दोहा:-
सत्यव्रती तेरा नाम है, बीरसेन के पूत ।
वचनों का पालन करो, बनो हमारे दूत ॥
वर दे दिया जा रणवास में, नहीं रोक टोक हो तेरी ॥ टेक ।
दूत बनकै नरेश, चला लेकै संदेश, हुया पुरी में प्रवेश, महलीं ध्याया
होती नहीं रोक टोक, चरणों में सिर झोक, नर नारी मारैं धोक, कोई देव आया
सातों ड्योढ़ियों को लांघ, गया जहां खड़ी मांग, देख्या देव कैसा सांग, चित हुलसाया
हो गई मति भंग, उठैं काम की तरंग, रोम रोम में अनंग, देख प्रगटाया
नहीं झांपती हैं नैन, चित को ना पडै चैन, हाथ जोड़ बोली बैन, कंपै काया
तुम हो कौन महाराज, यहाँ आए किस काज, मेरा नल सरताज
बैठी हूं उसकी आश में, कब पूर्ण आश हो मेरी 1॥
तेरी सुनी करतूत, भेजा देवतों नै दूत, बीरसेन का हूं पूत, नल नाम मेरा
तेरी पूर्ण हुई आश, होगा स्वर्ग में निवास, कर देवों से विलास, धन भाग तेरा
माया हरी की प्रबल, बर सकै नहीं नल, देव आय गए चल, सिर साज सेरा
अब बैठकै विमान, चल स्वर्ग दरम्यान, समय सध गई आन, तज अंधेरा
जहां अमीरस भोग, कोई रोग नहीं शोग, बैठा आयकै संजोग, नल न्यू टेरा
चल फुलमाला गेर, मत नहीं लावै देर, बार बार रह्या टेर
सुन खड़ी हुई आ पास में दमयंती की सहचेरी 2॥
दमयंती नाय माथ, दोनों जोड़ लिए हाथ, तुम सुनो प्राणनाथ, मोहे तेरी शरण
प्राण प्यारे तेरे हेत, कंचन काया करी रेत, मेरे लागे राहू केत, देव आ गए बरण
मैं तो आपको वरूंगी, नहीं प्राणों को हरूंगी, घात आत्मा करूंगी, मेरा यही परण
दमयंती अकुलाय, नैनी नीर रहया छाय, कर रही त्राय त्राय, लिए पकड़ चरण
सखी लाओ फुलमाल, अभी गल में द्यूं डाल, सभी देव जांगे चाल, आए पैज हरण
जैसे चाँद को चकोर, घन गर्जना को मोर, निरख निरख चहुं और
चितवूं थी श्वास दर श्वास में
आप ही को मैं हर बेरी 3॥
देख दमयंती का भाव, चित भर गया चाव, जद बोल्या नल राव, सुन प्राण प्यारी
मेरी और कर ख्याल, दूत बनकै आया चाल, जो मैं पहरुं फुलमाल, हो ज्यां धर्महारी
चोरी दावै किए काम, तू भी होज्या बदनाम, भूप आ रहे तमाम, छत्तर धारी
उनके बीच बैठूं जाय, जब माला पहराय, तोहे ले ज्यां परणाय, देखैं नर नारी
बस अब तो मैं जाऊं, हाल देवों को सुनाऊं, फिर उनके संग आऊं, कर कै त्यारी
इतने बैन कह नल, गया महलों से निकल, भावी सबसे प्रबल
पाई जो लिखत इतिहास में
कथ महोर सिंह नै टेरी 4॥