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नीलध्वज कथा

ख्याल –
पुष्य नक्षत्र शुभ सिद्ध योग में हथनापुर सै छुटा तुरंग
तुरंग रक्षक अर्जुनादि पीछै हुये ले ले चाप निषंग ।

योवनास्व अनुशाल प्रद्युमन वृषकेतू सेना ले संग
बाजे बजन लगे जयति ध्वनि सुन सुभटों के लहराये अंग ।

बाजी भगे हिणहिनाते जा रहे चिंघाड़ैं मतवाले मतंग
शुभ सूचक लगे शगुन होण मन बढ़े चढ़ी वीरौं कै उमंग ।

नीलध्वज राजा के राज में पहौंचा बाजी मंडैगा जंग
महोर सिंह गावै कथा पंडवीं बाजै तंबूरा पेटी मृदंग ॥


दोहा –
माहिष्मती नृप की पुरी, राणी ज्वाला नाम ।
प्रवीर नामा पुत्र है, मदन मंजरी बाम ॥

सुत नीलध्वज भूपाल का बागौं में कर रहा केली ॥ टेक ।

बागों की सैर करै सैलानी
संग है मदन मंजरी रानी
संग सखी कर रही मनमानी
नारीवृंद विशाल का
एक प्रबीर है मन मेली 1॥

इतने में एक आया तुरंग जी
साज से सज रह्या अंग-अंग जी
माथै पटा विचित्र ढंग जी
जर्ध केश कंधवाल का
है पीत पुच्छ और सेली 2॥

श्वेत रंग और काले कान जी
सुम च्यारों विद्रुम समान जी
निकट खड़ा हो गया आन जी
पटा बांचकर भाल का
कहै पकड़ो सखी सहेली 3॥

मंदन मंजरी पति से बोली
पकड़ो तुरंग वस्तु अनमोली
महोर सिंह तैं आँख ना खोली हुया चौरासी साल का
बिरथा कई पीढ़ी पेली 4॥

दोहा –
पकड़ा तुरंग प्रवीर नै, वचन त्रिया के मान ।
पहौंचि गये दल पार्थ के, उसी अवसर में आन ॥


कर अदृष्ट यज्ञ तुरंग को
सेना ले प्रबीर आया ॥ टेक । (सांगीत)

रण बाजे बजन लगे मोर्चा दिया लगाय
टंकारैं धनुष ईष्ट देवता रहे मनाय
मारैं है चिंघाड़ गज बाजी रहे हिणहिणाय
हो गया आरंभ रण का कड़कैं धनुष छुटैं बान
रण अग्नी प्रचंड हुई रणबेदी पै आन-आन
प्राणों का रणधीर बीर करने लगे बलिदान
जीता चाहै जंग को, रण खेलै रंग रचाया 1॥

चमक रही रणबेदी दमक रह्या रणखेत
आहूती लगै है रथ गज बाजियों समेत
समर में प्रबीर नै मूर्छित करया वृषकेत
उसी अवसर बीच अनुसाल पहौंच गया आय
मोर्चा लिया डाट अस्त्र शस्त्र रहया बरसाय
मूर्छित प्रबीर करा सेना भी लई दबाय
कायर भगे तज रण दंग को, जा भूप से हाल सुनाया 2॥

नीलध्वज नृप कै घर जंवाई अग्निदेव रहता
ससुर का मददगार दुश्मनों का दल दहता
कोई भी भूपाल नीलध्वज से ना लड़ना चहता
पार्थ से संग्राम कर भूप हुया लाचार
धनुष पै चढ़ाया अग्नि अस्त्र पड़ैं अंगार
हो गया भयभीत दल मांच गई हा-हाकार
तज पार्थ के संग को, भागण लगे दल घबराया 3॥

मांच गई धूमा धोल पार्थ के दल माहीं
होय गया प्रचंड अग्निदेव धीर धरै नाहीं
निजरूप धार लिया शूरवीर भगे जाहीं
गज बाजी महिष ऊंट बैल सभ गये भाग
निष्फल हुया वरुण अस्त्र बुझै ना बुझाई आग
महोर सिंह जस गावै जगह-जगह रही लाग
देख अगन के ढंग को, पार्थ का दिल दहलाया 4॥

दोहा –
पार्थ विनती कर रहा, धर अग्नि का ध्यान ।
पुरषार्थ निष्फल हुया, भूल रहा औसान ॥

अग्निदेव माहाराज आज क्या गुस्ताखी मेरी ॥ टेक ।

जन खांडीव भस्म कर दीन्हा
शरीर तेरा निरोग कीन्हा
गुण भूला कर दिया बलहीना
लगी नहीं देरी 1॥

तेरै हेत यज्ञ हम कर रहे
यज्ञ हेत सर्वस्व को धर रहे
तेरा मुख नित हवी से भर रहे
आराधना तेरी 2॥

तूण कवच रथ धनुष तैं बख्शा
कहा था रण में करैगें रक्षा
आज तैं मेरा दलबल भक्षा
जबान क्यों फेरी 3॥

हे परम मित्र तेरी शरणाई
शांति पकड़ मिटै दुखदाई
महोर सिंह निज नाम सहाई
हरि भज हर बेरी 4॥

दोहा –
विनती से माना नहीं, कर लई बारंबार ।
नारायण अस्तर लिया, अर्जुन नै चुचकार ॥

नारायण अस्त्र से अग्निदेव घबराया ॥ टेक ।

अस्त्र देख गई बिगड़ कांती
हुया भयभीत लई पकड़ शांती
कंप गया लई मेट भ्रांती
विप्र रूप धर आया 1॥

अग्नि देव कहै चेटक कीना
करा नहीं तूं दलबल हीना
अपना जान दंड मैं दीना
चेत तुझे करवाया 2॥

क्षीर समुद्र पै वास करै है
अजा दुग्ध की आश करै है
खद्योत से परकाश करै है
वो मूरख कहलाया 3॥

जब थारै घर यादवराई
करै पवित्र एक छन माईं
क्यों नाहक ये यज्ञ रचाई
महोर सिंह जस गाया 4॥

दोहा –
किसी का तन दाझा नहीं, था चेटक का ख्याल ।
कष्ट हुया ना मरा कोई, दल की करो संभाल ॥


क्षमा पाय पारथ से अग्निदेव सिधारे जी ॥ टेक ।


अग्निदेव राजा पै आया
सादर बठा कै वचन सुनाया
धन्य जामात जंग फते पाया
कारज सारे जी 1॥

जिनकै पखै रहैं नन्दलाला
उनको कौन जीतने वाला
देकर तुरंग मिलो भूपाला
रण हम हारे जी 2॥
अग्निदेव की सुनकर वाणी
तुरंग दे मिलूँ भूप नै ठाणी
भड़क उठी है ज्वाला राणी
वचन उचारे जी 3॥

हमारे घर दलबल के ठाठा
जमैया क्यों रण जंग से नाटा
अस्त्र शस्त्र धन का नहीं घाटा
भरे भंडारे जी 4॥

चढ़ा भूप त्रिया वचन मान कै
तीन खोहन दल संग बलवान कै
दिया मोर्चा लाय आन कै
धनुष टँकारे जी 5॥

लड़ा दिनभर हुया सायंकाल जी
मूर्छागत हुया महीपाल जी
महोर सिंह दल गये चाल जी
न्यारे न्यारे जी 6॥

अरिल –
मूर्छा खुलत बोला नृपति हो कबसी प्रात:काल जी
दे तुरंग पार्थ से मिलूँ करूँ भेंट में धनमाल जी ।

मूर्छा दई मारा नहीं बकस दिये मेरे प्रान जी,
गुण भूलूँ ना पार्थ के बदलै तन करूँ बलिदान जी ।

घर खोवा नारी के वचन मान कै बंधु मैं मरवा दिया,
कई पुत्र भी मारे गए कई घर खाली करवा दिया ।

रानी कहै अश्व दे दिया तो घर से मैं चली जाऊँगी,
मुख देखूं फिर तुमरा नहिं अपना भी नहीं दिखलाउंगी ।

राजा कहै चिंडाल नार तूं अभी घर से बाहार हो,
महोर सिंह पार्थ से मिलूँ चाहे विमुख सब संसार हो ॥

दोहा –
हुकम हुया भूपाल का, बजे मनादी ढ़ोल ।
सजधज सब आवो यहाँ, जयति जयति जय बोल ॥

अजी एजी राजा करने लगा तैयारी
पारथ से होगा मिलाप सज धज आवो नर नारी ॥ टेक । (सांगीत)


हीरा पन्ना मोती मणियों के भरवाये थाल
मोहर अशर्फियों की कौन कर सकै संभाल
उषणी अनुकूल दिये सिरोंपाव भूपाल
नोबत नफ़ीरी धोंसे ढ़ोल बज रहे मृदंग
भेरी नाद तुरही बाजैं आगै कर लिया तुरंग
नृतत जा रही अप्सरा पुरवासी सब चले संग
जय बोलैं दें बलिहारी 1॥

तुरंग सहित भेंट सभ आगै रख दई जाय
क्षमा मांगै पार्थ से शीश को रहा झुकाय
मेरे लायक सेवा हो सो जल्दी दीजे फरमाय
पार्थ बोला घोड़े का सहायक बन एक साल
दल बल लेकै भूपाल मेरे संग चाल
हथनापुर को चलता करदे भेंट का सब धनमाल
बन मेरा सहचारी 2॥

पार्थ के दलों की नीलध्वज करै जोनार
छप्पन और छत्तीस भोग व्यंजनों की जिम्मनवार
खान पान करकै सब होय लिये तैयार
पार्थ नीलध्वज के दलों का बना एक दल
अर्जुन के पास अब होय गया पूरा बल
कूँच का नक्कारा बज्या संग में बजा बिगल
तुरंग है आगाकारी 3॥

पवनबेग होकै दक्षिण दिशा को तुरंग चल्या
जंग का खिलारी तुरंग पीछै सब उमंग चल्या
रणबाजे बजते चले दलबल संग चल्या
विंध्य पर्वत पास एक पत्थर की खड़ी तस्वीर
घोड़े नै कंधवाल खसी पत्थर का बना शरीर
महोर सिंह देख सब धीर हो गये अधीर
चिंता हुई बड़ी भारी 4॥

(ख्याल)
रात पाड़कर निकसी ज्वाला पीहर की जन सूरत धरी
रोती पीटती झुंटा खोसती भाइयों पै गई रोष भरी ॥ टेक ।

आँसू पौंछ सिर पुचकार भाइयों नै पास में बैठाई
ऐसे बुरे ढंग से भैना किस कारण तू यहाँ आई
उल्मुक पूछ रह्या भैना से क्या है तुझको दुखदाई
धीर धार परिवार बडेरी साच बता माँ की जाई
होश हवास बिगड़ रहे तेरे कन तेरी या दशा करी 1॥

पारथ नै घर फूक दिया धनमाल लूट लिया सभ मेरा
मारे पुत्र दल बल ले लिया हुया जमैया पारथ का चेरा
तुरंग दे मिला पति पारथ से छाया अकल पर अंधेरा
बरजौं थी मत दे तुरंग देने से हल्कापन तेरा
धक्के मार मैं घर से काढ़ दई इस कारण हुई बेअदरी 2॥

तुम मेरे आँसू पौंछते हो तो अर्जुन से जा मांडो जंग
बंधु कहै कोई दिन खामोश कर अभी नहीं लड़ने का ढंग
रो रो गाली बकण लगी है भाई भतीजे कर लिए तंग
सब नै दई दुद्कार दुष्टणी यहां चढै नहीं तेरा रंग
पति नै घर सै काढ़ दई तो जल में डूब कहीं क्यों ना मरी 3॥

अपना तो तै दिया उजाड़ भाइयों का आई उजड़ करण
खप्पर भरनी नार जोगनी आई हमारै खप्पर भरण
तेरी मत तो हड़ी राम नै म्हारी मत्य तूं आई हरण
बुरी कार घर बाहर हो तूं ज्या महोर सिंह प्रभु तेरी शरण
दीनानाथ दयाल दयाकर दीन की रखियो लाज हरी ॥

दोहा -
पति नै धक्के दे दिये, भाइयैं दई दुद्कार ।
गंगातट पर जायकै, नाव में हुई सवार ॥

कलिहारी नारी नौका में बैठ चली ॥ टेक ।

नाव में बैठी जाय रही है
पग नीचे लटकाय रही है
बुरी-बुरी मन में आय रही है
होय रही पगली 1॥

नौका में ना सूच रही है
जल भिड़ गया पग पूंछ रही है
गंगाजी को भी गूच रही है
है ना ये भी भली 2॥

नावड़ियेँ जल महिमा गाई
एक ना मानै करै बुराई
रूप धारकर गंगा मांई
जल बाहर निकली 3॥

सात पुत्र तेरै देह धारा
जण जण पापण भख लिया सारा
एक बचा वो पारथ नै मारा
बदला ना लिया गंगली 4॥

जिस दिन शस्त्र पुत्र का छूटै
उस दिन शीश पिता का टूटै
छठै मास कुंती सिर कूटै
रोवैगी द्रुपद लली 5॥

गंग किनारै चिता बनाकै
बैठ गई दृढ़ आसन लाकै
बदला ल्यूगी पर घर जाकै
लगाकै अगन जली 6॥

ज्वाला जली ज्वाला कै संग में
बज्र प्रगट हो गया अंग में
वो ही बज्र बभ्रूबाह निषंग में
बनकर भाल घली 7॥

जिस घर में त्रिया कंकाली है
वो घर सब तरियों खाली है
महोर सिंह होने वाली है
अब तो तेरी बदली 8॥

(ख्याल)
नीलध्वज राजा की पुत्री स्वाहा नाम कहलाई
गुणवती रूपवंती की जणने हारी ज्वाला माई ॥ टेक ।

स्वाहा से राजा पूछ रह्या पुत्री किसको परनाऊं
अब ब्याहन जोग हो गई विवाह का दिन धर ब्याह रचाऊं
किसी राजा राजकंवर की कहै तो उसी को यहाँ बुलाऊं
सुर नर मुनियों की कहै तो अब स्वयंवर का ढंग बनाऊं
सुन वचन पिता के शरमा गई माता बुला पास बठाई 1॥

माता से पुत्री कहन लगी मैं मनुष्य को नहीं बरूंगी
सब देवों में हो देव बड़ा उसको स्वीकार करूंगी
माता नै इन्द्र का लिया नाम फिर लिया तो दुख भरूंगी
व्यभचारी कलंकी को ब्याहोगे तो खाकर जहर मरूंगी
मोहे अग्निदेव को परणाओ जो करो मेरे मनचाई 2॥

अग्नि को वरूं तो ऐसे वरूंगी बिना बुलाया आवै
मेरे पिता कै आगै पल्ला पसारै तब मुजको पर्णावै
सब देवों में बड़ा अग्नदेव भगवान का मुख कहलावै
मुख में हो हवन हवी का हक सब देवों को पहूंचावै
सब सखी सहेली हसन लगी भैना किसनै बहकाई 3॥

मींढा का वाहन तपत है तन में धूमाधार मुख माहीं
मुख में जिह्वा हैं सात उदर ना भरै सकल जग खाईं
हैं तीन नेत्र सर्वभक्षी बहन अणमिल संजोग सब राहीं
तूं किस पर रीझी हमारै तो यो वर पसंद है नाहीं
सुणा वचन हसन लगी राजकुमारी महोर सिंह छवि गाई 4॥

दोहा -
धूना घालकर तपूंगी, करूं मंत्र का जाप ।
यज्ञ दान ब्रत मंत्र से, चल्या आवैगा आप ॥


उपवन में तपस्या करण चली
पितुराज्ञा पाय कुमारी ॥ टेक ।

आभूषण सिंगार शरीरी
उतारे बाना लिया फकीरी
मोह माया की काट ज़ंजीरी
अग्निदेव की शरण चली
दें धन्यवाद नरनारी 1॥

दोय टहैलवी लई संग में
चढ़ा भाव भर रही उमंग में
रंगी हुई अग्नि के रंग में
करण वा पूरा परण चली
पुरवासी दें बलिहारी 2॥

सामग्रियों के गाडे भर दिये
भर उपवन को चलते कर दिये
ब्रह्मभोज के सामान धर दिये
द्विज दारिद्र को हरण चली
धनमाल ले राज दुलारी 3॥

अग्निदेव को परनाउंगी
नहीं परणी तो जल जाऊँगी
महोर सिंह कहै नहीं आऊँगी
जनता कहै या मरण चली
बड़ी कठिन प्रतीज्ञा धारी 4॥

दोहा –
सब सेती मिलझुल लई, सब को शीश नवाय ।
दासी को ले संग में, उपवन पहौंचि जाय ॥


परण की पूरी चल उपवन में आई ॥ टेक ।

बड़ कै नीचै घासा घाला
बैठी बिछा कुशा मृगछाला
आवाहन कर जगाई ज्वाला
उठ परकम्मा लाई 1॥

रात दिना धूनी तापै है
हित से अग्निमंत्र जापै है
पल भर नहीं पलक झांपै है
निद्रा दूर दुराई 2॥

निर्भंग ब्रत कर रही बड़भागन
अनजल फलों का कर दिया त्यागन
पतिहेत बन रही बैरागन
अंग विभूत रमाई 3॥

पूरण योग सती नै साधा
भूख प्यास की है नहीं बाधा
एक तरफ को पंडित पाधा
वेद पढैं यज्ञ रचाई 4॥
दान पुण्य हों रोजां रोज जी
नितप्रति होते ब्रह्मभोज जी
महोर सिंह लई उड़ा मौज जी
वृद्धापन दुखदाई 5॥

दोहा –
नभ मारग नारद गए, अग्निदेव के पास ।
आद्योपांत वर्णन किया, स्वाहा का इतिहास ॥


ब्राह्मण बन अग्निदेव भूप कै द्वारै आये जी ॥ टेक ।

कर द्विज का स्वागत सन्माना
पूछै भूप किस बिध हुया आना
अग्निदेव हूं द्विज का बाना
वचन सुनाये जी 1॥

मैं याचक नहीं हूं धनार्थी
जाचन आया हूं कन्यार्थी
परणादे राजन परमार्थी
नै अवसर पाये जी 2॥

राजा चुप हुया प्रधान बोला
दिखा तूँ अपना अग्नि चोला
सुनकर वचन अग्नि मुख खोला
धूम दर्शाये जी 3॥

धूमा साफ किया ज्वाला जागी
मुख मांसे लुक निकसन लागी
महोर सिंह सभा उठकर भागी
दिल दहलाये जी 4॥

[ख्याल]
अग्निदेव के मुख में से एक लटा अगन की आई
उस लटा ने आकर प्रधान जी की दाढ़ी मूंछ जलाई ॥ टेक ।

मंत्री नै पर्चा पाय लिया एक थी राजा की साली
वा कहैण लगी यो अग्निदेव नहीं ब्राह्मण इन्द्र जाली
मैं करूँ परीक्षा अग्नि देव को अपने संग ले चाली
महलों में हुई परवेश कर्मफल भोगैगी कंकाली
अब अपणा असली रूप दिखा जो चाहै बणा जमाई 1॥

आंख्यों से पतंगे झड़न लगे मुख में जग उठी ज्वाला
उस कुटिल नारी का महल फूक दिया फूक दई गऊशाला
तन के बस्तर सभ जलन लगे दिये फैंक हुया बेहाला
हो नग्न भूप पै आई कहै भूप अन शाली नै घर घाला
नगरी में कोलाहल मच्या आग वा बुझती नहीं बुझाई 2॥

जनता का आरत शब्द सुणा राजा को हुया दुखदाई
सूरज की प्रार्थना करकै अस्तुति अग्निदेव की गाई
करी दया सूरज भगवान आग वा बुझ गई बिना बुझाई
बड़े विधि विधान से स्वाहा पुत्री अग्नि को परणाई
राजा बोला अग्नि से मेरे पुर के रहो सदा सहाई 3॥

राजा बोला घर जमाई बन मेरे घर होगा रहना
अग्नि नै करा मंजूर भूपति नीलध्वज का कहना
मंत्री बोला घर जमाई का घर रखना अच्छा है ना
है बड़ी शर्म की बात सुता नै सबका बोल हों सहना
नहीं माना भूप घर जमाई रख लिया महोर सिंह छवि गाई 4॥

----- श्रीरस्तु ----