ख्याल:-
मथुरापुरी जादूवंशी राजाओं की है रजधानी,
उग्रसेन जहां राज करै है हरि भक्त और महादानी ।
उग्रसेन का छोटा भैया देवक युवराज है बानी ,
अतिप्रेम दोनों भाइयों का हरिभक्ति मन में ठानी ।
उग्रसेन कै पुत्र कंस था दुराचारी और अभिमानी ,
देवक कै थी पुत्री देवकी, पति से यूं बोली रानी ।
समरथ पुत्री हो गई बलमा तन में झलक रही जवानी ,
क्वाँरी कै रज होय महोर सिंह बिगड़ जायगी ज़िंदगानी ॥
दोहा:-
समरथ पुत्री हो गई, नीति निपुण नरनाह ।
जल्दी घर वर ढूंढकर, करो सुता का ब्याह ॥
रानी के बैन सुन देवक आया उग्रसेन के पास ॥ टेक ।
चोताला-
जद बोल्या देवक बैन बंधु उग्रसेन अरज है मेरी
ब्याहण कै जोग हो गई सुता अब तेरी,
घर वर विद्या गुण रास करो तल्लाश चाहिये ना देरी
दिन-दिन पुत्री होती जा रही बडेरी
चोपैया –
रजो धर्म से हो ज्या क्वाँरी
लगैगा दोष बड़ा भारी
हों पतित पिता महतारी
मर्जी अब रही तुम्हारी
उठत -
सूरसेन का अंश, है यादू वंश, बोल उठा है कंस
मनै घर वर कर लिया तल्लाश 1॥
चोताला-
घर वर में कसर है नांह मथुरापुर मांह नाम वसुदेवा
भगनी के ब्याह का भेजो वहाँ लिख टेवा
चाचा जी देर मत करो ब्याह दिन धरो पार हो खेवा
जितनी मेरे से बनै करूंगा सेवा ॥
चोपैया-
जुड़ मिल आ गई पंचाती
लिख दई ब्याह की पाती
सब न्योते गोती नाती
आ गई ब्याह की राती
उठत -
कर दिया कन्यादान, मान सन्मान, भावी नै आन
कंस के घट में किया निवास 2॥
चोताला -
चार सौ हाथी दिये शुशोभित किए कनक अंबारी
सोलह सौ दिये रथ पालकी न्यारी
दिये पंद्रह हजार तुरंग करी अंग सजावट सारी
दो सौ दासी वस्त्र आभूषण सिंगारी
चोपैया –
मणि माणक द्रव्य खजाने
दिये दान में बेपरमाने
आभूषण भेष जिनाने
दिये सिरों पाँव मर्दाने
उठत –
बहना को लगाकै गला, कंस जब मिला, पहूंचावन चला,
गाज उठा इतने में अक्काश 3॥
चोताला-
घोड़े की पकड़े बाग भगनी अनुराग चला अगवानी
इतने में धुन बंध हुई अक्काश से वाणी
जिसको समझ रहा बहन ये भगनी है ना अज्ञानी
बन बहन प्रगट हो गई तेरी मोत निशानी
चोपैया-
जब अष्टम गर्भ देहधारै
निश्चय तुझको संघारै
भूमि का भार उतारै
भक्तों के कारज सारै
उठत –
महोर सिंह नभ गाज, सुन कै आवाज , बनी क्या आज,
पुरवासी हुये उदास 4॥