ख्याल
पार्थ कहै बेटा वृषकेतु बस अब हो लई बहोत घणी
काल कै सन्मुख तोहे ना भेजूं तूं है मेरा मुकटमणि ।
शूरवीर सब रण में खप गए दस-दस हज़ार गज़ बल के धणी
कुछ घायल कुछ पड़े कैद में बणी तो बेटा कैसी बणी ।
यो है मुल्क नागों का बेटा नागराज यहां माहां रणी
हमको भी ज़रूर मारैगा यो है बड़ा जहरीला फणी ।
बभ्रुबाह का दोष नहीं है गलती सारी है अपणी
पार्थ गये बखत को झींखै महोर सिंह नै साख्य भणी ॥
दोहा
वृषकेतु कहने लग्या, तजूं जो अब संग्राम ।
बट्टा लग ज्या वंश कै, फिर जीवन किस काम ॥
इतने में धनुष टंकारता
बभ्रूबाहन चढ़ आया ॥ टेक । (त्रिभंगी)
आय गाड्या रणखंभ, हुया रण का आरंभ, बभ्रुबाह के असंभ, दल संग आये
इधर उठे वृषकेत, धीर वीर है बानेत, सेना साज रण हेत, सन्मुख ध्याये
खड़ा दे रेहा ऐलान, बभ्रुबाह बलवान, अब हो ले सावधान, अवसर पाये
कर्ण दानी का हूं जाम, वृषकेतु मेरा नाम, अब मांड कै संग्राम, करूं मन चाये
इतनी कहकै बांध ज़ोर, करी धनुष की टंकोर, अरिदल में मचा शोर, बाण झड़ लाये
वृषकेतू नै सर सांध, सर पंजर दिया बांध, सब जोधा लिये फांद, जब घबराये
रण मोर्चे को त्याग, शूरवीर चले भाग, भिड़ैं बाण बरसै आग
कोई सन्मुख नहीं निहारता
वृषकेतु से भय खाया 1॥
वृषकेत बभ्रुबाह, जुट गये नरनाह, जिनके बल की ना थाह, मंड गए पाले
जुटे हाथियों से हाथी, लड़ैं पदाती पदाती, दोनूं औड़ चलैं काती, बहैं सेल भाले
कहीं सांघ शक्ति जुद्ध, कहीं होता गदायुद्ध, आपे की ना सुध बुध, हुये मतवाले
कटा बढ़ी रही मांच, सबकी हूणी गई नाच, रण भूमि रही राच, बहैं खून नाले
उठै शस्त्रों का धर्राट, दल हुये बाराबाट, धरा जाती पाट-पाट, अम्बर हाले
शस्त्र छातियों को फाड़, खोल देते हैं दराड़, जब भुनण लग्या भाड़, घाव बहोत घाले
घाव करैं चस-चस, खून पड़ै टस-टस, बिंध रही नस-नस
लाखों पड्या सिर को मारता
लाखों ने प्राण गंवाया 2॥
देव अस्त्रों से लड़ाई, लड़न लगे दोनों भाई, धीर बीर बलदाई, हैं तुल्य बली
जब तक अस्त्र रहे हाथ, अग्निदेव किया घात, कभी हुई बरसात, कभी हवा चली
वृषकेतु के तिक्षण तीर, बभ्रुबाह को गए चीर, बिकल हो गया शरीर, लगी तलामली
दूजा चाप सर चढ़ाया, बभ्रुबाह जा उठाया, उठा गिगन मे घुमाया, पड़ा धरण हली
पड़कै हो गया बेहोश, चेत हुया करकै रोष, कहै किसी का ना दोष, भावी नाह टली
जब बोल्या नागराज, वीर भाज्या जा तो भाज, तेरे सिर ऊपर आज, कड़क रही बिजली
लड़ते लड़ते इस रीत, दिन पांच गए बीत, हुई नहीं हार जीत
रण को तूं नहीं बिसारता
अब काल तेरे सिर छाया 3॥
जद बोल्या बभ्रुबाह, वृषकेतु वाह-वाह, तेरे बल की बीर थाह, ना मोहे पाई
रण हो लिया बहोत, पड़ी लोथ ऊपर लोथ, वीर अब तेरी मौत, सिर पर छाई
रणभूमि को दे त्याग, अब भी भाग्या जा तो भाग, काल निकट रहा लाग, तेरा भाई
शस्त्र अर्ध-चंद्राकार, छोड़ा धनुष ऊपर धार, आवैं बरसते अंगार, सेना घबराई
वृषकेतु का सिर काट, सेना करी बाराबाट, कटे शीश का गग्गाट, मच्या नभ मांईं
आय कटे सिर नै ताक, बभ्रुबाह कै रट्टाक, बीर भूला आकबाक, मुरछा खाई
उठा होय कै सचेत, कहै धन्य वृषकेत, खूब खेला रणखेत
पद महोर सिंह उचारता
भाषा में छंद बनाया 4॥