दोहा –
हुई मनादी भूप की, बजैं ढ़ोल और भेर ।
जो पीछै रह ज्यायगा, दें तप्त तेल में गेर ॥
अजी एजी भूप नै भरवा तेल कढ़ाया
भट्ठा ऊपर चढ़ा दिया है नीचै अगन जलाया ॥ टेक ।(सांगीत)
शंख लेखक राजप्रोहत भट्ठा में लगावैं खूंढ
हो गयी प्रचंड अग्नि तेल में उठै झगूंड
आये नहीं आये की दलौं में होय रही ढूंढ
राजा की हिदात सुण भगे दौड़े आय रहे
तप्त तेल देख-देख बीर घबराय रहे
पारथ के मुकाबले पर मोर्चा लगाय रहे
दल का व्यूह बनाया 1॥
पुत्र मित्र भाईबंध रिश्तेदार सगा सोई
मामा फूफा साला सठना जमाई चाहे हो भनोई
पीछै जो रह जायगा इस तेल में पड़ैगा वोई
सुधन्वा नै तलबी से जा माता के चरण गहे
शीश पुचकार दिया आशिखा वचन कहे
पीठ मत दिखाइये बेटा प्राण रहो जावो चहे
क्षण भंगुर है काया 2॥
सुधन्वा की बहैन कुबला मार्ग मेँ खड़ी पाई
भैया आगै कहैन लगी सासरा की दुखदाई
धीर धोप देकै आगै बढ़ा बीर बलदाई
आगै बढ़ा सुधन्वा नै देखी खड़ी निज नार
हो रहे सुशोभित आभरणों से सोलहों सिंगार
हाथ जोड़ बोली थोड़ी देर डटो भरतार
चरणों में शीश नवाया 3॥
प्रथम रजोधर्म हुया ऋतुवती नार तेरी
शुद्ध हुये सोलवां दिन इच्छा पूर्ण करो मेरी
तुम हो मेरे जीवन मैं हूँ आपके चरणों की चेरी
मनुष्य का ना धर्म दिन में पशु पक्षी करैं भोग
धर्मशास्त्रों में दिन का कहीं ना लिखा संजोग
महोर सिंह छंद कथै बुढ़ापा का लगा रोग
अब नहीं जाता गाया 4॥