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सनातन धर्म प्रचार

सनातन धर्म सबका मूल है
जितने मत मजब पंथ हैं ॥ टेक । (सांगीत)

पांडव हिमालय गये वर्ष पांच हजार हुये
उनसे पीछै मत मजब पंथ बेसुम्मार हुये
ईश्वरी धर्म के शत्रु देखो बिन विचार हुये
फारसी ईसाई बोध जैन बाम ईस्लाम
मजहब कायम करके न्यारे न्यारे धर लिये नाम
धर्म है सनातन सबका सनातनी है तमाम
यह सब उनकी भूल है
जो कोई बानी महंत है 1॥

सत्य बोलो प्रिय बोलो न्याय से कमाई करो
सेवा मातपिता की सभ जीवों की सहाई करो
भाइयों से भाव निष्कपट मित्रताई करो
शुभ कर्म करो अशुभ कर्म सेती डरते रहो
देव पितृ पूजा परउपगार करते रहो तीर्थ व्रत दान ध्यान ईश्वर का धरते रहो
यही सनातन का रुल है
ना धर्म इनसे उपरंत है 2॥

पाखंड के कामों का सनातन जुम्मेवार नहीं
चोरी जारी जूवा की सनातन के कुछ गार नहीं
मदिरा मांस नशे का सनातन के सिर भार नहीं
शुद्ध जैसा सुबरण और स्वच्छ जैसा गौ क्षीर
सनातन धर्म ऐसा जैसा निर्मल गंगा का नीर
मूर्खों की बहसा बहसी बिन समझे तकरीर
कोई नहीं प्रतिकूल है
जितने मत मझबी ग्रंथ हैं 3॥

और धर्म मनुष्य कृत सनातन है ईश्वरी धर्म
ब्रह्म विद्या पढ़े बिना इसका ना पावै मर्म
इस धर्म को वोही धारै जिसके शुभ हों कर्म
दया का खजाना और धर्म का है भंडार
जत सत ब्रह्मचर्य मोक्ष का है दरबार
महोरसिंह कहै महिमा गाय रहे वेद च्यार
वैदिक लिखत कबूल है
तो साधन भी अनंत हैं 4॥ शुभम् मंगलम

ईश्वरी सनातन धर्म है
और धर्म सभ मनुष्यकृत हैं ॥ टेक । (सांगीत)

शील संतोष दया धर्म है निवास जाहां
ईश्वर का आराधन और सत्य का प्रकाश जाहां
जत सत ब्रह्मचर्य और लक्ष्मी का वास जाहां
भक्ति प्रेम सत्संग ज्ञान बैराग जा में
जीवदान प्राणदान सर्वस का त्याग जा में
पत्नीव्रत पतिव्रत सर्व सौभाग जा में
ये सनातन का मर्म है
वेदों के बीच लिखत हैं 1॥

इसी धर्म सेती अजामेल पापी पार हुया
पतित बाल्मीक का इसी से निस्तार हुया
पिंगला वेश्यां का इसी धर्म से उद्धार हुया
गीध व्याध सदना इसी से सभ साफ़ हुये
बड़े बड़े बज्र पापियों के पाप माफ़ हुये
स्वर्गौं बीच वास सनातन धर्म के प्रताप हुये
धर्म जिनको प्रिय पर्म है
भव सैं वैई पार लंघत हैं 2॥

अव्वल तो सनातन में मुक्ति का दाता रामनाम
दूजे श्री गंगा माईं तीजे तीर्थ व्रत धाम
कथा भजन सत्संग मोक्ष के साधन तमाम
सगुण की सेवा पूजा निर्गुण का ध्यान करना
प्रेमाभक्ति आरतभक्ति निष्काम दान करना
मोक्ष के ये साधन सभ कर्ण निरभिमान करना
जिन जीवों का शुभ कर्म हैं
सनातन के वैई भगत हैं 3॥

सनातन धर्म का मनुष्य कोई बानी नहीं
अंत का ना बेरा और आदि कनी जानी नहीं
काट करते मर गये हुई सनातन की हानी नहीं
पाव रती बावन तोला सनातन है बिश्वाबीस
और कोई धर्म इसकी कर नहीं सकै रीस
महोरसिंह कहै इसका बानी आप जगदीश
उसी कूं इसकी शर्म है
इस ही के अंग सभ मत हैं 4॥

जिसका कहीं आदि न अंत है
सनातन धर्म बहोत पुराना ॥ टेक । (सांगीत)

कुछ तो वेद पढ़े और कुछ वेद सुने हमने
पुराण इतिहास बार बार खूब गुने हमने
....... कौं के बीच शीश धुने हमने
छोटे बड़े भाषा के ग्रंथों का देख लिया मर्म
सब ही के बीच लिख्या पाया है सनातन धर्म
लिखत पुरानी देख दूर सब हुया भरम
मुक्ति का यही पंथ है
और हैं सभ पंथ भयाना 1॥

सनातन के सेवक हुये भक्त ध्रुव प्रहलाद
बाल्मीक अजामेल गज ग्राह गीध व्याध
सनातन से तिरे सुनी पिंगला की फरियाद
सनातन कै हेत राम कृष्ण अवतार लिया
नृग बल शिवि हरीचंद सतधार लिया
मोरध्वज दधिची ऋषि नै काम सार लिया
नामावली अनंत है
सनातन सबके मनभाना 2॥

अब भी हैं सनातनी सभ भारथ के भूपाल
बड़े बड़े सेठ साहूकार धन मालोमाल
सभी हैं सनातनी जरा नहीं पलटे ख्याल
शास्त्रों के पारंगत बड़े बड़े विद्वान
सनातन के प्रेमी नाम कबतक करूं बखान
ज्ञानी गुणियों कै सनातन धर्म रह्या मनमान
इस ही में कुछ तंत है
और हैं सभ भूल भुलाना 3॥

सनातन धर्म किसी की भी करै नहीं काट फांस
रामायण से आदि लेकै देखो पढ़ो इतिहास
मोक्ष के लिखे हैं साधन कर चुके तल्लाश
धर्म से पतित निंदा करते हैं दलीलबाज
सनातन के शत्रु बने कायम कर लिया समाज
महोरसिंह सारा हाल कैसे बरण सकै आज
बहोत घना बिरदंत है
कहो कैसे जाय बखाना 4॥

सब ही सनातन के अंग हैं
मत मजहब पंथ पंथाई ॥ टेक । (सांगीत)

दुनिया में जितने मजहब जितने हैं पंथ
सबके चलाने वाले बानी बडबीसर महंत
सनातन का बानी वही जिसका नहीं आदि अंत
बानी है तो ईश्वर ही है कर चुके अनुमान
वेद मंत्र गायत्री से ईश्वरी होता है ध्यान
सदा भव: सनातन: इस अर्थ से भी होता भान
मत सनातनी तरंग हैं
उतपत भई हुंईं समाई 1॥

समंदरी जल बरष नद नदी नाम धरवाय
करकै परोपकार उसी में मिलै है जाय
अग्नि के पतंगे उठे अग्नि में गये समाय
अयं वेद: सनातन: धर्म ढूंढ बहुमूल
मत मजहब पंथ डाले डाली पत्र फल फूल
मत मतांतर सारे धर्म सनातन कै अनुकूल
न्यारे न्यारे ढंग हैं
देते प्रतिकूल दिखाई 2॥

जन्म धार शिशु मुख से बोलता ईश्वरी बानी
अ आ अ आ वेद स्वर धुनि सभी सुनी कानीं
वेद हैं सनातन भाखैं ऋषि मुनि विज्ञानी
मत मजहब पंथों में धर्म पुस्तग एक एक
सनातन में सुम्मार नहीं ग्रंथ हिं अनेकौंनेक
जन्मों जन्म पर्यंत नित नए पढ़ देख
जो निष्काम निस्संग हैं
वैई कुछ कर सकैं पढ़ाई 3॥

सनातन है चतुस्पाद सत्य शौच दया दान
वेद शास्त्र भाख रहे भाखैं अष्टादस पुरान
मत मजहब पंथों का मुख्य है यही निशान
प्रेम को बढ़ावो आवो प्रेम सेती बात करो
प्रेम की सभ सोसायटी प्रेम की पंचात करो
गुणी महोरसिंह कहैं मत पक्षपात करो
पक्षपात में जंग है
मिलते नहीं मान बड़ाई 4॥

सनातन धर्म सितोल है
इसके कोई धड़ै चढै ना ॥ टेक । (सांगीत)

इसी धर्म बीच योगी यती तपधारी हुये
ब्रह्मवेता वानप्रस्थ सन्यासी ब्रह्मचारी हुये
कंद मूल फल फूल पवन आहारी हुये
हंस परमहंस त्यागी वैरागी विज्ञानी हुये
ईश्वर के उपासक परमभक्त बेपरमानी हुये
कबतक गिनाऊं नाम सर्बस के दानी हुये
बढ़ना क्या कोई मखोल है
साधन बिन वजन बढै ना 1॥

इसी में वाराह आदि चौबीस अवतार हुये
सनकादिक च्यार ऋषि अट्ठासी हजार हुये
वज्र अंग जोध्या बड़े बड़े बलकार हुये
एकपुरुषी सतवंती पतिव्रता नारी हुई
वीरप्रसू नाम जिनके वीर जननेहारी हुई
कुली इक्कीस पार करी जगत की महंतारी हुई
यो रतन बड़ा अनमोल है
इसका कुछ निरख कढै ना 2॥

च्यार वेद षट शास्त्र अष्टादस पुरान इसमें
देवऋषि पितृ पूजा गंगा अस्नान इसमें
अन्न वस्त्र भूमि गज बाजी गौ दान इसमें
तीर्थ व्रत धाम षटकर्म जज्ञ जाप इसमें
ईश्वर की सामान समझे गये हैं मां बाप इसमें
कथा भजन सतसंग पुन्य परताप इसमें
और सभ कागा रोल है
वायस कभी वेद पढै ना 3॥

अब भी पंडित गुणी बड़े बड़े साहूकार इसमें
छेत्र सदाव्रत नित वार और तिंव्हार इसमें
धर्म ब्याह पुत्रियों के परउपगार इसमें
इतने साधन किसी भी मजहब सीसी मत में नांय
जितनी गंभीरता गव्हरता है सनातन मांय
गुणी महोरसिंह कहै बिन समझे धोखा खांय
सभ जगह पोल ही पोल है
निश्चय बिन धर्म दृढै ना 4॥

सब करो जड़ों की पूजना
जड़ से ही है गुजर हमारी ॥ टेक । (सांगीत)

प्रथम धरती जड़ जा पै बसै सारा संसार
अन्न भी जड़ देहधारियों का आधार
जल भी है जड़ जड़-चेतन का पालनहार
अग्न जड़ पवन जड़ चांद चक्र शिशभार
पालना करै है म्हारी दूर करैं अंधकार
औषधि भी जड़ है जो वनस्पति अठारा भार
ज्ञाता गुरु से बूझता
जड़ में ही रचना सारी 1॥

ब्रह्म जड़ माया जड़ जड़ से जगत भासमान
जड़ वेदवाणी जो चेतन को रही बखान
शब्द जड़ शुन्य जड़ जड़ सृष्टि का निधान
जड़ से जीवारी म्हारी जड़ ही है जीवन प्रान
चेतन कोई वस्तु नहीं है तो कथन मात्र जान
कथन मात्र वस्तु का बतावो कैसे होवै ध्यान
मुश्किल वो पद सूझना
छा रही घोर अंधियारी 2॥

ईश्वर शक्ति जड़-चेतन बीच सम दर्शाई
भेद हो तो वा का नाम समदर्शी रहै नाई
वादियों ने भेद जान जड़ पूजा बिसराई
सनातन कहै जड़ों ही की सेवा पूजा होती आई
ग्रन्थ भी पुराने देखो सभ में यही लिखतम पाई
पतित पार होते आये जड़ पूजा मनभाई
जिनके मन में दूज ना
है वोही मोक्ष अधिकारी 3॥

जड़ में ना अवगुण कोई गुण ही रहे समाय
जड़ों ही की सेवा पूजा चैतन्य की ठीक नांय
सनातन के भेद नहीं वादी रहे पक्ष ठाय
जड़ की तो निंदा गीती चैतन्य की रहे गाय
जड़ के आगै चैतन्य वस्तु कुछ भी है नांय
महोरसिंह कहै भाई पार जो तेरी बसाय
धर्म के कारण झूझना
प्रभु करैंगे पार निवारी 4॥

श्रद्धा से पितृ यज्ञ करना इसी का नाम है श्राद्ध है ॥ टेक ।

हिन्दू करै है प्रेम से
आसोज महीने नेम से
पानी भी देते टेम से
जिस बख़्त जिनकी याद है 1॥

पढ़-पढ़कर कुरान हिदात को
मुस्लिम करैं सब्बेरात को
टिकिया देते पीढ़ी सात को
उनकी भी समझ अगाध है 2॥

वाल्मिक भी श्राद्ध किए बिना
पित्रों का नाम लिए बिना
गिरडी को टिकिया दिये बिना
कहते बड़ा अपराध है 3॥

जहां पितृ कर्म का त्याग है
समझो वो वंश निर्भाग है
महोर सिंह ना उसकै लाग है
जो सच्चे दिल का साध है 4॥

विप्रों को पोप बतावै है
हड़ लिया कंगाल क्या तेरा ॥

सात पुस्त का है खस्ताली
घर में नाच रही कंगाली
चुकटी नहीं मंगत कै घाली
थोथा बांस बजावै है
नहीं टुकड़ा स्वान कूं गेरा 1॥

कद कद दई स्यावड़ी दोली
कद सी भरी दिछणा की झोली
गूगा तीज कनागत होली
परघर तिंव्हार मनावै है
छोटै मुख वचन बडेरा 2॥

क्यों बकवाद करै बकवादी
घर मूसे खां कुल्लाबाती
कारज ठींचे विवाह शादी
असल से असल बनावै है
दो दो दिन में हों फेरा 3॥

घरों में मूंड दिवाले कूटैं
कंगले कहैं पोप हमैं लूटैं
दातारों से विप्र नहीं छूटैं
महोरसिंह गुण गावै है
विप्रों के चरण का चेरा 4॥

सनातन आगै इन बातों में
बर बर गुट गये समाजी ॥ टेक । (सांगीत)

संस्कार विधि नामकरण स्वामी लिखने हारे
सोलह तिथियों के सोलह देवता लिखे हैं प्यारे
सत्ताईस नक्षत्रों के लिख दिये न्यारे न्यारे
कोई तो समाजी कहै देव ना तिथियों के ऋषि
कोई देवऋषि कहै कोई नाम जगदीशी
देवतों को मानै नहीं ऊत जाय लई बीसी
जगह जगह पंचात्यों में
आरज नै हारी बाजी 1॥

निष्क्रमण में चंद्रमा को अर्घ देना लेख पाया
यद्दश्चंद्रमति मंत्र बोलना भी बतलाया
माता पिता दोनूं देव स्वामीजी नै फरमाया
जमी सेती आठ लाख कोश उंचा लिखा चंद
कैसैं वो अरघ मिला कैसे लिखी दयानंद
सूरज के देने में नुक्ताचीनी करैं मतिमंद
सिर धुनैं गलती खातों में
मिथ्या किये पंडित काजी 2॥

गृहआश्रम में चोदह बलि कहो किसके नाम दई
दो हैं त्रिया वाचक बलि भद्रकाली और स्त्रियै
वेद मंत्र पाये नहीं कैसे पहौंची किसने लई
पितृभ्य: स्वधायिभ्य: स्वधानमये मंत्र बोल
किसको ये बलि दई इसका भी भेद खोल
चली इतनै चाल लई अब ना चलैगी पोल
पुस्तग ले लो हाथों में
बितूंडावाद करैं पाजी 3॥

दक्षिणै को मुख असव्य तो जनेऊ किया
ॐ पितर: शुद्धध्वं ये मंत्र बोल जल दिया
अशव्य मंत्रित जल क्योँ दिया और किसने लिया
सनातनी भी बैठे और बैठा आर्या समाज
गावो चहे बहैस करो फैसला हो लेगा आज
गुणी महोरसिंह कहैं आनंद के बाजैं साज
दुपक्षी है सभ जात्यों में
करो सबके मन की राजी 4॥

कई बार समाजी हार चुके
सनातन से इन सवालौं में ॥ टेक । (सांगीत)

प्रथम पाला झांसी मंड्या दूजी बार सोलंग
तीसरा जाखल भिलाई खूब रह्या रंग ढंग
बिरड़ और ढिलानवास सनातन नै जीत्या जंग
एक बार लुखी और दो दो बार गुजरवास
झासुवै और झाड़ली मंड्या था खूब कंपास
काम नहीं आया कुछ धरा रह्या सत्यप्रकाश
पोथां में सिर मार चुके
लिये पकड़ फाल फालों में 1॥

ईटोली में जो कुछ बनी गुवांढ जानै है तमाम
सनातन समाज का फिर झंडा गडा चीणै गाम
सनातनी महोरसिंह समाजी आये बस्तीराम
शास्त्रार्थ हुया बस्तीराम घबराय गये
और भी समाजी सुन सुन चक्कर खाय गये
भंग मर्यादा करी भंवर बीच आय गये
हथियारौं को डार चुके
फंदे सनातन के जालौं में 2॥

खरक की सभा में बस्तीराम पलक झांप गये
शास्त्रार्थ हुया नहीं धमकीये सैं कांप गये
खेड़ी सैं खरक तक की भूमिये कूं नाप गये
दूसरी सभा में खरक बस्तीराम आये नहीं
खबर नहीं नटे या सभा न बुलवाये नहीं
हम तो खुश होते गये बस्तीराम पाये नहीं
दंगल में ललकार चुके
आवो जो समाज ख्यालों में 3॥

पोतै गाम सभा हुई उसका भी सुणो हाल
पूर्णसिंह सभापति मध्यस्थ भगत गोपाल
तीन थे समाजी पीरु कन्फाड़ा सोहनलाल
तीन दिन सभा रही पोथे सारे लिये ढूंढ
उन ही की मोगरी से उन ही कूटे मूंड
महोरसिंह नित्य की समाज से बजावै खूंढ
हम तो खूब बिचार चुके
मरैंगे इन ही पालों में 4॥

लिया देख तंत हमने पाया सो जड़ में पाया ।। टेक ।

जड़ की ना कीमत हो थोड़ी
बिकै लाल नो नो किरोड़ी
हीरा माणी की जोड़ी
मुकटों बीच छाया 1।।

जड़ फांसी से उतरादे
सीढ़ी स्वर्ग की लगा दे
जड़ ईश्वर सेती मिला दे
जड़ में चेतन समाया 2।।

जड़ आदर मान दिलावै
दुनिया में इज्जत करावै
महोर सिंह यूं कथ कै गावै
जड़ ही से हेत लगाया 3।।

विरोधी धर्म के चारों युग से होते आये ॥ टेक ।

हिरणाकुश विरोधी हुया गऊ ब्राह्मण भक्त सताये
राम नाम के रटने वाले जमींदोज़ करवाये 1॥

रावण हुया विरोधी धर्म का विप्रों से दंड भराये
पकड़ जकड़ करके देवों को कैद बीच डलवाये 2॥

कंस विरोध किया धर्म का निर्दोष व्यर्थ मरवाये
यज्ञ दान तप नेम आदि के बिरवे काट बगाये 3॥

……….. भी हुया विरोधी ब्राह्मण पोप बताये
महोरसिंह जन जैसे कर्म करे वैसे ही फल पाये 4॥

सदा जै होयगी मित्रो सनातन धर्म वालों की ।। टेक ।

कलू में कर्म सब छूटे
धर्म के मार्ग भी टूटे
पाखंडी फिरते हैं झूठे
बजाई करते गालों की 1।।

नीयत में फर्क अब आया
प्रजा में कहर उतराया
क्या परचा अबतक ना पाया
मार पड़ै काल बबालों की 2।।

बड़ों की रीती मत छोड़ो
धर्म के मार्ग मत तोड़ो
प्रीति उन सेती मत जोड़ो
निंदा करैं सत परनालों की 3।।

मुवा तुझे महोर सिंह कहता
पराई सुन सुन क्यों बहता
जो धर्म अपने में ना रहता
साख बिगड़ै टकसालों की 4।।

धर्म सनातन आज देख क्या दशा हुई है तेरी ॥ टेक ।

खिल्ली उड़ रही ताली बज रही कोई ना करै लिहाज
हरिश्चन्द्र नृग बली से दानी कर गए काण घनेरी 1।।

ध्रुव प्रह्लाद सरीखे तेरे सेवक रहते थे हरदम
अब चोर जार दुश्मन बन करते फिरते हेराफेरी 2।।

रामचंद्र और कृष्ण नै तेरी इज्जत करी बड़ेरी
पाँवर पाए इज्जत घर घर अग्नि कसेरी 3।।

सती सुहागन पतिव्रता थी सदा चरण की चेरी
ग्यारह खसमी ताना मारैं परधन माल लुटेरी 4।।

धर्म के चारों पैर कटे हैं धरा पाप नै घेरी
महोर सिंह नित टेर रह्या प्रभु कहाँ लगाई देरी 5।।

कैसे वेद अनादि बतलादे गुणवान ।। टेक ।

वेदों को रहे सत्य मान और मिथ्या करे पुराण
वेद सत्य और पुराण झूठ का दीजे कुछ प्रमाण 1।।

सनातन आर्यसमाज के रहे पक्ष बांध विद्वान
पक्षपात के भाव से दिन दिन हुई धर्म की हान 2।।

सनातनी समाजी वेद कूं कहैं ईश्वरी जबान
नास्तिक काट करैं वेदों की मिथ्या रहे बखान 3।।

प्रमाण तीनूं दे देकर वेदों का करो समाधान
महोर सिंह यथार्थ कहना सुनले सकल जहान 4।।