेरी दे रही जौत दिखाई ॥ टेक ।
तेजरूप है सूरज में चंदा में शीतलताई
चमत्कार दामिनी चमक में नभ में श्यामता छाई
ज्योति स्वरूप तेरी .... 1॥
दहन अगन में महक धरण में पवन में वेग हवाई
फूल में महक मिठास फलों में पत....
दोहा –
भाषा में पद रचत है, कविजन शंकरदास ।
फिर भी क्यूं मरत है, जहां कैलाशी का बास ॥
जिसका तेरै विश्वास है
खुद उसी को काल चरै है ॥ टेक ।
त्रिशक्ति ब्रह्मा वेद प्रचारी
लक्ष्मीयुक्त विष्णु अवतारी
पार्वती तत सु त....
दोहा –
शंकरदास ने रच दिया, पद बुद्धि अनुसार ।
बिन मारे ही मर गए, हम उन मुर्दों के यार ॥
मरा सो किसका यार है
जीते जी की यारी है ॥ टेक ।
जीते जीव जन्म देह धारे
मरे सो गए दुनिया से प्यारे
जीते जी के बंधन सारे
जीते ....
दोहा –
जीव ब्रह्म की एकता, कहत विषय जन बुद्ध ।
तिनको जे अंतर लहै, ते मतिमंद अबुद्ध ॥
जीव ब्रह्म तो एक है
इच्छा का नाम माया है ॥ टेक ।
जल में लहर लहर में जल है
जल लहरों का एक स्थल है
आद अंत में एक नक़ल है
बीच में शक्ल अन....