दोहा –
पकड़ा तुरंग प्रवीर नै, वचन त्रिया के मान ।
पहौंचि गये दल पार्थ के, उसी अवसर में आन ॥
कर अदृष्ट यज्ञ तुरंग को
सेना ले प्रबीर आया ॥ टेक । (सांगीत)
रण बाजे बजन लगे मोर्चा दिया लगाय
टंकारैं धनुष ईष्ट देवता रहे मनाय
मारैं है चिंघाड़ गज बाजी रहे हिणहिणाय
हो गया आरंभ रण का कड़कैं धनुष छुटैं बान
रण अग्नी प्रचंड हुई रणबेदी पै आन-आन
प्राणों का रणधीर बीर करने लगे बलिदान
जीता चाहै जंग को, रण खेलै रंग रचाया 1॥
चमक रही रणबेदी दमक रह्या रणखेत
आहूती लगै है रथ गज बाजियों समेत
समर में प्रबीर नै मूर्छित करया वृषकेत
उसी अवसर बीच अनुसाल पहौंच गया आय
मोर्चा लिया डाट अस्त्र शस्त्र रहया बरसाय
मूर्छित प्रबीर करा सेना भी लई दबाय
कायर भगे तज रण दंग को, जा भूप से हाल सुनाया 2॥
नीलध्वज नृप कै घर जंवाई अग्निदेव रहता
ससुर का मददगार दुश्मनों का दल दहता
कोई भी भूपाल नीलध्वज से ना लड़ना चहता
पार्थ से संग्राम कर भूप हुया लाचार
धनुष पै चढ़ाया अग्नि अस्त्र पड़ैं अंगार
हो गया भयभीत दल मांच गई हा-हाकार
तज पार्थ के संग को, भागण लगे दल घबराया 3॥
मांच गई धूमा धोल पार्थ के दल माहीं
होय गया प्रचंड अग्निदेव धीर धरै नाहीं
निजरूप धार लिया शूरवीर भगे जाहीं
गज बाजी महिष ऊंट बैल सभ गये भाग
निष्फल हुया वरुण अस्त्र बुझै ना बुझाई आग
महोर सिंह जस गावै जगह-जगह रही लाग
देख अगन के ढंग को, पार्थ का दिल दहलाया 4॥