दोहा –
चारण बोले भूप से आये कई दिन मांह । पार्वती के जोग वर कहीं भी पाया नांह ॥ बैठे हैं सोच विचार में
हिम राजा मैना राणी ॥ टेक । (त्रिभंगी)
जद बोल्या नरनाह, करूं इन्द्र संग ब्याह, बतला दे क्या सलाह, इसमें तेरी
रानी बोली पिया गिन, इन्द्र सहस्र भग चिन, पिया काहाँ तो है दिन, काहाँ अँधेरी
भूप कहै सुन प्यारी, चन्द्र सहस्र कलाधारी, पुत्री पर्ण ले हमारी, इच्छा मेरी
चाँद पुत्री कै ना योग, रह्या कलंक को भोग, लग रह्या छई रोग, रानी न्यू टेरी
भूप सूरज की कही, पुत्री जोग वर सही, सुन कर नहीं नहीं, रानी हेरी
है सूरज में दहन, पिया होता है गहन, कहीं दीखे ना रहन, चलै हरबेरी
कामदेव कै ना अंग, नहीं ब्याहों वा कै संग, अग्नि देव सरभंग
कर जोड़ कहों भरतार नै
बर ढूंढो बड़ै ठिकाणीं 1॥
वरुण देव को बुलाय, पुत्री द्यूंगा परनाय, रानी शीश को हलाय, बोली वाणी
वरुण का है घर बारी, कहीं मीठा कहीं खारी, पुत्री सोहै ना हमारी , नट गई राणी
फेर बोल्या छत्रधारी, पुत्री जोग वर प्यारी, है कुबेर भंडारी, बड़ा खानदानी
वो है पुंश्चली का नोकर, चली जाय मार ठोकर, पुत्री पीहर भाजै रोकर, बिगड़ै जिंदगानी
भूप कहै बर ले यम, रूप रंग में ना कम, रानी बोली एकदम, बहोत बुरी ठानी
पिया बुद्धि तेरी गई, बर बतलाये कई, यम तो है निर्दई, करै जीव हानी
वायुदेव को बुलाऊं, पुत्री अभी परनाऊं, राणी कहै नहीं ब्याहूं
भजड़वे के संग संसार में
लाजैगी सुता घरियाणी 2॥
किसी अवतार का संबंध, तेरै है के ना पसंद, पुत्री भोगैगी अनंद, बैठी मौज करै
राणी बोली नामंजूर, ना अवतार की जरूर, बनै न कछ सूर, मैली देह धरै
आप विष्णु भागवान, पुत्री पर्ण ले ज्या आन, बता क्या तेरा नुकसान , मैना उचरै
बता पुंश्चली पति को, कैसे ब्याह द्यूं सती को, मेरी पुत्री पार्वती को, कोई जती बरै
बर लेगा शिव जोगी, जन्मों जन्मों का है योगी, तेरी सल्हा सोई होगी, मत नाह डरै
शिव तो है सरभंगी, जाके भूतप्रेत संगी, पुत्री देख कै भुजंगी, डर डर कै मरै
धरती बीच आसमान, जितने थे खानदान, दिए सब मैं बखान
सब के सब भरे विकार में
पार्वती हो गई है स्याणी 3॥
पिता घर पुत्री कंवारी, हो ज्या रजस्वला प्यारी, नष्ट सम्पदा हो सारी, बिगड़ जाय धरम
लगता है बज्रपाप, होवै नरक में गरगाप, क्या समझ रही आप, बड़ा भारी अकरम
समरथ पुत्री देख आज, मोहे आंवती लिहाज, नींद भूप कि गई भाज, बिंध रह्या मरम
कोई बर बुलवाय, पुत्री दीजै परनाय, म्हारा धर्म रह जाय, बना रहै भरम
मेरै उठते हलोर, कुछ चलै नहीं जोर, तूं तो हो गई कठोर, नहीं कम्पै बिरम
जितना बर बतलाया, सबकै दोष तैं लगाया, फिरि हरि की क्या माया, गई भाज शरम
कर्म लिख्या फल पावै, कौन लिखे को मिटावै, महोर सिंह गुण गावै
इतने में राज दरबार में
गये पहुँच ऋषि ऋषियाणी 4॥