दोहा
भूप कहै प्रजा अब, जाओ निज निज धाम ।
थोड़े दिनों में होंयगे, सिद्ध तुम्हारे काम ॥
हो गया हुकम भूपाल का
बंदीघर कर द्यो खाली ॥ टेक । (त्रिभंगी)
बोल्या प्रजा से भूपाल, मैंने तीन चार साल, थारा माफ किया माल, जाओ मौज करो
कहो मंदर ग्राम ग्राम, बनवाऊँ धाम धाम, जहां बिराजैं शालग्राम, पूजा रोज करो
आया पर्व का दिन जान, यथाशक्ति करो दान, अपनी श्रद्धा समान, ब्रह्मभोज करो
हरिनाम के प्रताप, से मिट ज्यांय तीनूं ताप, नित इस ही का जाप, खोज खोज करो
जो मेट दे हिदात, वा की करकै पंचात, इकट्ठी हो सब जात, जमींदोज़ करो
मानौ राज हदीस, राजगद्दी कूं ना शीश, खड़े दे रहे आशीष
आयूष पा कुलिंद लाल का
जय बोल प्रजा उठ चाली
खूनी डाकू चोर जार, जीतने सजा के हकदार, किए राज से बाहार, अत्याचारी
सत्यव्रती चन्द्रहास, किया धर्म बिल पास, सभ की पूरता है आश, छत्तरधारी
सदाव्रत दिये लाय, छत्र दिये खुलवाय, प्याऊ दई हैं बैठाय, पास में न्यारी
छतरी मंदर धर्मशाल, बापी कूप तत्काल, बनने लगे सरताल, मदद हुई जारी
गढ़ कोट किले खाई, जो थे पुल दरियाई, सभ की मरम्मत कराई, कहैं नरनारी
इसका जुगांजुग राज, स्थिर करो सरताज, अपनी रैयत के काज
किया माफ हाला कई साल का
प्रजा की देख तंगहाली
जहां देखी बियाबान, हुई प्याऊ जलदान, मुसाफिरों के स्थान, वहीं बनवाये
शतग्राम दर ग्राम, एक एक विष्णुधाम, ल्याय ल्याय शालग्राम, जिनमें पधराये
पूजा होती तीनूं काल, बाजैं शंख घड़ियाल, चन्द्रहास महिपाल, के जां यश गाये
घर घर हवन होते, हरि भजैं पाप धोते, सभ सुख नींद सोते, दुख बिसराये
राज माहीं नरनारी, करैं ग्यारस पखवारी, विधि सिद्धि करैं सारी, जो जो सुन आये
राजा राज प्रजा चैन, सुख सेती दिन रैन, बीतते हैं दुख हैन
भय रहा ना काल बवाल का
मृत्यु ना रही अकाली
पूर्व पुण्य के परकास, राजा हुया चन्द्रहास, सभ की पूरता है आश, भूप महादानी
विप्र वेद प्रचारी, छत्री हुये धनुषधारी, वैश्य कंचन व्योहारी, बड़े विज्ञानी
जती सती नरनार, पुत्र पिता हितकार, भाइयों का हुया प्यार, बेपरमानी
भाट चारण कलात, कीरत करैं दिन रात, बोलैं आय परभात, आशीष बानी
पुरी करै झिम झिमाट, सुख सम्पदा के ठाठ, शेर गऊ एक घाट, पीवैं पानी
रह्या भूप का यश छाय, शोभा बरणी नहीं जाय, महोर सिंह गुण गाय
सिर बज रह्या बाजा काल का
खड़ी मौत बजा रही ताली