दोहा –
कहते कूं देरी लगी, करते लगी ना देर ।
दुर्योधन नै करा दिये, सब सामानों के ढेर ॥
लाखा मंदिर की सुगनी नै नींव धरी ॥ टेक । (जंगम)
बड़े बुरे बख़्त में नींव धरी मृत्यु के पंचक कहलाये
पांचों की हानि जरूर होगी साध समूहर्त सुख पाये
जरजोधन नै दूत भेज विश्वकर्मा के सुत बुलवाये
ले-लेकै करणी बसोली हाथ सब शहर के कारींदा आये
मामा सुगनी नै पास बैठाकै गुप्त भेद सब बतलाये
प्रथम खुदवाकै धरण धरण में रूई बारूद भरी 1॥
लाख के शिला ईंट पत्थर गंधक का बना लिया गारा
मामा सुगनी की आज्ञा पा लगे भवन चिनन को चेजारा
दीवारों के बीच घृत तेल का कूपा दबा दिया बेसुम्मारा
कहीं भर सन्दूक दाबैं दारू की बनने लग्या कपट द्वारा
चेजारों नै कपट भवन की खड़ी जो दिवाल करी 2॥
छज्जे कमानी बारी झरोखे जगह जगह छुटवाते हैं
बासों के बीच घृत तेल भरा कै सण के बंध लगाते हैं
ऊपर कपूर का करैं सफेदा चौरस खूब बनाते हैं
उन ही की कड़ी उन ही के खंभ उन ही के संहतीर चढ़ाते हैं
दक्षिण दिशा में विदुर भगतजी मोरी गुप्त रखाते हैं
बन एक साल में पूरा हुया है सुंदर झिलक परी 3॥
सोलह मकान तो भीतर बने यज्ञों की बेदी बनवाई
चढ़ गये कलश और ध्वजा पताके छत्र चाँदनी तनवाई
अग्निकुंड और हवनकुंड चहूँ और दे रहे हैं दिखलाई
बाजैं मृदंग चढ़ गई उमंग छवि महोर सिंह कथ गाई
जाल बिछा लिया पूरा पूरा राखैंगे लाज हरी 4॥