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भेंट, धार्मिक भजन, पिंगल, राग

दोहा –
विघ्नहरण मंगलकरण, होत बुद्धि प्रकाश ।
नाम लेत गणेश का, होय विघ्न का नाश ॥

(झूलना)
जय जय निर्धारण आधार
जय जग दीनन की दातार
जय जग माता करूं पुकार
भगवती दंगल हू में आन कै 1॥

आवो आवो री वाक बानी
बैठो रसना पै भवानी
कर द्यो कर द्यो मेहेरबानी
माता सेवक अपना जान कै 2॥

माता मैं मूर्ख अनभोल
हैं ना शुद्ध हमारे बोल
मेरे घट के पट दे खोल
हृदय दीपक जोहो ज्ञान के 3॥

सांगीत-
आदशक्ति ज्वालामांई निकसी पहाड़ फोड़
त ड़ ड़ ड़ शब्द हुया शाखा चली चारों ओड़
शिखा गई सत्यलोक जोजन वहाँ से कई किरोड़
कहते की दीवाल दग दगाय उठी चारों ओड़
नौऊ खंड दे प्रकम्मा धवलगिरी लिया मोड़
धोलैगढ़ झूल रही झुला रहे बावन बीर
आरता उतारैं सची कमला उढ़ावैं चीर
चंवर लोकड़िये ढुलावैं भैरूं खड़े दावनगीर
रिद्धि सिद्धि मंगल गावैं आरता साजैं शरीर
त्रिबिध वायु चल रहे इंद्र बरसावैं नीर
धन्य दुर्गे धन्य दुर्गे धन्य दुर्गे है अखीर

कलकत्ते में काली पुजती होय रही पूजाचार
बंबई में मम्मा देवी बैठ गई आसन मार
दिल्ली योगमाया पर्वत बीच रही ललकार
बद्री विशाल चंडी खुले देखे दरबार
कांगड़ै और हिंगलाद बीच होते मनुवार
देवी भीमा बेरी पुजै जाती आवैं नरनार

चढै मेवा और मिठाई
शिखर ध्वजा फर्राई
मेहर करो ज्वाला माई
जन की करिये सहाई
श्रीरामचंद्र गाई
शिला समंदर पै तिराई
हनुमान नै मनाई
लंका छन में जलाई
छत्री भीम अर्जुन ध्याई
फतह भारत बीच पाई
याद करी मीरा बाई
नैया पार तैं लंघाई
लई धानू नै शरणाई
रसना काट कै चढ़ाई
माता देर कहाँ लाई

हाल नौरंगशाह सुन पाया
फौज लेकै चढ़ आया
बन्धा पत्थरों का चिनाया
रेतमट्टी भरवाया
पानी नदियों का छुटवाया
फेरी ज्वालाजी नै माया
बंधा तोड़ कै गिराया
बादशाह थर्राया
देख नंगे पैरीं ध्याया
भवन पर्वत पै बनाया
पंडा पुजारी बैठाया
भोग हाथों से लगाया

मैं हूँ मतिमंद छंदबंदिशें ना कर जाणू
शुद्ध बोल तोल-तोल काफिये ना धर जाणू
गणों की गणना ना अलंकार रस भर जाणू
ग्राम और आलाप लय ताल सुर का भेद नहीं
मुर्छना श्रुति ना जाणू पढ्या गंधर्ब बेद नहीं
अल्प आयु चिरकाल जीने की उम्मेद नहीं


जन पै ऐसी करो मेहेर
हो ज्या दिल का दूर अंधेर
सुनकै महोरसिंह की टेर
माता आवो सिंह पलान कै 4॥

तुही ज्ञान बुद्धि की दाता है
दंगल में मंगल करनी ॥ टेक ।


आदि शक्ति ब्रह्मा नै मनाई
वेद रचे सृष्टि फैलाई
चतुर मुखों से करी बड़ाई
ब्रह्मा की तुही त्राता है
मधु कैटभ दाने हरनी 1॥

विष्णु नै रटी विश्वंभरी जी
सर्व जग की पालना करी जी
तामसी शिव नै हृदय धरी जी
तेरा धुणी ध्यान लगाता है
महा प्रलय रूप तुही धरनी 2॥

शारदा सुमरी नारद जी ने
वीणा के सब स्वर भर दीने
ऋषि तुम्बरू ताल प्रवीने
तोहे गजमुख शीश नवाता है
षणमुख नै महिमा बरणी 3॥

ज्वालामुखी शेष नै ध्याई
सहस्र मुखों से करी बड़ाई
महोर सिंह नै लई शरणाई
तुही पिता तुही माता है
पड़ा आठों पहर थारे चरणीं 4॥

मेरी आदि भवानी देवा खेवा कर भगतों की पार ॥ टेक ।

तूही लक्ष्मी माया गायत्री
सरस्वती संध्या सावित्री
तू ही जगत की कृत्रि हृत्रि
तुही है पालनहार 1॥

दाने मारन भगत उबारन
भगत हेत करी काया धारण
कब लग भवानी करूं उचारण
थारे नाम हजारों हज़ार 2॥

पालक नाशक जननेहारी
तेरे तक है अरज हमारी
इस बेड़े की पार निवारी
मैया दीजै राह आधार 3॥

इतनी अर्ज घनी कर लीजै
जन अपने पै कृपा कीजै
महोर सिंह को दर्शन दीजै
थारे चरणों का ताबेदार 4॥

जगदम्बे अम्बे मैया नैया कर सागर से पार ॥ टेक ।

टूटी बल्ली नाव पुरानी
नाव का मल्हा मूर्ख अज्ञानी
थारै भरोसे मात भवानी
छोड़ दई मझधार 1॥

जनका जो अधम डूबैगा डेरा
भगवती बाना लाजैगा तेरा
कुछ ना मात बिगड़ैगा मेरा
हांसी करै संसार 2॥

पालक नाशक जनने हारी
तेरे तक है अरज हमारी
इस बेड़े की पार निवारी
दीजै राह आधार 3॥

इतनी अर्ज घनी कर लीजै
जन अपने पै कृपा कीजै
महोर सिंह को दर्शन दीजै
थारे चरणों का ताबेदार 4॥

तू ही भक्तों की मां बाप है
रख लाज आज बाने की ॥ टेक ।


तेरे नाम पै बाना धारा
परम देव तुही ईष्ट हमारा
तू ही गुरु तूही गुरुद्वारा
तूही मन्त्र तेरा जाप है
तुही जगह ध्यान लाने की 1॥

तूही साख्य तुही इज्जत मेरी
ह्रदय बसियो मात हरबेरी
हरदम रहै ध्यावना तेरी
तेरी दम दम ऊपर छाप है
दम से ना बिसराने की 2॥

पालक नाशक जननेहारी
तेरे तक है अरज हमारी
इस बेड़े की पार निवारी
करने वाली आप है
मालिक नफे हर्जाने की 3॥

आदि ब्रह्ममई दुर्गा भवानी
वेद भने अवगत नहीं जानी
महोरसिंह धरै ध्यान तेरा ध्यानी
तेरे ध्यान बीच गरगाप है
बुद्धि दे गुण गाने की 4॥

सजन के कारज सारनी
कर दया हया आ रखले ॥ टेक । (अधरछंद)


दई टेर आई हेर शेर सजाय कै
लाकड़ सिंह चाली जंग देख्या ढ़ंग आय कै
दिया दान ज्ञान आज काढ़ी तेग ठाय कै
दाना दल नै संघारनी
अज्ञानी से आ झखले 1॥

आन दान ज्ञान दीजै ज्ञान ही की कर सहार
रीति नीति गीती अटगीती की आ जाय कार
तारण तरण तेरी शरण चरण सिर रहा डार
अंधेरा अघन टारनी
दिया लाय ज्ञान का तकले 2॥

देती तीर रणधीर गेरे चीर झटके
आया काल नहीं टाल यहां से चाल नट के
इकंत अंत तंत देख चाली रण से छंटके
सागर निधि से तारनी
हो ज्ञानी ज्ञान नै लखले 3॥

अधर चाल कर ख्याल तीन ताल सांगीत
ऐसा हाल तत्काल ज्ञान झाल यही रीत
साल्हासी सिंह राशि खासी लई नीत
ऐसे कष्ट निहारनी
कहंकी गर्दन कहंकी कख ले 4॥

मैं कब का दे रह्या टेर देर तैं कहां करी काली ॥ टेक ।

तूं काली हुई प्रचंडा
तेरी ज्योत जगै नौखंडा
करत आरती पांचूं पंडा
बाज रही ताली 1॥

सिंह चढी पर्वत में गाजै
शंख नगारा नौबत बाजैं
तेरे दर्शन से पातक भाजैं
कीजै पृथपाली 2॥

माता तू पर्वत पै बसनी
तेरी ज्योत जगत में चसनी
दुश्मन के प्राणों को डसनी
असुरदल कर खाली 3॥

जो जन भक्त करैं तेरी सेवा
पकड़ हाथ भक्ति वर देवा
महोरसिंह का पार करो खेवा
दर पै खड़ा सवाली 4॥

जै जै जै जग कारण तारण धारण करने हारी जी ॥ टेक । (अधरछंद)

कारण आदि जगत की जननी
है अज्ञान जाल की हननी
सिंह साज रण कर सर तननी
कर रख काजा लाजा आजा खल दल हरने हारी जी 1॥

करिये दया दास नै टेरी
दास आश करता है तेरी
किस कारण तैं कर दई देरी
चरणन सिर नाता ध्याता गाता तारण तरने हारी जी 2॥

निशिचर दल से धरा रही छा कै
धरा सहित जन गए दहलाकै
रक्षा करी दासन की आकै
निज कर सर धर असुरन संग लरने हारी जी 3॥

जननी जननी कहकै टेरा
इतना ना चहिए अंधेरा
जन हरिदास दास है तेरा
लग रही आशा त्रासा खासा अशरण शरने हारी जी 4॥


(कई भजनों से प्रमाण मिला है कि परदादा महोर सिंह जी अपने नाम की जगह “जन हरिदास” नाम से भी भोग लगाते रहे हैं । सीता स्वयम्बर में भी कई भजनों ऐसे प्रमाण मिले हैं । चूंकि यह अधरछंद है अत: ‘म’ अक्षर का प्रयोग वर्जित है यह भी एक कारण है कि उन्होने भोग में अपना नाम जन हरिदास लिखा है)  

अजी ऐजी शिव नै ब्रह्म समाधी लगाई
मेरुदंड सीधाकर श्वासा खैंच कपाली चढ़ाई ॥ टेक । (सांगीत)


वट वृक्ष नीचै बैठे ऋषियों को लिए संग
आसन जमाया शिव नै पीय कै धतूरा भंग
दशों इन्द्री कस लई मन कर लिया तंग
मूल चक्कर बीच धारण कर लिये पांचूं प्राण
दस द्वार चढ़ा लिये नैन मींच धरा ध्यान
जीव और आत्मा का ब्रह्म से किया मिलान
जड़ भय ताली लाई 1॥

सहस्र वर्ष बीत गये समाधी लगी अखंड
समाधी में प्रतीत हुया पिरथ हिरण्यगर्भ पिण्ड
हिरण्यगर्भ सेती उपजे करोड़ों करोड़ ब्रह्मंड
शिव कूं समाधि बीच शिव भी अनंत दीखे
ताली लाये बैठे पास सनकादिक संत दीखे
ब्रह्मा भी अनंत ब्रह्म वेदों को पढंत दीखे
धुनि दे नेती सुनाई 2॥

कोटि रवि शशि विद्युत दिखे हैं समाधी माईं
जलोजया बीच श्यामरूप की पड़ी है झांई
शेष स्याई पदमनाभ छवि बरनी जाती नाईं
सूक्ष्म स्थूलरूप पड़ा है नजर फिर
सहस्रों हाथ पैर मुख आँख नाक कान सिर
होयकै प्रकाश फेर नजर पड़ा तिमिर
दे रही जोत दिखाई 3॥

ज्योति सम प्रगट होती देखी मूर्ति विशाल
शीश पै मुकट सोहै गल बैजंती माल
लाखों वर्ष पहले रासमंडल का देख्या ख्याल
क्रदन गोपी नाचैं मानू देवतौं के बाजैं साज
प्रेम में मग्न होकै नाचन लगे भूतराज
महोर सिंह गावै नृत देखै शिव का समाज
नारद बैन बजाई 4॥

दोहा
ब्रह्मवेत ब्रह्मचर्य युत, हरदम ब्रह्म विचार ।
शिव योगी से मिलन को, चले ब्रह्म अवतार ॥


एक समय सनकादिक ऋषि कैलाश पधारे जी ॥ टेक ।

अव्याहत गति पंथ प्रकाशी
बिन घन नभ चमकी आभा सी
अचरज करन लगे कैलाशी
शिवगण सारे जी 1॥

अग्निपुंज अवतरे गिगन से
खड़े हुये शंकर आसन से
कर आतिथ्य कर्म तन मन से
वचन उचारे जी 2॥

कुशल पूछ रहे पूछ पयाना
किसबिध हुया ऋषियों का आना
बिन सौभाग्य मुश्किल है पाना
दर्शन तुम्हारे जी 3॥

अर्धरेता होय येच्छाचारी
सर्व निष्काम बाल ब्रह्मचारी
महोरसिंह दे रहे बलिहारी
शंभू प्यारे जी 4॥

शिव कथा पीपलाश्रम धाम की


दोहा

लाखों बर्ष सत्संग कर, ऋषि मुनि गये पधार ।
जैसा पहले घोर वन, वैसाई हुया भयकार ॥


सरजाल भाल ले हाथ में
एक चलकै पारधी आया ॥ टेक ।

दिनभर भ्रम्या घोर बन माहीं
जीव जाल में आये नाहीं
पहौंची गया पीपलाश्रम ताहीं
शिव के पास जा रात में
पारधी नै आसन लाया 1॥

शिव की पिंडी कै चोफेरा
बेल पत्र का बृक्ष घनेरा
ऊपर था पक्षियों का डेरा
बध्यक उनके घात में
शर छोड़ा जाल बिछाया 2॥

ओस नीर पत्तों से झड़ता
आ आ शिव पिंडी पै पड़ता
कट कट बेल पत्र भी चडता
उगमते परभात में
शिव नै निज रूप दिखाया 3॥

कहन लगे भोले भंडारी
मांग मांग वर मांग शिकारी
व्रत किया रैन जगाई सारी
पूजन भी किया साथ में
सुन वचन नीच घबराया 4॥

शिव नै बड़ा अनुग्रह कीन्हा
मुक्तिपद पापी को दीन्हा
महोर सिंह नै शरणा लीन्हा
पतित अधम अज्ञात मैं
पूर्ण यश जा नहीं गाया 5॥

देवौं के बजैं साज नाचैं त्रिपुरारी ॥ टेक ।

अचल ठठ बाजन लगे तम्बूरा मृदंग चंग
तासा और कमायंचा सतार सरार जल तरंग
सारंगी दोतारा तीनतारा भी बजैं हैं संग
धागिड़-धा धागिड़-धा बाजैं नफीरी नोबत झड़ैं
धाकिट-धाकिट धुमकिट-धुमकिट तबलों पै थाप पड़ैं
ढोलक पखावज बाजैं साजियों के दृग लड़ैं
रुणझुण रुणझुण नारद जी की बैन रही बाज
झर झल झनकारी 1॥

तान श्रुति मुर्छना का स्वरों का मिलाप कर
प्रथम सरगम शुरु किया धैवत का आलाप भर
धुरपद चितरंग गावैं तल्लाना की छाप धर
नृत्य करत शिवजी प्रेम में विव्हल हुये
करैं ताता थेई अंग अंग तलमल हुये
धरण धमाका खाय आसन हलचल हुये
सनकादिक ऋषि जय-जय कर रहे शिव का बैठा समाज
दे रहा बलहारी 2॥

खंजरी खटताल बंशी बज रही रिमझिम
नक्कारों पै चोब पड़ी होय रही धमाधम
नाद रणश्रंग शंख बाजन लगे एकदम
शिव संगीत बजैं टाल फूकतार चाम
सम पै लगै तोड़ धोज सोज में बजैं तमाम
धन्य-धन्य देव करैं जै-जै देवतों की वाम
त्रिलोकी में धूम पड़ी है क्यूं शिव नाचैं आज
कह रहे नरनारी 3॥

करकै निरत शिवजी नै डमरू लिया सुधार
डंकूं का मिलान कर बजाया नोपंच बार
धुन सुन सनकादिक मुनी होय गये पार
वाही धुन अन्य ऋषियों नै हृदय धर लई
पाणनी पातंजल मुनी नै कंठ कर लई
आपिसली शाकटायन नै घट बीच भर लई
महोरसिंह कहै डमरू बजाकै गये आसन पै बिराज
भोले भंडारी 4॥

पिंगल, रागों से सम्बंधित भजन

दोहा
पिंगल पिंगल क्या करै, पिंगल का घर दूर ।
पिंगल उसको आंवता जो विद्या में भरपूर ॥

पिंगल का घर दूर है
किसी बिरले को पाया है ॥ टेक ।

पिंगल समझ अगाध समंदर
सकल पदार्थ जिसके अंदर
एक अरब बड़े सुंदर-सुंदर
श्लोकों से भरपूर है
मुख सहस्रों से गाया है 1॥

जिसकूं कुछ संस्कृत की ज्ञात है
उसकूं पिंगल की खबरात है
अष्टगणों की मामूली बात है
इसका क्या गर्व गुरुर है
तू नाहक गर्बाया है 2॥

भगण जगण और सगण पियारे
यगण रगण तगण आदि सारे
मगण नगण गण भाष उचारे
फल शुभ अशुभ जरुर है
श्रुतबोध में दर्शाया है 3॥

भूमि अगन जल पवन अकाशा
रवि शशि शेष देव प्रकाशा
भक्ति में गणागण विश्वासा
करना ये नहीं दस्तूर है
तू किसनै बहकाया है 4॥

जिन शब्दों से भक्ति राची
नाम ग्राम जो देवता वाची
गण गणना जहां जा नहीं जाची
शेष को यही मंजूर है
जिन पिंगल प्रगटाया है 5॥

कुछ पिंगल शम्भू को आती
कुछेक जानै धोंकल खाती
कुछ महोरसिंह को भी ज्ञाती
पूरा तो नहीं सहूर है
कुछ थोड़ा सा आया है 6॥

चोखा गुणी गवैया चोखा
ना कोई तेरा छंद अनोखा
पिंगल का तूं दे रहा धोखा
ये तेरी झूठी घूर है
कोई मूरख धमकाया है 7॥

शंकर सुखीराम और मूला
पिंगल पढ़ा ना अक्षर भूला
जिनका कैसा हिरदा खूला
अबतक नाम का नूर है
जस दुनिया में छाया है 8॥

जो पिंगल शब्दों का स्वादी
करै नहीं वो वाद विवादी
पिंगल पढ़ हो ज्या बकवादी
कवि नहीं वो कूर है
किसी कूर नै भरमाया है 9॥

जो कोई पिंगल पढ़कर आता
परण बांध छंदों के गाता
गंगादास पिंगल के ज्ञाता
गुणियों में गुणी मशहूर है
हरि पद से ध्यान लाया है 10॥

तैं पिंगल दृग से नहीं जोया
विद्यागुरु नहीं कोई टोया
सीख कै कोई भाषा का दोया
ज्ञान में चकनाचूर है
गुणी बन गया मुख बाया है 11॥

गुणी वोही गुण गाय सुनावै
वोही जगत में प्रभुता पावै
महोरसिंह नित उठ गुण गावै
जिसका साज तंबूर है
तम्बूरा मनभाया है 12॥

पिंगल वेदों का अंग है
कथ शेषनाग नै गाया ॥ टेक ।


गायत्री उष्णिक बृहती पंक्ति
त्रिष्टुप जगती अनुष्टुप अंक्ति
इन छंदों की पिंगल में संगती
ज्ञाता शेष भुजंग है
उन ही को भेद कुछ पाया 1॥

पिंगल में सब शास्त्र सारे
षट प्रकार के लक्ष उचारे
नाम जिन्हों के न्यारे न्यारे
शिक्षा जिन्हों का संग है
ये मुनियों नै दर्शाया 2॥

मंत्रों की जिसमें समझौती
ऋचा सिद्ध पिंगल से होती
है पिंगल वेदों की ज्योति
ज्यूं जल बीच तरंग है
सब है वेदों की छाया 3॥

बिन व्याकरण पिंगल नहीं आता
षटांग नाम वेद कहलाता
महोर सिंह गुणी कथ कै गाता
मूरख की मतिभंग है
पंडित सुनकै सुख पाया 4॥

पिंगल की रीत सैं बर्णूं सुन ले अष्टगणों का हाल ॥ टेक ।

चौताल–
सुन तीन गुरुवर्ण का मगण कहलाता
उस गण का भूमि देव लक्ष्मी दाता
तीन लघु अक्षर का नगण बिख्याता
सुखदायक जिसका नाग देवता त्राता

चोपैया–
जहां प्रथम वर्ण गुरु पाया
दो लघु अंत दर्शाया
वो भगण नाम कहलाया
चंद्रमा देव ठहराया

उठत–
जिसका फल निर्मल जान
शास्त्र प्रमान
नाग भगवान
गा गये देखो ग्रंथ निकाल 1॥


चौताल –
जो आद अंत लघु मध्य में गुरु हो प्यारे
भय दाता देव रवि जगण नाम उचारे
दो आद गुरु एक अंत लघु निरधारे
वो सगण देवता पवन विदेश पठारे

चौपैया–
एक आद लघु दो भाई
दो अंत गुरु छवि छाई
जल देवता यगण सुखदाई
वृद्धि फल सुंदरताई

उठत–
आद अंत गुरु दोय
मध्य लघु होय
रगण संजोय
मृत्यु फल अग्निदेव संभाल 2॥


चौताल–
एक अंत लघु दो गुरु आद में रहते
वो तगण देव आकाश शुन्य फल चहते
कवि ज्ञानवान इनके शुभ फल कहते
मूर्ख बिन जाने वेदनता को सहते

चौपैया–
अक्षर तीनों में आकै
मात्रा सुम्मार लगाकै
गंग गुरु वर्ण को पाकै
गण बनता मेल मिलाकै

उठत -
कवि काव्य जहां रचे
वहां यह बचे
अष्टगण जचे
यही है प्राचीनों की चाल 3॥


चौताल–
जो शब्द देवता वाचक कहलाते हैं
वहां ये आठों गण ना देखे जाते हैं
जो ताजा कथन भक्ति के पद गाते हैं
उस जगह भी ये नहीं देखे जाते हैं

चौपैया–
ये पिंगल की नीति
सतगुरु बतला गये रीति
बिन लक्ष्मी ना होय प्रीति
चाहे निस दिन गा लो गीति
उठत–
पिता गुरु रतिराम
गये निज धाम
होकै निष्काम
छंद कथै महोर सिंह तत्काल 4॥

हमनै राग रागनी सारे
गा-गाकै छोड़ दिये हैं ॥ टेक ।

जितने राग उपराग कहाये
सुर भर बख्त बख्त पै गाये
जो जो फल थे वो नहीं पाये
जब हमने नकारे
रसना से दूर किये हैं 1॥

जब लिया था रागों का खिलका
भक्ति का कभी पड़ा ना झिलका
जिगरी दाग धोया ना दिलका
गाकर न्यारे न्यारे
बर बर अजमाय लिये हैं 2॥

रागों में रही ताना कसीरी
हरिभक्ति से हुई नमीरी
दिल पर सवार रही दलगीरी
जाकर गंग किनारे
त्यागन कर सुफल जिये हैं 3॥

जब मैं राग रागनी त्यागे
नित उठ सत्संग करने लागे
महोर सिंह कह जब भी जागे
अंतर राग उचारे
भक्तिरस प्रेम पिये हैं 4॥

निष्फल हैं रागनी सारी
रागों का बख्त नहीं है ॥ टेक ।


भैरव राग का बख्त जो होता
कोल्हू का बैल जब जोता
मेघ मुकद्दर का जब संजोता
होती वर्षा भारी
प्रत्यक्ष प्रमाण यही है 1॥

दीपक के जब बोल निकलते
बन जालै दीपक नहीं जलते
हंडोल में ना रहट चलते
श्री राग को नारी
सुन बांझ की बांझ रही है 2॥

मल्कोश के जब स्वर गाये
सूखे वृक्ष नहीं लहराये
जो जो फल सुने वो नहीं पाये
अब हो लई जांच हमारी
ऋषियों की लिखत सही है 3॥

लिखे लेख नारद नै प्यारे
निष्फल राग कलू में सारे
महोरसिंह नै यूं नकारे
तेरे षटरागों से न्यारी
भक्ति की डगर गही है 4॥

स्वर तीन है के स्वर सात है
स्वर चोदह है की सोले है ॥ टेक ।


शिव शंकर ने डमरू बजाया
जा दिन कितने स्वर प्रकटाया
श्यामवेद ने कितने गाया
कितने स्वर अनुदात है
कितने उदात बोले है 1॥

स्वर ईश्वर और ताल माया है
नारद शारद ने गाया है
जो जो सुरों का भेद पाया है
कितनी सुरों की जात है
कितने जिनके ठोले है 2॥

उदात अनुदात स्वरों को प्यारे
वर्णन कर दो न्यारे न्यारे
स्वरों के पैदा करने हारे
कौन तात कौन मात है
किसने बंधन खोले है 3॥

कहो स्वरों का कैसा वरण है
क्या क्या उनके उदाहरण है
महोरसिंह का यही परण है
बेप्रमाण नही बात है
पद प्रमाण धर तोले है 4॥

कुछ पूछा कुछ सुन लिया, यूं नहीं भरता पेट ।
जो तूं भर्म भजांवता, तो पूर्ण गुरु से फेट ॥

तृप्ति होगी गुरु ज्ञान से
पूछे क्या पेट भरै है ॥ टेक ।


प्रथम नाद धुरपद तल्लाना
तालों का निज यही ठिकाना
सुम पर रीती भरी दिखाना
चातुर नर अनुमान से
जिनका सुम्मार करै है 1॥

स्वरों में स्वर अनादी ओंकारा
चली ओम से सरगम धारा
सरगम के भये सप्त प्रकारा
हिरदा कंठ जबान से
सातों मिल शब्द स्वरैं हैं 2॥

छहों राग रागनी सारी
स्वर तालों से सजी पियारी
बख्त-बख्त पर न्यारी-न्यारी
साज तमाम लय तान से
कोई गंधर्ब जन उचरै है 3॥

नारद के उपराग कहाते
धुनी बांधकर गाये जाते
हम तुम सब उनही को गाते
उसी ऋषि के गान से
कवियों का काम सरै है 4॥

चहे जब बहैर नारदी गा ले
कोई ताल स्वर कोईसा ला ले
चाहे जोनसा साज बजा ले
नारद के वरदान से
गायन में प्रेम झरै है 5॥

पता लगै जो करै पढ़ाई
बिन पढ़े भेद मिलन का नाईं
महोरसिंह नै विद्या पाई
अपने गुरु भगवान से
इस कारण भरम हरै है 6॥

दोहा
बेशर्मी पर जग ने, लिया कड़गता मार ।
गाने का बाना बांध, छोड़ दई सब कार ॥


गाने के ढंग बिगाड़े जी
छुट भैयो नै गा-गाकै ॥ टेक ।

साज बाज आवाज नहीं है
लय स्वर का अंदाज नहीं है
बेशर्मों कै लाज नहीं है
हो गये खड़े लुंगाड़े जी
इकतारे हाथ उठाकै 1॥

जिमी खर स्वान श्रृगाल पुकारैं
ऐसे ही धर-धर रुक्के मारैं
अष्ट-पहर भोंकत नहीं हारैं
आँख मींच मुंह पाड़े जी
बेशर्म शर्म गंवाकै 2॥

जैसे बकरी भेड़ मिमावैं
ऐसे अणमिल अवाज लावैं
बैठ कै कागा रोल मचावैं
खान पीन के लाड़े जी
दो अट की पट मिलाकै 3॥

बिना साज अवाज का गाना
इससे भला डूब मर जाना
महोर सिंह नै बांध्या बाना
जिनके जचे अखाड़े जी
वो गा दें सामनै आकै 4॥