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बभ्रुभान कथा

ख्याल
राक्षस देश से मुक्त होय कर बाजी चल्या पवन की चाल
अनुयायी अर्जुन वृषकेतु राजा यौवनाश्व अनुशाल

सात्यकि अनिरुद्ध प्रद्युम्न यज्ञ तुरंग के हैं रखवाल
नीलध्वज हंसध्वज भूपति काल से लरत करैं नहीं टाल

उठी गरद छा लिया भान गज बाजी रथों की बनकर माल
श्यामकर्ण के पीछै जा रहे चमकैं सिरोही भलकैं भाल

दलों का सुम्मार नहीं कुछ कंपैं धराधीश धरण रही हाल
बाजे झुझाऊ चलैं बाजते महोर सिंह की बजैं खड़ताल ॥

दोहा
अमरीका के प्रांत में, दल बल पहुंचा जाय ।
अर्जुन के सिर मुकुट पर, गिद्ध बैठ गया आय ॥

अबसो चलकर बाजी मणिपुर आया ॥ टेक ।

जहां बभ्रूबाहन भूप, सत्यव्रती देव रूप, महादानी है अनूप, जा का यश छाया
विप्र वेद प्रचारी, जहां छत्री धनुर्धारी, वैश्य कंचन व्योहारी, अतुलित माया 1॥

जहां पतिव्रता नार, त्रियाव्रती भरतार, झूठा निंदक चोरजार, ज्वारी कढ़वाया
पुरवासी आठों याम, पूजैं देवता तमाम, हरे कृष्णा हरे राम, नाम मन भाया 2॥

सभ्यता से बोलैं बैन, यज्ञ होती दिन रैन, रंक रोगी कोई हैन, हष्ट पुष्ट काया
मणि माणक मुरास, हीरा पन्ना प्रकाश, मानो विष्णु का निवास, खास दरसाया 3॥

पुरी करै दम दमाट, सुख संपदा के ठाठ, शेर गऊ एक घाट, पानी प्याया
घोड़ा अमरीका के देश, हुया पुरी में प्रवेश, महोर सिंह नै हमेश, हरी गुण गाया 4॥

चौपाई
घोड़ा पकड़ भेजा घुड़साला
पटा ना पढा हुआ सायंकाला ।

पार्थ कहै इस देश का हाला
सुनाओ हंसध्वज भूपाला ॥

दोहा
हंसध्वज कहने लग्या सुन पार्थ बलवान ।
यहां से सलामत निकलना मत समझै आसान ॥


जो पकड़ लिया यहां घोड़ा तो फिर कौन छुटावैगा ॥ टेक ।

वेदों का विद्वान विचक्ष्ण
इसमें दशों धर्म के लक्षण
ओट्टै कौन जब शसतर तीक्षण
धनुष चढ़ावैगा 1॥

कुबेर से भी अधिक धनवान है
दानी बल हरिश्चंद्र समान है
नृप चौदह विद्या निधान है
नीचा दिखावैगा 2॥

इस नृप को हम सब भूपाला
आ आ कर देते हर साला
युद्ध करै नहीं देगा टाला
रण फतह पावैगा 3॥

बभ्रूबाह से यहां बलदैया
हजारों योद्धा जंग खिलैया
कहै महोर सिंह कृष्ण अब नैया
पार लांघवैगा 4॥

दोहा
यहां तो सोच विचार में, बीत गई सब रात ।
वहां पट्टा पढ़ा तुरंग का, होय गया परभात ॥


बभ्रूबाहन भूपाल नै
पटा पढ़ दरबार लगाया ॥ टेक ।

लगा कै दरबार बोला बभ्रुबाहन नरवीर
सम्मती मिलाकै कहो मंत्री और सलाहगीर
पंडवों की यज्ञहो रही हथनापुर गंगातीर

श्यामकर्ण घोड़ा छोड़ा देश दिग्विजय हेत
रक्षक पिता अर्जुन और संग बहोत से बानेत
दलों का सुम्मार नहीं आय गए रणखेत
वो तुरंग सायंकाल नै
पटा पढे बिना बंधवाया 1॥

वैसा ही करूंगा जैसी मन्शा होगी तुम्हारी
युद्ध की सलाह है तो फ़ौजों की करो तैयारी
देर मत लाओ जल्दी बोलो सब दरबारी

संधि की कहो तो संधि करने को तैयार
दूत आय जाय रहे मतना लगावो बार
घोड़े की कहो तो दे द्यूं मेरै नहीं इन्कार
पंडूसुत कुंतीलाल नै
संजोग उठा यहां लाया 2॥

सबकी राय लेकै सुबुद्धि मंत्री बोला बैन
पुत्र का धर्म है पितृ सेवा करै दिन रैन
आज्ञा का पालन करै बड़ों का यही कहन

घोड़ा आगै कर कै चलो क्षमा अपराध करवाओ
पिता के चरण गहो भेंट देकै दर्श पाओ
तुरंग के सहाय बनो सेना ले कै संग जाओ
पलटो और सब ख्याल नै
धन भाग पार्थ यहां आया 3॥

मंत्री के वचन सुन भूप कै चढा है नूर
नक्कारों पै चोब पड़ी नौबत झडैं बाजैं तूर
घुरैं हैं निशान ध्वजा पताका नृतत हूर

गज बाजी रथ पीनस पालकी लई सजाय
सूत मांगध बंदी भाट चारण लिए बुलवाय
छत्र चंवर और शस्त्र धारी गए आय
जय बोलैं लगे चाल ने
पद महोर सिंह नै गाया 4॥

दोहा
रत्नों के गाड़े भरे आगै किया तुरंग ।
पिता से मिलने को चला लस्कर ले लिया संग ॥


चला मिलन पिता से बभ्रूबाह नरेश ॥ टेक । (जंगम)

मणि माणक पिता की भेंट भूप छखड़ों के बीच भरवाये रहे
मृग-मद कापूर केसर के भार करहों ऊपर लदवाय रहे
भूरे हाथी और श्यामकर्ण घोड़े सज-सजकर आय रहे
भूरे हाथियों के होदे क्वारी कन्याओं से छाय रहे जी
जयति जयति जय बोल चले हैं मना कै सिद्ध गणेश 1॥

श्यामकर्ण आगै कर लिया नृप लस्कर लेकर ध्याया जी
बड़ी दूर से आता नज़र पड़ा नीचे को शीश झुकाया जी
आ पार्थ के गहे चरण रोमांचित नैनों में जल छाया जी
कह मैं हूं आपका औरस पुत्र अपना सब भेद बताया जी
बभ्रूबाह नाम है मेरा जोहूं था बाट हमेश 2॥

अनहद बाजे बजैं वेद धुनि और जयती जयति धुन छाय रही
दुम्बीकर लाजा कुसुम मोती क्वांरी कन्या बरसाय रही
विरदावली बंदीजन गावैं वारांगना नृत्य दिखाय रही
और साज बाजैं गा रहे गवैया जनता खुशी मनाय रही
बभ्रूबाह चरणों में पड़ा गत हुआ काल विशेष 3॥

पारथ की पक्ष के बोले भूप सुत का पारथ सत्कार करो
बड़ी देर हुई चरणों में पड़ा सिर पुचकारो और प्यार करो
यो पुत्र पिता का परम भक्त है मन में खूब विचार करो
कह महोर सिंह अब मान बढ़ाओ तुरंग का मुख तैयार करो
यो है देश नागों का पारथ बभ्रूबाह नागेश 4॥

दोहा
हूणहार भावी प्रबल, मेट सकै ना कोई ।
व्यंग वचन कहने लगा, भावी के बस होय ॥


वेश्यां के जाम कुजाम मोहे बदनाम क्यूं करता है ॥ टेक ।

अभिमन्यु हुआ मेरे तन से
डरा ना चक्र्व्युह के रन से
सुभद्रासुत पलभर भी मन से
नहीं बिसरता है 1॥

जो तू मेरे विंद से होता
शस्त्र बांध आता जब सोहता
वैश्य पुत्र अब जात ल्हकोता
रण से डरता है 2॥

नट चरिया कर मृदंगधारी
नचाया कर अपनी महतारी
व्यंग वचन कहे लात की मारी
नृप रिस भरता है 3॥

सुन कै पुत्र पिता के बैना
हो गया खड़ा रक्त हुये नैना
महोर सिंह हरिहर दिन रैना
नाम सुमरता है 4॥

दोहा
बभ्रुबाह कहने लगा पकड़ो यज्ञ तुरंग ।
ले जाओ उपहार सब यहां मंडैगा जंग ॥


अब क्या से क्या होता है देखो वैश्य पुत्र के हाथ ॥ टेक ।

जो कुछ कही सो सह लई सारी
लात सही जो सिर में मारी
वैश्य पुत्र नटनी महतारी
ये दो जिगरी घात 1॥

दोनूं बोल नहीं अंग समाते
हो गए घाव जिगर को खाते
अब तुम क्यो नहीं शस्त्र उठाते

चुप बैठे किस बात 2॥

आज मामुली रण मैदान ना
क्या मेरे क्या थारे प्राण ना
जब मोहे छत्री पुत्र जानना
दिन से कर द्यूँ रात 3॥

धनुष तुला से तोल अब लाऊं
तोल तोल यमपुर पहुंचाऊं
महोर सिंह कहै नित गुण गाऊं
पत रखियो ब्रजनाथ 4॥

दोहा
तीन अर्ब सेना सुभट बभ्रुबाह के संग ।
गज रथों का सुम्मार ना अर्बुध दोय तुरंग ॥

मै शरण आपकी आया था
कुंतीसुत पुत्र भाव से ॥ टेक ।


देता भेंट चरण पूजा करता
भेंट में राज पाट सब धरता
तनै समझ लिया आया डरता
ठोकर मार ठुकराया था
मैं आया पितृ लगाव से 1॥

तू कलंकी पिता कलंकी तेरा
निष्कलंक कुल का सब बेरा
देख हाथ रण में अब मेरा
काल तुझे यहां लाया था
आया था भरा चाव से 2॥

सुनकर बचन भूप अनुसाला
दल ले चढ़ा मांड दिया पाला
बभ्रुबाह बना सरजाला
दल सब मार भगाया था
बोला अनुसाल राव से 3॥

राक्षस पति मेरे सन्मुख आजा
आज काल तेरे सिर पै साजा
अस्त्र शस्त्र सर बेअंदाजा
छोड़े बिरथ बनाया था
मुर्छित हुया शस्त्र घाव से 4॥

महोर सिंह बिन छत्रधारी
सेना भाग चली है सारी
कालरूप बभ्रुबाह बलकारी
प्रथम जंग फतह पाया था
बल झाल उठैं दिल दरियाव से 5॥

दोहा
कृष्ण पुत्र प्रद्युम्न नै करी धनुष टंकोर ।
बभ्रुबाह से लड़न को चढ़ा बांधकर ज़ोर ॥

बभ्रुबाहन बलवान से
प्रद्युमन ने मोर्चा लाया ॥ टेक । (सांगीत)


दोनों तरफ सेती धावा बोल दिया एक संग
भीड़े हो गये मोर्चे जब मचा महाघोर जंग
कायरों कै हालहोल शूरवीरों कै चढ़ी उमंग
शक्ति सांघ बरछी बहैं चल रही सेल भाल
परिघ तोमर गदा दंड बाजैं पट्टीस भिन्दिपाल
रथ टूटैं घोड़े मरैं हाथी पडैं हाल-हाल
शस्त्रों के घमसान से
लाखों नै प्राण गंवाया 1॥

कहीं खांड़े खुड़क रहे हैं कही बाजैं तलवार
रुंड मुंड झूझ रहे होय रही मारो मार
हजारों कबंध कूदैं रण हुया भयकार
खूनधार बह चली रणभूमि राच रही
खड़ग खप्पर लिए चौंसठ जोगनी भी नाच रही
कूदैं हैं भयंकर भैरूं हाय होय माच रही
धूलि रण मैदान से
इस कदर उठी नभ छाया 2॥

बभ्रुबाह प्रद्युम्न से शोभायमान रणखेत
सरजाल बनावैं काटैं दोनों वीर बानेत
जंग के खिलारी कभी मूर्छित कभी हों सुचेत
कभी तो गिगन चढैं कभी धरा ऊपर लड़ैं
धनुषों की टंकोर घोर बाणों से अगन झड़ैं
गज बाजी रथ भुजा शीश कटकट पड़ैं
सर छूटे बेपरमान से
प्रद्युम्न देख घबराया 3॥

बभ्रुबाह बीर नै प्रद्युम्न जा दबाय लिया
रथ तोड़ा रथवान मार के विरथ किया
घोड़े भी कत्ल किए धनुष बान काट दिया
इतने में अनुसाल मूर्छा से जाग आया
बभ्रुबाह निकट खड़ा होकै दैत्य दलदलाया
गदा युद्ध करने लगा महोर सिंह पद गाया
जैमिनी के आख्यान से
भाषा संगीत बनाया 4॥

दोहा
अनहूणी हूणी नहीं हूणी की नहीं टाल ।
भावी के बस होय कर उठे सकल भूपाल ॥


एक दम सब राजा बभ्रुबाह पै चढ़ आये ॥ टेक । (आल्हा)

जोबनास्व चढ़ा सेना लेकर पुत्र सुबेग को संग लगाय
नीलध्वज हंसध्वज नृप चढ़े चतुरंगी दल रहे सजाय
मेघवर्ण अनिरुद्ध सात्यकी नै जा मोर्चा दिया है लाय
मोहरे मिल गए दोनों दलों के ईष्ट देवता रहे मनाय
बलैं आंख आपस में जिनकी चेहरों पै रही सुरखी छाय
भरी वीरता बभ्रुबाह में चढ़ा चाव नहीं अंग समाय
अस्त्र शस्त्र तीक्ष्ण धारों के अमोघ शक्ति लई मंगवाय
जंग खिलारी भट बलकारी बारी गई लड़न की आय
दोनों दलों के सुभट सूरमा खड़े सर चाप चढ़ाये 1॥

उत्कट भट रणधीर धनुर्धर धनुषों की कर रहे टंकार
धरा गगन बाणों से छा गए भिड़-भिड़ झड़-झड़ पड़ैं अंगार
बाणघात से घायल हो हो मुर्छित हुये हज्जारों हजार
कहीं सेल कहीं सांघ बहैं हैं कहीं तो बाज रही तलवार
कहीं तो लग रहया मल्ह अखाड़ा कहीं फरसी कहीं गदा प्रहार
लाखों मर्द जान दे गए गज बाजी रथों का नहीं सुमार
बभ्रुबाह के रन को देख सब राजा कर रहे सोच विचार
जान बचाओ छोड़ो मोर्चा हथियारों को दो यहां डार
शस्त्र प्रहार बंद किए करने खड़े हैं सब घबराये 2॥

जैमिनी ऋषि कहै सुन जनमेजय पारथसुत कर गया कमाल
लड़ते-लड़ते दिन बदीत हुया होय गया जब सायंकाल
हंसध्वज आदि सब राजा घेरे बिछा दिया सरजाल
शस्त्र पटक दिये सब राजों ने अर्जुन से नहीं लागी ढाल
पकड़ जकड़ सब आगै कर लिए बचे थे सो सब लिए संभाल
जंग जीत मणिपुर को चल दिया धन-धन चित्रांगदा के लाल
धन्यवाद सब देते जा रहे हंसध्वज आदि भूपाल
कारागार में कैद किए नृप घोड़े बंधा दिये घुड़साल
संकल ताले ठोक दिये हैं पहरेदार बैठाये 3॥

बृषकेतु से अर्जुन बोला सुन ले बेटा लगा कै कान
शूरवीर सब खप गए रण में बहोत घना हो गया नुकसान
अब तो बेटा मेरी तेरी बाकी दोय रही हैं जान
मेरा भी गोंदा ह्यईं का है बैठा गीध मुकुट पै आन
रथ के ऊपर सोवै कबूतर देख जिया हो गया हैरान
बिना शीश की छाया दीखै मेरै तो छा रही गिलान
तूं बेटा चल्या जा हथनापुर बचैं तो अपने बचा ले प्राण
कृष्ण युधिस्ठिर आगै सारा विरदंत यहां का दिये बखान
जैमिनी अश्वमेध पद कथ-कथ महोर सिंह नै गाये 4॥

दोहा
जो अब रन से हट चलूं, मुख मोड़ैगी नार ।
कूख लजैगी मात की, देंगे सब धिक्कार ॥


लगै छत्रापन कै दाग भाग जो मैं अब रण से जाऊं ॥ टेक ।

जो अब रण से चलूं भाग जी
पुश्तैनी लगता है दाग जी
प्राणों का कर द्यूंगा त्याग जी
दाग नहीं लाऊं 1॥

पाप किए हुए सब धुल जाते
धब्बे नहीं धुलन में आते
आज्ञा दो अब क्या समझाते
धनुष बान ठाऊं 2॥

झूझ मरूं तो हूं स्वर्गवासी
पीठ दईं घलै जम की फांसी
लख समझाओ पिता जग हांसी
ना मैं करवाऊं 3॥

मंडैगा रण उदै हो गया भानू
आज्ञा दो सरचाप संधानूं
कहै महोर सिंह मैं कुछ नहीं जानूं
नित्य हरि गुण गाऊं 4॥

ख्याल
पार्थ कहै बेटा वृषकेतु बस अब हो लई बहोत घणी
काल कै सन्मुख तोहे ना भेजूं तूं है मेरा मुकटमणि ।

शूरवीर सब रण में खप गए दस-दस हज़ार गज़ बल के धणी
कुछ घायल कुछ पड़े कैद में बणी तो बेटा कैसी बणी ।

यो है मुल्क नागों का बेटा नागराज यहां माहां रणी
हमको भी ज़रूर मारैगा यो है बड़ा जहरीला फणी ।

बभ्रुबाह का दोष नहीं है गलती सारी है अपणी
पार्थ गये बखत को झींखै महोर सिंह नै साख्य भणी ॥

दोहा
वृषकेतु कहने लग्या, तजूं जो अब संग्राम ।
बट्टा लग ज्या वंश कै, फिर जीवन किस काम ॥


इतने में धनुष टंकारता
बभ्रूबाहन चढ़ आया ॥ टेक । (त्रिभंगी)


आय गाड्या रणखंभ, हुया रण का आरंभ, बभ्रुबाह के असंभ, दल संग आये
इधर उठे वृषकेत, धीर वीर है बानेत, सेना साज रण हेत, सन्मुख ध्याये
खड़ा दे रेहा ऐलान, बभ्रुबाह बलवान, अब हो ले सावधान, अवसर पाये
कर्ण दानी का हूं जाम, वृषकेतु मेरा नाम, अब मांड कै संग्राम, करूं मन चाये
इतनी कहकै बांध ज़ोर, करी धनुष की टंकोर, अरिदल में मचा शोर, बाण झड़ लाये
वृषकेतू नै सर सांध, सर पंजर दिया बांध, सब जोधा लिये फांद, जब घबराये
रण मोर्चे को त्याग, शूरवीर चले भाग, भिड़ैं बाण बरसै आग
कोई सन्मुख नहीं निहारता
वृषकेतु से भय खाया 1॥


वृषकेत बभ्रुबाह, जुट गये नरनाह, जिनके बल की ना थाह, मंड गए पाले
जुटे हाथियों से हाथी, लड़ैं पदाती पदाती, दोनूं औड़ चलैं काती, बहैं सेल भाले
कहीं सांघ शक्ति जुद्ध, कहीं होता गदायुद्ध, आपे की ना सुध बुध, हुये मतवाले
कटा बढ़ी रही मांच, सबकी हूणी गई नाच, रण भूमि रही राच, बहैं खून नाले
उठै शस्त्रों का धर्राट, दल हुये बाराबाट, धरा जाती पाट-पाट, अम्बर हाले
शस्त्र छातियों को फाड़, खोल देते हैं दराड़, जब भुनण लग्या भाड़, घाव बहोत घाले
घाव करैं चस-चस, खून पड़ै टस-टस, बिंध रही नस-नस
लाखों पड्या सिर को मारता
लाखों ने प्राण गंवाया 2॥


देव अस्त्रों से लड़ाई, लड़न लगे दोनों भाई, धीर बीर बलदाई, हैं तुल्य बली
जब तक अस्त्र रहे हाथ, अग्निदेव किया घात, कभी हुई बरसात, कभी हवा चली
वृषकेतु के तिक्षण तीर, बभ्रुबाह को गए चीर, बिकल हो गया शरीर, लगी तलामली
दूजा चाप सर चढ़ाया, बभ्रुबाह जा उठाया, उठा गिगन मे घुमाया, पड़ा धरण हली
पड़कै हो गया बेहोश, चेत हुया करकै रोष, कहै किसी का ना दोष, भावी नाह टली
जब बोल्या नागराज, वीर भाज्या जा तो भाज, तेरे सिर ऊपर आज, कड़क रही बिजली
लड़ते लड़ते इस रीत, दिन पांच गए बीत, हुई नहीं हार जीत
रण को तूं नहीं बिसारता
अब काल तेरे सिर छाया 3॥


जद बोल्या बभ्रुबाह, वृषकेतु वाह-वाह, तेरे बल की बीर थाह, ना मोहे पाई
रण हो लिया बहोत, पड़ी लोथ ऊपर लोथ, वीर अब तेरी मौत, सिर पर छाई
रणभूमि को दे त्याग, अब भी भाग्या जा तो भाग, काल निकट रहा लाग, तेरा भाई
शस्त्र अर्ध-चंद्राकार, छोड़ा धनुष ऊपर धार, आवैं बरसते अंगार, सेना घबराई
वृषकेतु का सिर काट, सेना करी बाराबाट, कटे शीश का गग्गाट, मच्या नभ मांईं
आय कटे सिर नै ताक, बभ्रुबाह कै रट्टाक, बीर भूला आकबाक, मुरछा खाई
उठा होय कै सचेत, कहै धन्य वृषकेत, खूब खेला रणखेत
पद महोर सिंह उचारता
भाषा में छंद बनाया 4॥

अरिल
चित की उदासी देखकर पारथ को हो गया ख्याल जी
वृषकेतु अब तक नहीं आया हुया सायंकाल जी ।

इतने में कृष्ण गोविंद कृष्ण गोविंद नाम उचारता
वृषकेतु का कटा शीश आ पारथ के चर्ण चुचकारता ।

पारथ नै सिर पुचकार कर हित सैं हिये कै ला लिया
दरसै थी सो हो कै रही किये कर्म का फल पा लिया ।

पारथ फिर गए बखत का मन मांही धोखा धर रहा
हूमर हूमर मारता वृषकेतु का दुख भर रह्या ॥

दोहा
वृषकेतु तेरे बिना, बिगड़ गए सब काम ।
बिहूना सब कुछ हो गया, राजपाट धन-धाम ॥

वृषकेतु तेरा किस बिध सबर करूं ॥ टेक । (जंगम)

बेटा योवनाष्व राजा को जीतकर श्यामकरण तू ही ल्याया था
भद्रावती पति मूर्छागत का तैनैईं प्राण बचाया था
तू ही श्यामकरण का रक्षक बन देशों को जीतता आया था
बलके सागर विद्या आगर दिग्विजयी नाम धरवाया था
ओर जाहां जाहां तै जंग किया हुई फतह जंग की पाया था
मणीपुर के खेत आलोटी सार पारथ नैनी जल छाया था
तै वृषकेत दिया खोल दराड़ा कैसे यो घाव भरूं 1॥

बेटा यज्ञ संपूरण हुई नहीं विप्रों को दिया गया दान नहीं
जो ऋषि महर्षि आए यज्ञ में उनका हुआ सन्मान नहीं
और द्रुपद सुता सह धर्मपुत्र का हुआ अवभृथ स्नान नहीं
याचक सब जांगे निराश क्या फिर निंदा करै जहान नहीं
निंदित जीवन से मरण भला क्या तजूंगा अब मैं प्राण नहीं
तेरे बिन वो अर्जुन ना धनुष वै लख्संधानी बान नहीं
अभिमन्यु सुत आज मरा है कैसे धीर धरूं 2॥

हथनापुर अब कैसे जाऊं पुछैगी तेरी महतारी
सुनते ही हा-हाकार मचै महादारुण दुख होगा भारी
सुन चिता बनाय सती हो ज्यागी पुत्र तेरी परणी नारी
सुन मेरे सिर में देंगी धूल हथनापुर की तिरिया सारी
तूं पिता का बैर लेन आया था बन कर मेरा सहचारी
गए रूस कृष्ण या सोय गये कहीं और चले गए हितकारी
तूं तो रण में खेल मरा मैं हूमर मार मरूं 3॥

कटा शीश पड़ा मेरे चरणों में रन भूमि में पड़ी ल्हास
निज पितामहे को रूधिर अर्ध दे पाय लिया तै स्वर्गवास
खप गए वीर कुछ पड़े कैद में रण सामग्री नहीं पास
श्रीकृष्ण रूस गए आज पुत्र अब किसकै आगै करूं अरदास
वृषकेतु हाय वृषकेतु हाय छाती सिर धरकर मारै श्वास
मूर्छित हो पारथ पड़ा धरण में सब तरियों हो गया निरास
महोर सिंह पै कृपा करो हरी नाम नहीं बिसरूं 4॥

दोहा
बभ्रुबाह के सुन वचन पारथ हुया सुचेत ।
उठा कड़ककर धनुष ले भड़क उठा बानेत ॥


लडैं सिरों की बाजी ला रहे
मंड्या पिता पुत्र का पाला ॥ टेक । (सांगीत)

अरे वैश्यपुत्र मेरे नाम कै तैं लाया दाग
थोड़ी देर बीच कर द्यूंगा तेरे प्राण त्याग
सुनकै बचन बभ्रुबाह कै लगी है आग
दुर्बुद्धि धनंजय तेरी रसना पै बोलै काल
विधि विष्णु शिव तेरी आय करैं प्रथपाल
तो भी ना बचैगा आज कृष्ण भी लगावै ढ़ाल
शस्त्र चाप चढ़ा रहे
बहैं सेल शक्ति सर भाला
भिडैं शस्त्र बरस रही ज्वाला
जलैं मुकट सुभट सिरहाला 1॥

हाथियों के होदे जले घुड़लों के जलैं जीन
रथों के गुमद जलैं रथी हुए रथहीन
पिता पुत्र अस्त्र शस्त्र विद्या में हैं परवीन
कभी तो अगन बरसै कभी होती बरसात
कभी तो पवन चलै कभी तेज़ बाण घात
कभी तो उजाला भासै कभी अंधियारी रात
अस्त्रों से अस्त्र लड़ा रहे
कटी सेना भागे रिसाला
बह चला रुधिर का नाला
भर पीवैं जोगनी प्याला 2॥

कूदैं हैं कबंध और झूझ रहे रुंड मुंड
खा रहे घुमेरी गज बाजी बिना सुंड तुंड
जहैं तहैं देखैं वहीं रक्त के भरे हैं कुंड
तुमुल शब्द होते उठै धनुषों का धर्राट
उल्कापात होय रहे धरती जाती पाट-पाट
गज बाजी पती उतर उतर कर मौत घाट
स्वर्ग लोक को जा रहे
ल्हाशों का पड़ा अटाला
भखे सायुज स्वान श्रंगाला
हो गया रणखेत हिमाला 3॥

बभ्रुबाह बोल्या अर्ध-चन्द्र शस्त्र चाप धर
पृथा पुत्र द्रोण विद्या स्वर्ग विद्या यादकर
मारूंगा छोड़ूं नहीं कृष्ण को भी ले सुमर
कार्तिकी एकादशी को शस्त्र अर्ध-चंद्राकार
पार्थ का शीश काट गया छाया अंधियार
हा-हाकार मची चली हवा कंकरी उडार
महोर सिंह पद गा रहे
कथ भाषा छन्द निराला
ये भावी नै घर घाल्या
हुया भयकार भौंचाला 4॥

.

दोहा
बभ्रुबाह बड़ी धूम से, चला जीतकर जंग ।
झूझ मरे सो मर गये, बचे सो ले लिए संग ॥


मणीपुर को धाया बभ्रुबाह रणजीत ॥ टेक ।

रण को जीत चल्या बलकारी
पेशवाई आवै सजी सवारी
न्योछावर करैं कन्या कुंवारी
गावैं हैं मंगल गीत 1॥

मणीपुर बाग बहार छा रही
उसी अवसर चित्रांगदा आ रही
उलूपि के महलों में जा रही
पति चरणों में प्रीत 2॥

चित्रांगदा पूछै मुस्काती
किसकी खुशी मनाई जाती
उलूपी सारा हाल सुनाती
चित्रा हुई भयभीत 3॥

सुन चित्रा लगी करन विलापा
मुंडी धुनै घाल रही सापा
महोर सिंह अबतो आ गया बुढ़ापा
हरि भज तज अनरीत 4॥

दोहा
कंठसूत्र चूड़ामणी, बेशर कुंडल हार ।
चित्रांगदा नै गेर दिये, उतार सब सिंगार ॥

मुंडी धुन-धुन करै विलाप चित्रांगदा पारथ की रानी ॥ टेक ।


उलूपी पहुंची बाग मंझार
जहां पार्थ के सात अनार
सातों की हुई देखी छार
उलूपी वहीं तजण लगी प्रानी 1॥

आई करती हा-हाकार
पटके उतार सब सिंगार
माथा कूटै बारम्बार
करै अपघात मरण की ठानी 2॥

एक बांदी चली तज रणवास
पहुंची बभ्रुबाहन के पास
जाकर बरण्या सब इतिहास
रोवै बोले आरत बानी 3॥

सुनते ही चल्या उठ भूपाल
झट आया माता पै चाल
महोर सिंह देख के हाल बेहाल
नृप नैनों में भरण लग्या पानी 4॥

दोहा
चरण पकड़ लिए माता के, बभ्रुबाह नै जाय ।
ठोकर से ठुकराय कर, बोली वचन सुनाय ॥


दुर्बुद्धि महादुष्ट तेरा नहीं मुख देख्या चाती ॥ टेक ।

गर्भाक्षीण गर्भ से होती
तो क्यूं आज दुखभर रोती
रहती बांझ तो सुख से सोती
क्यूं मैं बिलखाती 1॥

तूं जन्मा तकदीर मेरी फूटी
दुश्मन बेटा बनकर लूटी
जनमत दई ना विष घूंटी
अब मैं पछताती 2॥

पिता हत्या नहीं काया कांपी
मेरा भी शीश काट महापापी
हो ना बज्रपापों की माफी
बांधव के घाती 3॥

चिता बनाय अभी जल जाऊं
मुख तेरा नहीं देख्या चाऊं
महोर सिंह नित हरि गुन गाऊं
हित से दिन राती 4॥

दोहा
कटुक वचन कह पुत्र को, माता गयी मुख मोड़ ।
बभ्रुबाह बोल्या वचन शीश झुका कर जोड़ ॥


जननी पिता की गलती है सारी
मेरा तो कुछ दोष नहीं है ॥ टेक ।

शुभ दिन मना जलूस बनाया
भेंट ले पिता सन्मुख धाया
जा चरणों में शीश नवाया
सिर में लात की मारी
उस लात का रोष नहीं है 1॥

मैंने तो मान पिता का राख्या
पिता नै प्रेम का रस नही चाख्या
ऐसा व्यंग वचन उन भाख्या
कह ना सकूं महतारी
कहूं तो खामोश नहीं है 2॥

सुन-सुन माता विलाप तेरा
मेरै तो छा गया अंधेरा
अपनै हाथ काट सिर मेरा
लेकर तेग दुधारी
मरने का अफसोस नहीं है 3॥

कटै जिगर लगी भाह्य मरम में
बदनामी दुख लिख्या कर्म में
महोर सिंह नै भूल भरम में
उंवर गंवा दई सारी
गाफिल हुया होश नहीं है 4॥

दोहा
चित्रांगदा उठ चल पड़ी, पीछै सब रणवास ।
छाती माथा कूटती, गई ल्हाश कै पास ॥


अरिल
गयी है ल्हाश के पास स्वास भर मारती
मृतक पति के जाय चरण चुचकारती ।

करने लगी अपघात बैठ कर पास में
हाय पति हाय पति निकसै स्वास दर स्वास में ।

मां सास कोंता के पाईं पड़न का भाव था
बहन सुभद्रा द्रोपदी से मिलने का चाव था ।

सोला सहस्र रानी कृष्ण की यज्ञ में आ रही
सबसे मिलन का था प्रेम कर्म फल पा रही ।

मन का मनोरथ झूठा आज सब हो गया
प्राणनाथ मझधार के बीच डबो गया ।

अरे दुष्ट पुत्र अब बैठा क्यूं नैन बहा रह्या
जल्दी सी दे मोहे मार बख़्त अब आ रह्या ॥

दोहा
अरे कपूत इस बख़्त जो, कुंती आ गई चाल ।
कहैगी डाकन भख लिया, आज ये मेरा लाल ॥

लगी कहन उलूपी पति को जीवाउंगी ॥ टेक । (जंगम)

जब नाग सुता पार्थ की वधू करकै विलाप बोली बानी
मत रोवै बहन अब धीर धार जाऊंगी पीहर मन में ठानी
मेरे पिता के घर संजीव मणि एक जड़ी भी है वहीं संधानी
और अमी के जहैं तहैं कुंड भरे हैं मेरे से है नहीं छानी
इनके सेवन से मृतक हुए सब सजीव हो ज्याते प्राणी
मैं बेसर कंकण कुंडल रख द्यूं जाय पिता के अगवानी
यहां का सब विरदंत सुना कै मणि को ल्याऊंगी 1॥

कहै पुंडरीक अहि उलूपी से धर्म बहन प्रथम मैं जाऊंगा
वासिक राजा से जाय तेरे वैधव्य का हाल सुनाऊंगा
ल्या कुंडल कंकण बेशर दे राजा को जाय दिखाऊंगा
एक मुहूर्त में वाहाँ पहोंची बहन संजीवक मणि मैं ल्याऊंगा
मैं डंक मार पारथ की ल्हाश कै जहर की लहर चढ़ाऊंगा
फिर बिगडैगी नहीं ल्हाश चहे मैं देरी से भी आऊंगा
कह उलूपी जल्दी जा तेरे नित गुण गाऊंगी 2॥

जब पुंडरिक ल्हाश को डस पाताल लोक को ध्याया जी
कोई मुहूर्तो के अरसे में पहुंच वासिक को शीश नवाया जी
कुन्डल कंकण आगै रख दिये रण का विरदंत सुनाया जी
संजीव मणि अमी जल्दी द्यो उलूपी नै यहां पठाया जी
सुन वचन शेष नै निज मंत्री धृतराष्ट्र नाम बुलवाया जी
मणि लेने को उलूपी का भेज्या पुंडरीक यहां आया जी
उलूपी ने कहा नहीं देंगे तो फिर मैं जाऊंगी 3॥

अहि राज कहै संजीव मणि द्यो मंत्री कर गया इनकारी
जो दे दें मणी हम पुंडरीक को आपत्ति आवै भारी
सुनते ही गरुड़ घमस्यान करै आ नष्ट सम्पदा हो सारी
सुन शेष कहै धृतराष्ट्र मंत्री किस काज आज तेरी मती मारी
है कृष्ण मणि पार्थ के पास में तीन लोक की उजियारी
कह महोर सिंह क्यूं घमंड करते नाग नथैया गिरधारी
उलूपी चितवन करै मणि का कब फल पाऊंगी 4॥

दोहा
इतने में पुंडरीक भी, मणिपुर पहुंचा आए ।
मणि मिली ना अहिसुता, दिया वृदन्त सुनाय ॥


सुन पुंडरीक की बानी रानी करन लगी अपघात ॥ टेक ।

हाय पति पतनिन के अनुरागी
कौन गुना पिया पत्नी त्यागी
हमरे घर आकर बड़भागी
करी न हमसे बात 1॥

उठती बैठती जागती सोती
खाती पीती न्हाती धोती
हरदम बाट आपकी जोती
हम दोनूं दिन रात 2॥

हुई ना हमरे मन की चाही
क्या से क्या बन गयी छन मांही
होण हार कभी टलती नांही
धोखे धर पछतात 3॥

पुत्र को धिक धिक जन्म हमारा
पिता को सहस्र बार धिक्कारा
महोर सिंह नै लिया सहारा
पत्य रखियो ब्रजनाथ 4॥

दोहा
बभ्रुबाह कहने लगा, माता धीरज धार ।
मणी अमृत को ल्याय द्यूं, अष्ट कुली संघार ॥


अजि येजी कोपकर चढ़ा बभ्रुबाह बली
शस्त्रों से सजी दस हजार भट सेना संग चली ॥ टेक । (सांगीत)

अतल वितल सुतल तलातल गया बभ्रुबाह
रसातल महातल पाताल पहुंचा नरनाह
भोगवती पुरी के जा घेर लिए सब राह
शंख ध्वनि करकै पीछै धनुष की करी टंकोर
भोगावती पुरी मांही घर घर मच्या शोर
अष्ट कुली चढ़े सेना लेले बांध बांध ज़ोर
लग गयी तला मली 1॥

धृतराष्ट्र चढ़ा नाग अष्टकुली लिए संग
करकोटक कुलीक तक्षक शंखक वासुकि भुजंग
मूषकाद भासुर दीर्घजिव्हू खेलण चले जंग
रत्न जड़ित साज दिव्य रूप रहे धार
पांच योजन माहीं सर्प सेना का है विस्तार
द्वि त्रि चतु: पंचशत फणों सेती फुंकार
मारैं हला हली 2॥


विष ज्वाला छोड़ रहे मोर्चा दिया लगाय
बभ्रुबाह के भटों की पार कुछ ना बसाय
जहर की अगन से सब मूर्छित हुए आय
सर वर्षा कर रहा बभ्रुबाह बलवान
मार मार बाणों सेती कर दिया घमस्यान
मुकटमणि मालमणि शीशमणी आन-आन
पड़ी हैं रेत रली 3॥


जीवदमणि अमी धृतराष्ट्र मंत्री ल्याय रहा
मणि अमृत सेती मरे हुयों को जिवाय रहा
विष ज्वाला छोड़ बभ्रुबाह को दबाय रहा
शस्त्रों की लड़ाई कभी अस्त्रों सेती लड़ रहे
गज बाजी रथपति कट कट पड़ रहे
महोर सिंह अश्वमेध पर्व के पद जड़ रहे भावी नाहीं टली 4॥

दोहा
अंग भंग धृतराष्ट्र हो, भाग्या पीठ दिखाय ।
द्विस्वंभाव दुर्बुद्धि दोऊ, लीन्हे पुत्र बुलाय ॥

मसोरा हो रह्या अब क्या जतन बनै ॥ टेक । (जंगम)

नृप वासिक कहै धृतराष्ट्र दुष्ट नै बिघन का बोय दिया कांटा
आया पुंडरीक मणि लेने को क्या अमृत का यहां था घाटा
राजा देने को तैयार था किया दुष्टपना मंत्री नाटा
निर्बुद्धि मंत्री के मंत्र से मैं भी करवा लिया दांत खाटा
आज मंत्री पद से पतित किया निर्बुद्धि का अब बेरा पाटा
वैधव्यपना पुत्री का यादकर जिगर जलै बह सरणाटा
मणि अमृत वासिक नै ले लिए चल्या समुदाय घनै 1॥

सुत द्विस्वंभाव दुर्बुद्धि पिता अपने की धीर बंधाते हैं
तुम सबर करो बदला लेंगे पारथ का शीश चुराते हैं
फिर मणि अमृत क्या देंगे काम वासिक से पहले जाते हैं
आज्ञा पा दोनूं चाल पड़े मणिपुर कै खेत चल आते हैं
सब शोक निद्रा में सुते पड़े अर्जुन का शीश उठाते हैं
जा शुन्य विपिन में पटक पास में बैठे खुशी मनाते हैं
कटा शीश पारथ का मुख से कृष्ण ही कृष्ण भनै 2॥

फिर उसी अवसर हथनापुर में कुंती को स्वपन एक आया है
दु:स्वपन देखकर चमक उठी जा धर्म सुत भीम जगाया है
और सुभद्रा द्रोपदी जगा लई श्री कृष्ण भी पास बैठाया है
लगी कहन व्यथा पार्थ का अंग गोबर सेती लिपटाया है
दिखे तेल में भीगे वस्त्र गरध पै चढ़ दक्षिण दिशा को धाया है
दुस्स्वपन देख कर आज कलेजा फट रहा दिल दहलाया है
धनंजय का शीश कटा हुया दर्श्या है स्वपनै 3॥

मणि अमृत ले वासुकि गया बभ्रुबाह से मेल मिलाप हुया
आपस में विनती करन लगे दोनूं का हिरदा साफ हुया
जो नागों से हुआ था क़सूर वो कसूर भी सब माफ हुया
दुर्बुद्धि सिर को छुपा रहा द्विस्वंभाव आय संग आप हुया
विवरों से बाहर हो सुना कोलाहल सुन सबको संताप हुया
ना शंखध्वनि ना जयति ध्वनि गया लहास पास चुपचाप हुया
महोर सिंह हरि भज नर देह ना बारंबार जनै 4॥

दोहा
ल्हाश पड़ी सिर है नहीं, मुख से निकसी हाय ।
बभ्रुबाह होकर विकल, पड़ा मूर्छा खाय ॥

हो रहा माहाकलेश शेष नरनारी रुदन करैं ॥ टेक ।

उलूपी चित्रा विलाप चूंटैं
हूमर मारैं माथा कूटैं
कह रही भाग जिन्हों के फूटैं
उनके कंथ मरैं 1॥

वासिक बैठा नैन बहाता
सुता का रुदन सहा नही जाता
आंसु पूंछै हिये लगाता
ना वै धीर धरैं 2॥

उसी अवसर में भीम गिरधारी
गरूड़ यान पहुंचे नभचारी
यशोदा कुंती देवकी सारी
लख रणखेत डरैं 3॥

मणि दीपक रणखेत भयाना
सुन कुलाहल अति भय माना
महोर सिंह नित हरिगुण गाना
अटके काम सरैं 4॥

दोहा
उतर यान से चल पड़े, गये ल्हाश कै पास ।
रुदन करै मूंडी धुनै, बैठा सब रणवास ॥

रह्या पूछ भीम बलवान बंधु मेरा किसने मारा है ॥ टेक ।

मेरे बंधु के पास में बांधव की उणिहार
कहो दूसरा कौन है सूत्या पैर पसार
ये दुश्मन है या प्यारा है 1॥

कहां बंधु का शीश है कहां वीर वृषकेत
इतने ही में हो गया बभ्रुबाह सुचेत
भीम सैं वचन उचारा है 2॥

नैनो में जल भर रहा कहन लग्या कर जोड़
इस अपराधी दुष्ट का गदा मार सिर फोड़
यो महापापी हत्यारा है 3॥

बंधु हत्या बाबल हत्या दल किये बाराबाट
चक्र सुदर्शन से प्रभु अधर्मी का सिर काट
चरण गहे शीश पसारा है 4॥

मैं मणी अमृत लेन को गया सातवें पाताल
पीछे से सिर चुर गया ले गया कोई चिंडाल
ज़ुलम भावी नै गुजारा है 5॥

कहा न जा ना कह सकुं बीत्या सो विरदंत
महोर सिंह निरधार को दीनानाथ भगवंत
अब तो आपका सहारा है 6॥

अरिल
कुंती करत विलाप सुपन साचा हुआ
दीख्या था रणखेत रगत रचा हुया

ह्याँईं का गोंदा लिख्या था लाल तेरे भाग में
तूं मरा झूझ जलूंगी मैं तेरी आग में

मुखड़ा लेती देख जो पहले आंवती
हुमर पे हुमर मार मात बिलखांवती

मरया भी ना तजता धनुष सबर कैसे करूं
बह्या है जिगर में तीर धीर किस बिध धरूं ॥


दोहा
कुंती के चरणों पड़ी, उलूपी चित्रा आय ।
दोनों सिर पुचकार कर, लीन्ही पास बैठाय ॥


जब कहन लगे जगदीश शीश अब पार्थ का आवैगा
जिन हड्या शीश उस तस्कर का भी सिर संग में ल्यावैगा । टेक ।

जब लगे प्रतिज्ञा करन सदा से बाल ब्रह्मचारी हों
यशोदा देवकी समान त्रिया सब धर्म की महतारी हों
दुनिया में जितनी बहन सुभद्रा से भी अति प्यारी हों
माता पुत्री भगनी समान दुनिया की सब नारी हों
मेरे ब्रह्मचर्य के धर्मसे तस्कर कर्म का फल पावैगा 1॥

मेरे ब्रह्मचर्य धर्म के फल से अब सिर पार्थ का आवै
जो ब्रह्मचर्य खंडित हो तो सिर मेरा भी गिर ज्यावै
इतने में शीश आ गया गिगन से कृष्ण कृष्ण मुख गावै
कुंती की गोद में पड़ा उठा माता छाती कै लावै
तस्कर का शीश भी पड़ा उसे कोई सायुज भख जावैगा 2॥

  ला रही शीश छाती कै कुंती बोली आरत बानी
मैं याचक बन जाचूँ हूँ आपको जीव प्राण के दानी
पहले वृषकेत सुचेत होय यही बात मेरे मन मानी
पीछै पार्थ को जीव दान दीजै हो सारंगपानी
कब सी वो अवसर मिलै कर्णसुत धनुष हाथ ठावैगा 3॥

पहले वृषकेत सापुष्ट किया कुंती की आज्ञा पाकै
पीछे सजीव कर दिया पार्थ जीवदमणि अमी छुहा कै
जब देव दुंदुभि बजे गिगन हुये मगन पुष्प बरसा कै
मणी अमृत का तो नाम जगतमणी बख्त पै पहुंची आकै
कह महोर सिंह युहीं काम सरैं जो कृष्ण कृष्ण गावैगा 4॥

दोहा
खुशबख्ती सबकै छई, हो रहा मेल मिलाप ।
बभ्रुबाह बोलै नहीं, बैठा है चुपचाप ॥


कह भीम वीर बभ्रुबाह उदासी क्यों तेरै छ्याई ॥ टेक । (चित्रमुकुट)

करा न कोई कर सकै जो तैने किया काम
जा सातवीं पाताल में नागो से संग्राम
किया तै जंग फते पाई 1॥

सुफल परिश्रम हो गया मणि अमृत आया लेय
अर्जुन और वृषकेतु को जीवदान दिया देय
मिटा दई सबकी दुखदाई 2॥

पिछला मैं सब सुन लिया पुत्र तेरा विरदन्त
वंश उजागर कर दिया धन्य धन्य बलवंत
पिता धन्य धन्य तेरी मांई 3॥

पार्थ का सब दोष है तेरा कुछ नहीं दोष
निंदा सुन निज मात की खून खा गया जोश
वीरता तन में जग आई 4॥

वचन घाव भरता नहीं शस्त्र घाव भर जाय
व्यंग वचन का बंधु नई लिया पुत्र फल पाय
घाव अब भड़कैगा नाईं 5॥

रोष रंज को त्याग दे कर अब मेल मिलाप
महोर सिंह उठ खड़ा हो पकड़ हाथ सरचाप
तुरंग का हो ज्या अनुयाई 6॥

दोहा
भीम कहै निर्दोष तूं, निष्कलंक निष्पाप ।
अर्जुन के लग्या हुया है, गंगाजी का श्राप ॥

हम नै भारथ के जंग में
दल हते क्षोहणी ज्ञारा ॥ टेक । (सांगीत)

कुल गुरु विद्या गुरु हम नै सब मार दिये
प्रोहत आचारी घाट मौत के उतार दिये
गोती घाव घाले रिश्तेदार संघार दिये
मित्र परम मित्र हते कर दई कुनबा घानी
मरा ना जिवाया कोई कभी ना गिलान मानी
पाप पुण्य सम तेरे तू है पुत्र जीवदानी
फतह पाय रण दंग में
पाप समझ कै चाप बिसारा 1॥

कृष्ण कृष्ण रटने से महापापी हुये पार
आज वै प्रत्यक्ष खड़े पांडवों के हितकार
दर्शनों से कोटी जन्म किये पाप होईं छार
त्राहि कृष्ण त्राहि कृष्ण त्राहि कृष्ण जाप कर
कृष्ण के चरण गह कुटम्ब से मिलाप कर
तूं है निसकलंक मत जीव को संताप कर
दाग ना तेरे अंग में
इतनी कह सिर पुचकारा 2॥

भीम के वचन सुन भ्रम सब हुया दूर
कृष्ण जी के दर्शनों से चढा है सवाया नूर
पिता के चरण गह नौबत झडैं बाजैं तूर
भाई भाव सेती मिले बभ्रुबाह वृषकेत
शीश पुचकारै कुंती धन्य पुत्र बानेत
चित्रा और उलूपी बभ्रुबाह को आशीष देत
भर रहे सब उमंग में
बजैं धौंसा ढ़ोल नंगारा 3॥

लोथ जो पड़ी थी रण में कृष्ण नै सजीव करी
जय बोल चले मणीपुर को सुरत धरी
बाजैं हैं बधाई चलैं निरत करत परी
बड़ी धूम धाम से जा पुरी में प्रवेश हुए
दान पुण्य हवन घर बार घृत दीप जुये
कृष्ण दर्श सेती कोटी जन्म करे पाप धुये
महोर सिंह हरी रंग में
दिल रंगै तो हो निस्तारा 4॥

दोहा
पांच दिवस मणिपुर, बसे पार्थ आदि बलवान ।
विध सिध से होते रहे, खान पान सन्मान ॥


आ छठे दिवस उदय हो गया भान ॥ टेक । (जंगम)

जब छठे दिवस का भान उदय हुया वासिक राजा आया जी
आ कृष्ण कै आगै भेंट धरी चरणों में शीश नवाया जी
कुंती से समध मिलाप हुया सब ही का मान बढ़ाया जी
सबका सतकार कर वासिक नें श्रीकृष्ण से वचन सुनाया जी
भोगावती पुरी जाना चाहता करो मेरे मन का चाह्या जी
सुन वचन कहन लगे जाओ भूप श्रीकृष्ण से आयुष पाया जी
मणि अमृत को लेकर वासिक चला है बैठ विमान 1॥

फिर भीमसेन को पास बैठाकर कहन लगे जादूराई
तुम जाओ भीम गजपुर धर्मसुत को हो रही होगी दुखदाई
संग चित्रा उलूपी कुंती देवकी ले ज्यावो यशुधा मांई
तुम यज्ञ आरंभ कराओ जाय मैं तो अब चलने का नाईं
आगै वह सब भूपाल घने हरिभक्ति सब कै मन भाई
मेरे बिन वै सब अजेय जीतूं बनकै अश्व का अनुयाई
वचन मान वधुव्टेद संग ले चले है भीम बलवान 2॥

जब भीम वासुकी चले गए पारथ से बोले गिरधारी
अब देर करन का काम नहीं फौजूं की करो तैयारी
द्यो तुरंग छोड़ अब सिद्ध जोग है मंगल गाय रही नारी
सब आओ सभट ले आओ तुरंग पुजा की सामग्री सारी
करो हवन दान और पुण्य अस्त्र शस्त्रों से सजो सब बलकारी
अब बाजे झुझाऊ बजने द्दो जय बोल उठो सब दरबारी
बटैं बधाई हवन हो रहे होने लगे गौ दान 3॥

जब बभ्रुबाह कर जोड़ खड़ा हुया श्रीकृष्ण के अगवानी
चरणों में शीश झुका दिया जब पार्थ से बोला बानी
पिता राज करो सिर ताज धरो नादान की बख्सो नादानी
अब तुरंग का मैं रक्षक बन दिग्विजय करूं मन में ठानी
पार्थ कहै मैं तुरंग का दिक्षित नहीं चलने से मेरी हानी
पुत्र तुम भी चलो संग मैं भी चलूं सजधज सब आ गये सेनानी
महोर सिंह कहै श्यामकर्ण का होय गया प्रस्थान 4॥

--- शुभं मंगलम भू नाथ ---