दोहा –
भीम कहै सुन धर्मसुत, मैं भद्रावती जाय ।
ल्याऊं तुरंग को जीतकर, राजा से जंग मचाय ॥
टेक – 6 जो आऊं तुरंग छोड़ कै
लगो इतने दोछन मेरै ॥ टेक । (त्रिभंगी)
धर्मपुत्र जिस गाम, नहीं देवतों का धाम, एक कुवें पै तमाम, लोग भरैं पानी
जिस नगरी ना सरदार, पंडित गुनी साहूकार, जती सती ना दातार, ज्ञानी ध्यानी
उस नगरी में वास किये, पाप जो जो वर्ण दिये, जो आऊं बिना घोड़ा लिये, पड़ूं नरकखानी
देव द्रव्य को हरै, झूठी साख जो भरै, निंदा गुरु की करै, कूर कफगानी
चोर जार ठग ज्वारी, बेश्यां गामी मांसाहारी, ये जिन नरकों के अधिकारी
जो रण से चलूं मुख मोड़ कै
तो यम उस नरक में गेरै 1॥
करैं पाप की सला, चौकी मूठ दें घला, काटैं भाई का गला, पर हक़ खाते
करैं माता से विषाद, और पिता से विवाद, वेद शास्त्र की मर्याद, झूठ बतलाते
लेते धरोहर को मार, किये गुण दें बिसार, भोगैं गुरु की जो नार, नरकवास पाते
गंगाजलीं हाथ धर कै, साख सूरज की भर कै, गऊ ब्राह्मण बीच कर कै, फिर नट जाते
नित कर्म जिन भूले, धर्म किये ना कबूले, दूधे फले और फूले
जो काटैं वृक्ष जोहड़ के
कुकर्म करैं सुबह सवेरे 2॥
पापी लांवते जो आग, देते नारी को दुहाग, कुल रीत देते त्याग, जाति धर्म हारैं
लावैं कन्या कै जो दोष, परधन लेते खोस, भर कै गौओं पै जो रोष, लात की मारैं
नर जहर जो देते हैं, मोल कन्या का लेते हैं, आत्मघाती नर जेते हैं, जीव संघारैं
झूठ बोलैं दिन रात, करैं विप्र गऊ घात, बैठ धर्म की पंचात, भांजी मारैं
भीम घोड़े बिन आवै, इतने दोष अपनै लावै, उस नरक बीच जावै
जो खेती करैं बणी तोड़ कै
रस्ते की भूम को घेरैं 3॥
कथा भजन जज्ञ जाप, करणे दे ना करै आप, मेरै लगियो सारे पाप, जो ना घोड़ा ल्याऊं
डूबै भरा जो जहाज पाप लागो वह महाराज जो सारूं ना काज नरक वास पाऊं
जो ना आऊँ जीत जंग मेरा कुष्टि हो ज्या अंग जो ना यज्ञ का तुरंग लेकर आऊं
भाई बड़े और छोटे, मैंने सारे पाप ओटे, बज्र पाप के भरोटे, सिर पै ठाऊं
भीम ऐसे बतलावै, धीर बंधु की बधावै, महोर सिंह गुण गावै
ग्रंथों का रत्न निचोड़ कै
कथ भाषा के पद टेरै 4॥