कवि शिरोमणि पंडित महोरसिंह जी का जन्म 03 दिसंबर 1869, मार्गशीर्ष, कृष्ण पक्ष, तिथि अमावस्या, वार शुक्रवार, संवत 1926 को ग्राम साल्हावास, वर्तमान जिला झज्जर, हरियाणा में हुआ । उनके पिता का नाम पंडित रतिराम जी और माता का नाम श्रीमती रुक्मणि देवी है । पंडितजी का बचपन एक साधारण परिवार में बीता था । चूँकि पंडित जी तीक्ष्ण बुद्धि के धनी थे, अत: उनके पिताजी श्री रतिराम जी ने उनकी इस प्रतिभा को परखते हुए उन्हे प्राथमिक शिक्षा के लिये प्रदेश में ही स्थित ग्राम डीघल व बेरी, जिला रोहतक (तत्कालीन पंजाब) के गुरुकुलों में भेज दिया । फिर माध्यमिक शिक्षा चूरु (राज.) और रामगढ़ (राजस्थान) जाकर ग्रहण की । तत्पश्चात उन्होने भगवान भोलेनाथ की पावन नगरी ‘काशी’ (उत्तर प्रदेश) जाकर संस्कृत साहित्य (literature) विषय में उच्च शिक्षा में महारथ हासिल की । तदुपरांत उन्होंने सूरजगढ़ (राजस्थान) जाकर अपने गुरुजी श्री मुखराम जी के सानिध्य में 5 वर्ष तक संस्कृत व्याकरण शास्त्र की शिक्षा ली । जिसका प्रमाण उनकी स्व-लिखित कविता से मिलता है :-
सूरजगढ़ सूरजवंशी राजाओं की है रजधानी
श्री जयपुरजी माहाराज ताज सिर साज यहां का है बानी ॥
सूरजगढ़ में कायां सेठ हुये लालचंद जी बलदेवदास
इन ही की छतरी में मैंने पांच वर्ष किया विद्या अभ्यास
“मुखराम जी यहां अध्यापक थे मैं पढ़ा करता उनके पास”
उन दिनों सेठ ठाकरसी दास थे गुरु मुखरामजी थे परकाश
इसी वंश में जोखीराम जी प्रगट हुये थे महादानी 1॥
कविताई के लिए उपयोग में आने वाली मृदु शैली ‘पिंगल छंद शास्त्र’ का अध्ययन भी सूरजगढ़ (राजस्थान) जाकर अपने गुरुजी श्री मुखराम जी के सानिध्य में किया और अपनी सम्पूर्ण कविताई पिंगल छंद शैली मे ही की । इसका प्रमाण उनकी स्व-लिखित कविता से मिलता है : -
टेक : धरकै ध्यान अब सुनले प्यारे पिंगल के पद गाते हैं ,
साहित्यवृत्त श्रुतबोध ये पिंगल के अंग कहलाते हैं
अंतरा : ऊंचे स्वर वर्णों का उच्चारण उनकी संज्ञा बंधी उदात
नीचरैनुदात सम बत्या स्वरित स्वर वैदिकी में हैं विख्यात
वर्ण विवेक हुये बिन प्यारे पिंगल की नहीं हो खबरात
गुरु मुखराम पढ़ा गये हित से ‘पिंगल’ की मुझे सारी हिदात
महोरसिंह उन ही की कृपा से नित नये छंद बनाते हैं 4॥
काव्य और संगीत की शिक्षा उन्होने अपने पिता गुरु पंडित रतिराम जी से ली थी जिसका प्रमाण उनकी स्व-लिखित कविता से मिलता है : -
टेक : ले हल मूसल बलराम जी, बली भीम के सन्मुख आये ॥
अंतरा : कृष्ण के वचन मान हलधर शांत होय गये
कही सुनी माफ हुई रोष रंज दूर भये
पदबंदी छंद कथ ताल स्वर और लये
बताये पिता रतिराम जी, सुत महोर सिंह नै गाये 4॥
टेक : सती ल्याकर तेरे सामनै , उस पापी को मारूँगा ॥
अंतरा : चोटा जाय पकड़ा द्रोण पुत्र हो गया निराश
रस्सियों से बांध जूड़ ले आया रथ पास
सुत महोर सिंह को गायन विद्या का अभ्यास
करवाया पिता रतिराम नै, जन्म भर चरण चुचकारूंगा 4॥
वैसे तो पंडितजी संस्कृत सहित्य एवम् व्याकरण शास्त्र मे प्रवीण थे तथा उनका रुझान भी इसी विषय में था परंतु भाग्य को कुछ और ही मंज़ूर था । अत: उन्हें साहित्य के बजाए ज्योतिष, संगीत एवम् कविताई को अपनी आजीविका का मुख्य स्त्रोत बनाना पड़ा । इसके पीछे भी एक कहानी है जिसमें पंडित जी के भाव जुड़े हुए है । बताया जाता है कि एक समय पंडित रतिराम जी, जो कि आशुकवि थे, हरियाणा में अपने किसी कार्यक्रम में व्यस्त थे । उसी समय बाबा महोर सिंह जी अध्ययन पूरा कर घर आए और अपने पिताजी पंडित रतिराम जी से मिलने के लिए उनके पास चले गए । वहाँ जाने पर जब वहाँ के लोगों ने पंडित महोर सिंह जी के बारे में जाना कि वे साहित्य के विद्यार्थी हैं तब कुछ लोगों ने भाववश दुखित मन से कहा कि दादाजी अब आपकी इस विधा (गाने बजाने की कला) को भविष्य में सम्भालने वाला कोई नहीं रहेगा और यह कहकर द्विग्लित हो गए । बस यही बात बाबा महोर सिंह जी को विचलित कर गई और उन्होने संगीत विधा को अपना विशेष समय दिया और ज्योतिष शास्त्र को अपना आजीविका का मुख्य साधन बनाया ।
हरियाणा प्रदेश के अतिरिक्त अन्य अनेक प्रदेशों में उनके ज्ञान और अनुभव के कारण उन्हे विशिष्ट अतिथि के तौर पर समारोह आदि में बुलाया जाता था । शास्त्रार्थ में उन्होने अपने समकालीन कवियों जैसे बाबा शंकरदास जी मेरठ, बाबा मूलचंद जी राजस्थान, बाबा सुखीराम जी (स्याणा) महेंद्रगढ, बाबा धोकलराम जी राजस्थान, पंडित शम्भूदास जी दादरी वाले को खूब प्रभावित किया और सदैव प्रामाणिक कथन ही जनता के समक्ष प्रस्तुत किए । सनातन धर्म की जड़ों को मजबूत करने में पंडितजी का योगदान अतुलनीय है । स्वतंत्रता संग्राम में उन्होने बढ़ चढ़कर भाग लिया । अपनी वाणी के प्रभाव से स्वतंत्रता आंदोलन को सफल बनाने के लिए उन्होने आम जनता को बखूबी प्रेरित किया । जिसका प्रमाण पंडित परमानंद जी (झगड़ोली वाले) की स्व:रचित तत्काल कविता “बाबा महोर सिंह थे मोहर” में मिलता है । पंडितजी सामाजिक और धार्मिक कार्यों के लिए सदैव तत्पर रहते थे तथा अपना योगदान देने में हमेशा पहल करते थे ।
पंडितजी ने कथात्मक गायन शैली का प्रयोग किया है अर्थात कथा भजन आदि में उनकी विशेष रुचि रही है । उन्हे अपने समय का “भजन सम्राट” कहा जाता है । पंडितजी द्वारा रचित राग दादरा, कमाली, शेर, ख्याल, कवित्त, सवैया, जकड़ी, लावणी, अरिल, चित्रमुकुट, जंगम, सोहनी, सांगीत, चौताल, चौपैया आदि काव्यशैली द्वारा लोकसाहित्य की काव्यगत विविधता दृष्टिगोचर होती है । यहाँ पंडितजी द्वारा रचित विविध शैलियों का विवरण उदाहरण सहित निम्नांकित है :-
संक्षिप्त में पंडित श्री महोरसिंह जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे । उनका व्यक्तित्व बहुत विराट है जो सदैव प्रेरणादायक रहेगा । अपने लम्बे कार्यकाल में उनके द्वरा किए गए समाज उत्थान, नारी उत्थान, सनातन प्रचार, संस्कृति रक्षा, भक्ति प्रचार आदि ऐतिहासिक एवं रचनात्मक कार्यों के लिए सदैव पंडितजी को याद किया जाएगा । 10 दिसंबर 1953 मार्गशीर्ष महीना, शुक्ल पक्ष, चतुर्थी तिथि, वार बृहस्पतिवार, संवत 2010 को 84 वर्ष की आयु में पंडित महोर सिंह जी ने इस नश्वर शरीर को त्याग सीधे प्रभु के चरणों में लौ लगा ली थी । सर्वसम्मति से उनका अंतिम संस्कार “भानावाली” नामक स्थान ग्राम साल्हावास, जिला झज्जर में किया गया जहाँ उनके स्मृति चिन्ह के रूप में ‘छतरी’ मौजूद है ।
पंडित महोर सिंह जी ने सदैव प्रमाणिक साहित्य की रचना की है । उनकी लेखनी से अंकित एक एक शब्द का प्रमाण किसी न किसी साहित्यिक ग्रंथ में मिलता है । अनेक शोधकर्ताओं ने भी इस बात की पुष्टि की है कि शोध कार्य के दौरान उन्हे ज्ञात हुआ है कि पंडितजी ने अधिकांशत: वेदों, उपनिषदों, शास्त्रों, श्रीमद्भगवद गीता तथा पुराणों को अपनी रचनाओ का अधार बनाया है । इतिहास रचना के लिए महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित माहाकाव्य महाभारत जो कि मूल रूप से संस्कृत भाषा मे था, का अनुवाद स्वयम् किया है जिसका प्रमाण उनके इस भजन से मिलता है
टेक : लिख गये व्यास जी क्षोहणी का परमान ॥
अंतरा :
अंतरा : महाभारत आदिपर्व अध्याय दूजी में ये लेख पाया है
“संस्कृत के श्लोकों का भाषा में छंद बनाया है”
पांडवदल का प्रमाण कथकै महोर सिंह गुणी गाया है
जागै वीरता तन मे सुनकै भारत का आख्यान 4॥
पंडित महोर सिंहजी ने अनेक साहित्यिक ग्रंथों को कविताबद्ध किया है । जिनमें राजा नल और सती दमयंती की रौचक कथा, जो आज भी नारी समाज के लिए प्रेरणा का स्त्रोत्र है रानी दमयंती का सतीत्व और पति प्रेम का मार्मिक चित्रण विशेष है । राजा हरिश्चंद्र कथा, राजा उत्तानपाद कथा, ऊषा अनिरुद्ध कथा (बाणासुर कथा), भगवान श्रीकृष्ण जन्म कथा, शिव पार्वती विवाह, महाभारत कथा (लगभग संपूर्ण), पांडवों द्वारा अश्वमेध यज्ञ आदि सभी एतिहासिक कथाओं को जनमानस तक सरल भाषा में पहुंचाने का श्रेय पंडितजी को विशेष रूप से जाता है । इन सबके अतिरिक्त ब्रह्मज्ञान, निर्गुण, उपदेशात्मक, संतवाणी, भक्तिरस, रहस्यवाद, सामाजिक चेतना, नारी उत्थान, राग, प्रश्नोत्तर आदि विविध विषयों के भजनों के द्वारा मानव कल्याण में विशेष योगदान दिया है । वर्तमान में उपलब्ध उनके द्वारा रचित भजनों की संख्या करीब 1000 से ज्यादा उपलब्ध है एवं दोहों की संख्या करीब 450 से ज्यादा है और संग्रह एवम् संकलन का कार्य अभी भी जारी है । पंडितजी की रचनाओं की बडी़ विशेषता यह है कि उनको पढ़कर ऐसी अनुभूति होती है मानों ईश्वर के साथ साक्षात्कार हो गया हो ।
पंडित महोर सिंह जी के अनेक शिष्य हुए हैं । विदित है कि पंडित महोर सिंह जी अपने शिष्यों की परीक्षा लेते थे और उनके द्वारा तय मानदंडों पर खरा उतरने वालों को ही अपना शिष्य नियुक्त करते थे । उन्होने एक भजन में यह लिखा भी है और अन्य प्रणाली पर कटाक्ष भी किया है कि : -
अबतो इस संसार में, कवियों की हुई सरसाई
भेंट रुपैये रुमाल लेले
दुष्ट ही दुष्ट बना लिये चेले
महोरसिंह कहै हठी हठेले
भूले फिरैं अहंकार में, शठ करते गाल बजाई 4॥
पंडित महोर सिंह जी का कार्यकाल मुख्यत: वर्ष 1895-1900 के आसपास से लेकर वर्ष 1950-51 के आसपास तक का रहा है । तत्पश्चात वृद्धावस्था के कारण गायन कार्य कम कर दिया था परंतु लेखन कार्य जारी रखा । उनकी वृद्धावस्था की हस्तलिपि इसका प्रमाण हैं । ज्ञातव्य है कि उनके बृहद ज्ञान के प्रभाव से कई बार शंका समाधान अथवा जानकारी हासिल करने के लिए पंडित लख्मीचंद जी भी साल्हावास आते रहते थे और पंडित महोर सिंह जी से अनेक विषयों पर संवाद हुआ था । यह तथ्य पंडितजी के पौत्र श्री महाबीर प्रसादजी ने अपने साक्षात्कार के दौरान बताई जिसका विडियो यूट्यूब चैनल “पं. महोर सिंह Pandit Mahor Singh” पर उपलब्ध है ।
पंडित महोर सिंह जी की वंश परम्परा अब भी चल रही है । पुन्यतिथि के अवसर पर प्रतिवर्ष पंडितजी की याद में उनकी रचनाओं का गायन उनके शिष्यो द्वारा किया जाता है जिनकी रिकॉर्डिंग यूट्यूब चैनल “पं. महोर सिंह Pandit Mahor Singh” पर उपलब्ध है । उनकी शिष्य प्रणाली में से जिनके बारे में ज्ञात हो पाया है उनकी सूचि निम्न है : -