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उत्तानपाद

कहै पति से सती गति पुत्र बिन बालम हो नहीं ॥ टेक ।

पुत्र बिन गति नहीं यही मन बसी
पिया माया ना काम है किसी
पुत्र बिना कुलकला पिया इसी
जिसी तो शशि बिन रजनी भही 1॥

मणी बिना सूना सर्प मणधारी
पति बिन होती सूनी नारी
पुत्र बिन सूनी महल अटारी
थारी सारी बालम हो रही 2॥

वेद शास्त्र रहे बतलाय जी
पुत्र बिना मुक्ति है नांय जी
दूजा करवाल्यो ब्याह्य जी
पियाजी राजी हो मनै कही 3॥

पिया पुत्र जन्म जा एक
गती हो कटते पाप अनेक
महोर सिंह कहै कर्म की रेख
लेख ल्यो देख होकै रहती सही 4॥

रानी कर्म रेख टलती नहीं ॥ टेक ।

करमाधीन फल मिलै है कम ज़्यादा हो नाय
न्याकारी दरबार में होते सच्चे न्याय
उस घर में तो गलती नहीं 1॥

जैसे जिसके कर्म फल हैं उनके अनुसार
वस्तु बहोत संसार में कर्मों के आधार
समझ लिए भाग्य बिना मिलती नहीं 2॥

म्हारे भाग में है नहीं प्राण प्रिय संतान
उस मालिक के हुकम बिन निश्चय प्यारी जान
पत्ती तक हिलती नहीं 3॥

कहन प्रिय तेरा मां कै ब्याह ल्यूं दूजी नार
तो एक म्यान में समझ ये रानी दो तलवार
कहैं महोर सिंह डलती नहीं 4॥

पिया दुख सुख करमाधीन है
पर मानो वचन हमारा ॥ टेक ।

सर्वसुखी महादुख में आज्या
दुखिया सर्वसुख को दर्शा ज्या
पल में रंक राव कहला ज्या
आधी पल में नृप दीन है
कर्मों का खेल पिया सारा 1॥

जो कर्मों में हो दुखदाई
मेटनिया बालम कोई नाई
पर करो पिया मेरी मनचाई
पुत्र बिना मलीन है
थारा राजपाट भंडारा 2॥

दोजग को भोगैं अपराधी
पुत्र कटा देता है व्याधि
जो तुम कर ल्यो दूजी शादी
मेरै तो पिया यकीन है
चालैगा वंश तुम्हारा 3॥

अब पिया मतना देरी लावो
वंश बढै पिया ब्याह करावो
महोर सिंह कहै हरिगुण गावो
जो भक्ति में लौ लीन है
वही भव से तिरने हारा 4॥

ख्याल –
सुनीति की छोटी भगिनी थी सुरूचि नाम कहाया जी
रानी का कहया मान भूप ने उस संग ब्याह रचाया जी ।

दान मान सम्मान करा चलकर नगरी में आया जी
डट्या अरथ महलों कै आगै महोर सिंह पद गाया जी ॥


दोहा –

अनहद बाजे बज रहे हो रही जै जैकार ।
गई सुनीति तारणे हो रहे मंगलाचार ॥

अरथ से उतरो हे माँ की जाई ॥ टेक ।

एक उदर मै बास किया हे
जन्म एक माता से लिया हे
एक जननी का दूध पिया हे
एक मात कहलाई 1॥

बहना अरथ से नीचै आकै
मिलिये गले से गला लगाकै
पीछै महलों माहीं जाकै
घालूंगी मुँह दिखाई 2॥

एक पीहर एक राजधानी
बनी एक राजा की रानी
सुनकर कै बहना की बानी
सुरुचि ने पीठ फिराई 3॥

करवाओ आरता नीचै आकै
क्यू बैठी हो पीठ फिराकै
महोर सिंह कहै पद में गाकै
हूणी तो टलती नांईं 4॥

दोहा –
बहना के सुनकर बचन बैठ गई मुख फेर ।
नैनो में पानी भरा बोली भूप से टेर ॥


दगा किया पिया नार तै
होके छत्री का लाल ॥ टेक ।

मेरी बहना थी तेरे घर के माही हो
फेर क्यूं तैं पिया मैं ब्याही हो
मेरा काट गला तलवार तै
ना उल्टी दे घाल 1॥

मैं तो ब्याही रही ना क्वांरी हो
पिया तनै धरती कै दे मारी हो
करवाऊँ न्याव करतार तै
दरगाह में ले चाल 2॥

तेरे जी ने बैठी रोऊँगी
रात दिन रंडसाड़े मे खोऊँगी
तनै खो दई हार सिंगार तै
तनै ब्याह कै भूपाल 3॥

मैके ने अरथ हंकाइये हो
पिया मतना देरी लाइये हो
महोर सिंह वो तिरे संसार तै
जनी सुमरा गोपाल 4॥

रानी हुकम तेरा मंजूर है पर मानो कहन हमारी ॥ टेक ।

चौताल-
दरवाजे डटी नार वे मंगलाचार गा रही सारी
सौरण का थाल लिये खड़ी है बहन तुम्हारी
करवाओ आरता चाल छत्री की बाल प्राणों से प्यारी
करो धारण कुल की रीत जो हैं हमारी ।

चौपैया–
करो हुकम प्रिये क्या चावो
चाहती हो सो बतलावो
चल महलों में मौज उड़ावो
क्यूं ना बाहार अरथ से आवो
सांगीत–
सुनकै बचन सुरुचि कहै सुनो प्राण प्यारे
आरता कराऊँ पिया पूजूं कुलदेव थारे
बहना के सिंगार हार तार पिया ल्या द्यो सारे
महलूँ से बाहर कर देना उसे बनोवास
दुहागन बना द्यो वा को देखूँ थारा रनवास
ना उल्टा अरथ मेरा कर द्यो मैं ना रहूं उसकै पास
तोड़ -
कह दई जो मेरा दस्तूर है
रख लियो जुणसी हो प्यारी 1॥


चौताल –
सुरुचि के सुने बैन भरे जल नैन हिया उझलाया
चल दिया मारता श्वास मनू का जाया
बिन खोट सती नै दुहाग द्यूंगा त्याग हो कुष्टि काया
करता विचार राजा राणी पै आया
चौपैया –
राणी के ढिग जाकै
खड़ा हो गया अकुलाकै
लेता सुवास मुंह बाकै
कहै तुही तुही तुही गाकै
सांगीत –
देखकै उदास पति सती बोली जोड़ हाथ
किस कारण उदासी ये सत्य बतलाओ प्राणनाथ
पियादुख से हूँ दुखी सुखी सुख में दिन रात
क्या है दुखदाई पिया जल्दी दीजे बतलाय
अर्धंगी नाम मेरा आधा दुख ल्यूं बंटाय
सती के बचन सुन भूप बोल्या अकुलाय
तोड़ -
पति तेरा मजबूर है
कर्मों की रेख प्रिये न्यारी 2॥


आल्हा –
अणहूणी होने की नाहीं हूणी नै दे कौन मिटाय
हूणी के बस हो कै रानी दिया तैनै मेरा ब्याह कराय
बरजूँ था तूँ मानी नहीं हूणी नै लिया घेरा लाय
अब क्या जतन बनाऊँ राणी दिये मैंने रस्ता बतलाय
बिन कसूर तनै द्यूं दुहाग पड़ूंगा घोर नरक में जाय
जो उस ब्याहली नै छोडूंगा तो वा काची कुपल कट जाय
धरती मात दराड़ा खा ज्या इस दुखिया नै लिए समाय
जो विष खा कै तजूँ प्राणी राणी दोज़ख तै बच ज्याय
तेरी भैना तेरे सिंगार मंगावै मेरे सैं ना तारे जांय
जै उसने सिंगार ना द्यूंगा तो वा पीहर को चली जाय
भीड़ पड़ी में अपने पति को दीजे राणी रस्ता सुझाय
तोड़ -
सती कहै मत नैन बहावै
भाग लिख्या सोई फल पावै
तेरा क्या पिया कसूर है
कर्मों की मार है सारी 3॥


आल्हा –
सुने पति के बैन सती तारण लागि है हार सिंगार
छल्ली ज़ंजीरी गुठड़ा बिछिया झांझण कड़ा चूड़ियां तार
बांक तोड़िया रमझोल पायल कहै गिन गिन लेले भरतार
छैलकड़े गिटिया के तारे कड़ी नेवरी दई बिसार
ले ताती पाती और गजरिया मेरी भैना कै दिये घाल सुधार
नोसत गुंठी जोट आरसी राणी नै दीन्हा पकड़ा
बांध पगड़ी हथफूल सुनतड़ा पोंहचि और गजरा ले ज्या
छनन पछेली और कांगनी बाजू टड्डे दिये पहरा
माला जो माला मोतियाँ माला हमेल हंसली हो दिये सजा
पंचलड़ी सतलड़ी गलपटिया दुखी राणी नै दिये बगा
हार नौलखा दिया काढ कै कहै टूम लई गल की आ
टांडे खींचे कुड़क बूजनी बहादरी लीन्ही कढ़वा
नथ भौंरकी और झूमखी भुरली तक लीन्ही उतरा
पात बोरला बंधी झूमखा कढ़वा लिया कोडी जूडा
पल्लू धारु खीसि तागड़ी लीन्हा कर्णफूल तागा
घूंघट मुंह का छाज लिया है राणी दीन्ही नग्न बना
तील रेशमी तरवा लीन्ही धोली साड़ी दई बगा
तोड़ –
राणी नै सिंगार बिसारा
श्वेत बस्त्र बदन पै धारा
कहै महोर सिंह ले उसका सहारा
जो सर्व व्यापक भरपूर है
वही करैगा पार निवारी 4॥


करते हुकम बनोवास का
हिया उझलै प्यारी मेरा ॥टेक।


तूँ मेरी मणि मैं तेरा विषियर हूं
तूँ दीपक मैं तेरा घर हूं
कर द्यूं नाश प्रकाश का
हो ज्या घोर अंधेरा 1॥

तू पीहर सैं आँख मिंचा गई
मेरे संग अकेली आ गई
क्यूकर छुटवा वास रनवास का
द्यूं वन का बासेरा 2॥

बिन खोट सती नै त्याग कै
लग्या वस्त्र देन दुहाग के
मेरा आय गया दिन नाश का
दिया हूणी नै घेरा 3॥

राणी मेरै पीछै आपनै
तज आय गई मा बाप नै
भरा भूप विश्वास का
महोर सिंह पद टेरा 4॥