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अश्वमेध यज्ञ प्रारंभ

दोहा –
अठारह दिन तक परस्पर, हुये जो रण संग्राम ।
पंडवों नै हरिकृपा से, राजा लिये जीत तमाम ॥


टेक पंडू हथनापुर आये जी
रण जीत कै महाभारथ का ॥ टेक ।

अष्ट दस दिन खोहन अठारा
घेर घेर पंडवों नै मारा
गोती नाती कुटम्ब परिवारा
ब्राह्मण मार खपाये जी
दोछन लगा कुल गारत का 1॥

रुदन करै माता गंधारी
शोक पड़ा पंडवों को भारी
रोय रही सौवों की नारी
पंडू धोखा खाये जी
सुन सुन कै शब्द आरत का 2॥

कर्ण महल कै आस पास जी
जाचक मारैं खड़े सांस जी
जाते हैं हो हो निराश जी
बज्र पाप कमाये जी
जल भरे नैन पारथ का 3॥

छाई उदासी सारे शहर में
पंडू डूबे शोक कहर में
महोर सिंह नारदी बहर में
भाषा पद कथ गाये जी
पद स्वार्थ परमारथ का 4॥

दोहा –
पांचों पंडू सभा में, बैठे होय उदास ।
शोक निवारण कारणै, पहुंचे वेदव्यास ॥


धर्मसुत बोले करकै गुरु का सन्मान ॥ टेक । (जंगम)

धन्य गुरु महाराज चेलों कै काज संकट में आज चल कर आये
मैं राज हेत कुलगुरु समेत किया कुल का खेत दोछण लाये
गजपुर मंझार मची हा हाकार रोवैं हैं नार क्या जश पाये
हो रह्या संताप त्रिया देंगी श्राप ये बज्र पाप म्हारै सिर छ्याये
म्हारे दोष धूवन के नाहीं बिन तीर्थ अस्नान 1॥

देकर विश्वास ऋषि बोले व्यास मत हो उदास छत्तरधारी
यही कुल की रीत लिया जंग जीत अब धर्म नीत सुन ले म्हारी
करो अश्वमेध लिखते हैं वेद हो ज्यां नापेद ह्त्या सारी
रावण संग्राम आये जीत राम अश्वमेध नाम जज्ञ बिस्तारी
जन्म जन्म के दोछन धू ज्यां ये निश्चय कर जान 2॥

सुन गुरु के बैन ना पड़ै चैन जल भर कै नैन बोल्या राजा
कुल खपा सर्व कहां रह्या गर्व कैसे बिना द्रव सुधरैं काजा
परिवार हीन मैं हुया दीन हो रह्या मलीन आवै लाजा
दिया सर्बस खोय साथी ना कोय ऐसे जज्ञ होय ना सरताजा
कुल के धौरी खप गये रण में बड़े बड़े बलवान 3॥

ऋषि रहे मुस्काय मत करै नांह्य बतलाऊं राह्य सुन ले प्यारे
हुया मरूत भूपाल जज्ञ करी सर्बकाल सुवरण के थाल लोटे न्यारे
विप्रों को दिये ना उन्हीं लिये भूम अर्पण किये गाडे सारे
बोले मंगवाय दे यज्ञ रचाय महोर सिंह गाय क्यों हिम्मत हारे
बन में गये धर्मसुत तुमको हंसैगा सकल जहान 4॥

दोहा –
धर्मपुत्र कहने लगे, सुनो गुरु महाराज ।
अश्वमेध की विधि सब, मोहे सुना दो आज ॥


अश्वमेध की विधि व्यास जी वर्णन करते हैं ॥ टेक ।

चौताल-
सुन अश्वमेध की विधि सुना दूं सारी
द्विज चाहैंगे बीस हजार प्रथम तपधारी
बीसों हजार ब्रह्मवेता ब्रह्मचारी
नवगुण कुलीन षटकर्मी वेद अधिकारी

चोपैया –
जब चैती पुन्यों आवै
उस दिन आरम्भ करावै
सम्मतसर एक बितावै
सम्पूर्ण यज्ञ कहावै

उठत –
असिपत्र व्रत धार
होय निस्तार
हजारों हजार
जन्म के दोछन हरते हैं 1॥


चौताल –
एक एक द्विज को इतनी दक्षिणा दी जाती
नित्यप्रति राजन महाराज उगत प्रभाती
एक रथ एक घोड़ा एक गऊ एक हाथी
नित एक भार सौरण दक्षिणा दर्शाती

चौपैया –
होंगे ब्रह्मभोज बड़े भारे
जाचक जीमेंगे न्यारे
जो आवैंगे जाचन हारे
नहीं खाली जांगे प्यारे

उठत –
जाचकों की मंशा भरैं
दारिद्र हरैं
जज्ञ जो करैं
दान हित सर्बस धरते हैं 2॥


चौताल –
एक श्यामकरण घोड़ा चहिये भूपाला
रंग श्वेत पीत हो पूंछ कान हों काला
माथै स्वर्ण पटा द्यो बांध निराला
ले शस्त्र पीछै रक्षा करने वाला

चौपैया –
घोड़े कै पीछै जा जा
देशों के जीतो राजा
सब देशों का धन आ जा
थारे सुधरैंगे सब काजा

उठत -
करो हवन गऊ दान
बाजी अस्थान
सहस्र प्रमाण
मूत्र जहां पुरख बिसरते हैं 3॥


चौताल –
अठसठ तीर्थ जल बनस्पति भार अठारा
नृप और बहोत चाहैंगे यज्ञ उपहारा
जत सत व्रत श्रद्धा दया ये नेम तुम्हारा
सोवैं राजा राणी हो बीच खड़ग दुधारा

चौपैया –
वर्ष एक में घोड़ा आवै
पूजन उसका करवावै
पूर्ण आहूति लगवावै
जद पूरी यज्ञ हो जावै

उठत –
महोर सिंह गुण गाय
भ्रम नस जाय
रहे समझाय
साख जैमिनी जी भरते हैं 4॥

सब तरह से हो रही लाचारी
मुनी हमसे यज्ञ होती ना ॥ टेक ।


विप्र अंश सौरण के थाला
दे चुका दान मरूत भूपाला
अब वो धन लाने से मूंह काला
निंदा करैंगे नरनारी
या हत्या म्हारी धोती ना 1॥

श्यामकरण कहो कहां से आवै
कौन तुरंग को लेने जावै
कौन राजों से जंग मचावै
हित का करनिया हितकारी
कोई दीखै नाती गोती ना 2॥

और बहोत सामग्री बताई
एक भी मिलती दीखै नाहीं
मुनि एक ही क्षण के माहीं
पैदा हो जाती सारी
जो कुल नारी रोती ना 3॥

धर्मपुत्र की सुनकर वाणी
बोले वेदव्यास ऋषि ज्ञानी
महोर सिंह ना होगी हानी
सतगुरु चरण की ताबेदारी
नैया भव में डबोती ना 4॥

दोहा –
मुनी कहै धर्मपुत्र जो, धरती का धनमाल ।
शास्त्रों के प्रमाण हैं, उसका मालिक भूपाल ॥


टेक पंडवों यज्ञ की करो मत टाल
सिद्ध काम हो ज्यांगे थारे ल्यावो द्रव्य निकाल ॥ टेक । (सांगीत)

पूर्व दिशा में एक भद्रावती नगरी जान
जोबनाश्व राजा जिसका जोधा बड़ा बलवान
दस खोहण दल और घोड़े जा कै बेपरमान
वहां यज्ञ का तुरंग
उसे लाओ जीत जंग
शूरवीर ले कै संग
जाओ रणधारी भूपाल 1॥

पवन भी परसती नहीं बंदोबस्त ऐसा किया
कृपण पुरुष नै जैसे गुप्त धन कर लिया
शस्त्रों बीच ऐसे जैसे पक्षी पिंजरे में दिया
जैसे गर्भ में शिशू
ऐसे रहता है पशू
खोहन दल वै दसूं
हरदम रहते रखवाल 2॥

गुरु के वचन सुन बुला लिया भीमसेन
पास बैठा कै राजा धर्मपुत्र बोल्या बैन
यज्ञ की कहैं हैं गुरु हम पै यज्ञ साधन हैन
बोल्या भीम बलदाई
सुनो धर्मपुत्र भाई
सारी बस्तु घर के माहीं
म्हारे यज्ञ साधन नंदलाल 3॥

वोही यज्ञ वोही कर्ता भोगता भुगाने वाला
उन ही की दया से जीते भारथ के भूपाला
उन ही को शर्म म्हारी वो ही करैं पृथपाला
भीम ऐसे बतलावै
धीर भाई की बंधावै
महोर सिंह पद गावै
बजैं तम्बूरा खड़ताल ॥4

दोहा –
भीम कहै सुन धर्मसुत, मैं भद्रावती जाय ।
ल्याऊं तुरंग को जीतकर, राजा से जंग मचाय ॥


टेक – 6 जो आऊं तुरंग छोड़ कै
लगो इतने दोछन मेरै ॥ टेक । (त्रिभंगी)

धर्मपुत्र जिस गाम, नहीं देवतों का धाम, एक कुवें पै तमाम, लोग भरैं पानी
जिस नगरी ना सरदार, पंडित गुनी साहूकार, जती सती ना दातार, ज्ञानी ध्यानी
उस नगरी में वास किये, पाप जो जो वर्ण दिये, जो आऊं बिना घोड़ा लिये, पड़ूं नरकखानी
देव द्रव्य को हरै, झूठी साख जो भरै, निंदा गुरु की करै, कूर कफगानी
चोर जार ठग ज्वारी, बेश्यां गामी मांसाहारी, ये जिन नरकों के अधिकारी
जो रण से चलूं मुख मोड़ कै
तो यम उस नरक में गेरै 1॥


करैं पाप की सला, चौकी मूठ दें घला, काटैं भाई का गला, पर हक़ खाते
करैं माता से विषाद, और पिता से विवाद, वेद शास्त्र की मर्याद, झूठ बतलाते
लेते धरोहर को मार, किये गुण दें बिसार, भोगैं गुरु की जो नार, नरकवास पाते
गंगाजलीं हाथ धर कै, साख सूरज की भर कै, गऊ ब्राह्मण बीच कर कै, फिर नट जाते
नित कर्म जिन भूले, धर्म किये ना कबूले, दूधे फले और फूले
जो काटैं वृक्ष जोहड़ के
कुकर्म करैं सुबह सवेरे 2॥


पापी लांवते जो आग, देते नारी को दुहाग, कुल रीत देते त्याग, जाति धर्म हारैं
लावैं कन्या कै जो दोष, परधन लेते खोस, भर कै गौओं पै जो रोष, लात की मारैं
नर जहर जो देते हैं, मोल कन्या का लेते हैं, आत्मघाती नर जेते हैं, जीव संघारैं
झूठ बोलैं दिन रात, करैं विप्र गऊ घात, बैठ धर्म की पंचात, भांजी मारैं
भीम घोड़े बिन आवै, इतने दोष अपनै लावै, उस नरक बीच जावै
जो खेती करैं बणी तोड़ कै
रस्ते की भूम को घेरैं 3॥


कथा भजन जज्ञ जाप, करणे दे ना करै आप, मेरै लगियो सारे पाप, जो ना घोड़ा ल्याऊं
डूबै भरा जो जहाज पाप लागो वह महाराज जो सारूं ना काज नरक वास पाऊं
जो ना आऊँ जीत जंग मेरा कुष्टि हो ज्या अंग जो ना यज्ञ का तुरंग लेकर आऊं
भाई बड़े और छोटे, मैंने सारे पाप ओटे, बज्र पाप के भरोटे, सिर पै ठाऊं
भीम ऐसे बतलावै, धीर बंधु की बधावै, महोर सिंह गुण गावै
ग्रंथों का रत्न निचोड़ कै
कथ भाषा के पद टेरै 4॥

दोहा –
इतनी सुन कहने लगे, धन्य धन्य वृषकेत ।
धन्य पिता और मात को, चढ्या भाव रण हेत ॥

वृषकेतु तेरे सामने
हमसे देख्या जाता ना ॥ टेक ।


हम हैं तेरे पिता के घाती
तूं लग्या हमरा चढ़न हिमाती
सन्मुख देख लाज मोहे आती
धन्य दानी के जाम नै
रविसुत सा और दाता ना 1॥

कहै वृषकेत पिता था अन्याई
सभा में द्रोपता मात सताई
मच्छ राजा की गऊ चुराई
धृक कुरु वंश तमाम नै
उनसे मेरा नाता ना 2॥

जहर दिया और अग्न जलाये
भाइयों का हक़ आप दबाये
करतब किया सोई आगै आये
धन्य भारथ संग्राम नै
कहां गये पता पाता ना 3॥

धर्म की रक्षा पाप का हरणा
छत्रीकुल का धर्म यही बरणा
महोर सिंह नै पकड़ा परणा
रटता नित हरि के नाम नै
गुनी और बात गाता ना 4॥

दोहा –
वृषकेतु के सुन वचन, हृदय लिया लगाय ।
इतने में हेडम्बसुत, पहुँच गये हैं आय ॥


मेरे पितामह महाराज आज तुम अर्ज सुनो मेरी ॥ टेक ।

पितृशोक तज भरा उमंग में
मुझे ले चलो अपने संग में
श्यामकरण घोड़े के जंग में
मैं सहाय करूंगा तेरी 1॥

रणभूमि में प्रथम मैं जाऊं
जाते ही निज माया दर्शाऊं
श्यामकरण को पकड़ उठाऊं
कर कै अंधेरी 2॥

ठाय तुरंग को चढूं गगन में
तुम निश्चंत हो लड़ियो रन में
अब भद्रावती पुरी चलन में
चाहिये ना देरी 3॥

धर्मधारी हैं धर्म भूपाला
इनके हरि आप रखवाला
महोर सिंह नै नाम की माला
अष्ट पहर फेरी 4॥

दोहा –
शिक्षा दे मुनि उठ गये, धर्मसुत हुये लाचार ।
कुल के धोरी खप गये, यज्ञ करावन हार ॥


धर्मसुत बोले यज्ञ में पड़ै ना पार ॥ टेक । (जंगम)

दूर देश श्रीकृष्ण गये और वृद्ध पुरुष कुल में नाहीं
हते गये भीष्म द्रोण कर्ण नृप डूबा शोक समंद माहीं
रण मंड्या उसीदिन विदुर भक्त चले गये वन की राहीं
सलाह किससे करैं और कैसे यज्ञ हो कहो बिन बतलाईं
कुल के धोरी खप गये जंग में यज्ञ करावन हार 1॥

कहाँ बंधु जरजोधन दुस्सासन और कहाँ है कर्णदानी
भुजा हीनों से दशों दिशां की कैसे जीती जां रजधानी
हमीं राजसुई जद यज्ञ करी भाइयों नै चढ़ा दी परवानी
वो भाई बंधु और मित्र सखा सब चढ़ गये रण की कुर्बानी
खिन्न मना हो धर्मपुत्र नै सुमरे सर्जनहार 2॥

अंतर्यामी श्रीकृष्ण जी घट घट की जानन हारे
इतने में ही आ पहुँच गये हथनापुर पंडवों के द्वारे
समय आधी रात की द्वारपालों से खड़े हो वचन उचारे
करो जल्दी खबर पंडवों से जाय खड़े द्वारे कृष्ण तुमरे प्यारे
द्वारपाल नै खबर दई है कृष्ण खड़े हैं द्वार 3॥

सुने वचन जब द्वारपाल के पांचों भाई हर्षाये
म्हारे शोक निवारण कारज सारण कारण कृष्ण चलकर आये
वो उमंग उमंग कर चाल पड़े कर दर्श पर्श आनंद छाये
नैनों के नीर से चरण पखाले महोर सिंह नै गुण गाये
पाँचों भाई मिले कृष्ण से भुजा पसार पसार 4॥

चौपाई
कुशल पूछ आसन बैठाये पूजा करी उपहार चढ़ाये । द्रुपद सुता नै शीश नवाये हाथ जोड़ हरि के गुण गाये ॥ दोहा –
व्यास आगमन भीम पर्ण, अश्वमेध का हाल ।
द्रुपदसुता से श्रवण कर, हंस बोले नंदलाल ॥

बस हो लई यज्ञ तुम्हारी
जो भीम नै सलाह दई है ॥ टेक ।

अश्वमेध का भीम सलाही
या तो यज्ञ होने की नाहीं
देखो इसके घर के माहीं
है राक्षसनी नारी
उससे कुछ सीख लई है ॥

घना खाय जो घनाए सोता
उससे काम सिद्ध नहीं होता
नाहक भ्रम क्यूं अपना खोता
यो है काम बड़ा भारी
या की अक्ल कहां गई है 2॥

त्रियाजित का क्या अनुमाना
वहां नहीं बक हेडम्ब दाना
पेट फुला हो रह्या मस्ताना
पैज तुरंग की धारी
उसकी मति मूढ़ भई है 3॥

बेईतबार ससुराल रहनिया
कुछ भी करै ना घनी कहनिया
महोरसिंह नित चरण गहनिया
करियो पार निवारी
सतगुरु ये कथा नई है 4॥

दोहा –
श्रीकृष्ण के सुन वचन, बोले पवन कुमार ।
हाथ जोड़ कहने लगे, धन्य श्रीकृष्ण मुरार ॥

अपने गुण आप बताते हो
धन्य धन्य श्री गिरधारी जी ॥ टेक ।

बड़ा पेट घना खाने वाला
थारै सिवाय कौन नंदलाला
प्रलय में बनकर महाकाला
सर्ब जग को भख जाते हो
जद भूख भगै थारी जी 1॥

क्षीर समुंद्र ससुर घर माहीं
तुम सा और सोवणिया नाहीं
मच्छ कच्छ सूकर तन पाई
जूनी अधम कहाते हो
घर रींछसुता नारी जी 2॥

पाड़ कल्पतरु स्वर्ग से ल्याये
सत्यभामा के महल लगाये
त्रियाजित भी तुम ही कहलाये
क्यों मेरै सिर दोष लगाते हो
बन रही तुम में सारी जी 3॥

जंग जीत घोड़े को ल्याऊं
तो मैं कुंती सुत कहलाऊं
महोर सिंह कह आज्ञा पाऊं
अब क्यों देरी लाते हो
करो कृपा करूं त्यारी जी 4॥

दोहा –
भीमसेन के सुन वचन, मग्न हुये भगवान ।
धन्यवाद देने लगे, मन की तजो गिलान ॥

मेरै अर्पण कर द्यो अपनी हत्या सारी जी ॥ टेक ।

गोती नाती कुटुंब परिवारा
हते जो दल खोहन अठारा
दे दो मांगै दोछन सारा
कृष्ण मुरारी जी 1॥

तुम पवित्र हो पांचों भाई
करो राज पाओ प्रभुताई
बोले वचन भीम बलदाई
अरज हमारी जी 2॥

जो कुछ अर्पण हो ज्या थारै
फल सहस्र गुण वेद उचारै
काज हमारे कौन संवारै
बिन गिरधारी जी 3॥

जैसे जिता दिया महाभारथ
ऐसे ही यज्ञ करो परमार्थ
महोर सिंह भज तजकर स्वार्थ
भजन की बारी जी 4॥

दोहा –
सलाह मसोरा करन में, बीत गई सब रात ।
यज्ञ ओट लई कृष्ण नै, होय गई प्रभात ॥

चलने को तीनों जोधा हुये हैं तैयार ॥ टेक ।

पुत्र गमन सुन कोंता माईं
भर कै थाल लड्डुओं का ल्याई
जिमा दिये तीनों बलदाई
शीश दिये पुचकार 1॥

निज जननी को शीश नवाकै
भाइयों सेती भुजा मिलाकै
श्रीकृष्ण से आज्ञा पाकै
चल दिये शगुन विचार 2॥

वायु वेग से तीनों ध्याये
मजल मजल पै डटते आये
मार्ग में कुछ श्रम ना पाये
वो तीनों बलकार 3॥

भद्रावती पुरी नीराई
दिवस तीसरे पहुंचे जाई
महोर सिंह नै लीला गाई
राम नाम आधार 4॥

दोहा –
गिरवर चढ़ देखन लगे, वो तीनों बलवान ।
पुरी विचित्र भद्रावती, अमरावती समान ॥


टेक – 14 जोबनाश्व की नगरी देखी अमरावती समान ॥ टेक ।

चौताल-
वन उपवन बगीचे बगिया बाग़ दर्शाये
उस नगरी कै चहूँ और जो लहराये
वृक्षों के शिखर कुसमित बेलों में छाये
परिपक्व फलों ने वृक्षों के स्कन्ध नवाये

चौपैया-
जल झरने झरते न्यारे
जहां तहां छुट रहे फव्वारे
पक्षियों नै शब्द उचारे
पुष्पों में भ्रमर गुंजारे

उठत -
बापी कूप तड़ाग
पंच अनुराग
निकट रहे लाग
जहां तहां छूटे रंग मैदान 1॥


चौताल–
बड़े ऊंचे ऊंचे दे रहे महल दिखाई
अड़ रहे कलश से कलश धजा फर्राई
हवनों के धूम से घटा सी नभ में छाई
उस धूम बीच ध्वज शिखर दामनी दर्शाई

चौपैया–
बाजों की धुन आती है
छवि बरनी नहीं जाती है
नारी मंगल गाती हैं
शुभ लक्षण दर्शाती हैं

उठत–
हो रही जय-जयकार
वेद उच्चार
शब्द गुम्बार
सुन सुन तृप्त होय गये कान 2॥


चौताल–
उन महलों के ऊपर सज रही हवा अटारी
हीरे पन्ने नगमणि जड़ाऊ सारी
उन अटारियों में सुख सज्जा बिछ रही न्यारी
पयफेन निभ्या शोभा है अधिक प्यारी

चौपैया–
जहाँ त्रिबिध हवा आ रही है
जल थल नभ में छा रही है
ऋतू बसंत दर्शा रही है
सुर नर मुनी मन भा रही है

उठत–
जहां रचना रची अनेक
पुरी दो एक
तीनूं रहे देख
देखते होय गये मध्यान 3॥


चौताल–
उस अश्व हेत बंदोबस्ती भी खूब कराई
नगरी के चारों तरफ फौज गिरवाई
जहां अगम अगाध अभेद कोट की लिखाई
बुर्जों पै शतगनी धरी मोर्चे लाई

चौपैया–
देखा ये अजब तमाशा
तीनों हो गये उदासा
दई छोड़ तुरंग की आशा
अब होगा नरक में वासा

उठत –
महोर सिंह कहै गाय
कथा समझाय
रहे हैं सुनाय
जैमिनी जन्मेजय को ज्ञान 4॥

दोहा –
इतने में बाजे बजे, हो रही जय जयकार ।
लता वृक्ष की ओट ले, देखत पवन कुमार ॥


टेक कहै भीमबली वृषकेत से
अब सावधान हो भाई ॥ टेक ।

हाथी बहोत घने आते हैं
देखो सारे मदमाते हैं
ताल में बड़ बड़ कै नहाते हैं
तुम भी रहियो सुचेत से
अब मेघावर्ण बलदाई 1॥

घोड़े बहोत घने हिंकारे
जल पीवन आवैंगे सारे
अब यहां जंग मचैंगे भारे
जो हट गये रण खेत से
तो होगी लोग हंसाई 2॥

अब आवैगा यज्ञ तुरंग जी
शूरवीर आवैंगे संग जी
मैं उनसे मांडूंगा जंग जी
जोबनाश्व बानेत से
करियो वृषकेत लड़ाई 3॥

मेघवर्ण घोड़े को पकड़ना
आवै छुड़ावन उससे लड़ना
रणभूमि से बाहर निकलना
गुरु चरणों के हेत से
छवि महोर सिंह नै गाई 4॥

दोहा –
गज गजनी उस ताल में, करैं यथेच्छ अस्नान ।
उसी ताल को चल पड़े, करन अश्व जलपान ॥


टेक जलपान करन उस ताल में
इतने में तुरंग आये ॥ टेक । (सांगीत)

जय जय जय जय होती आवै बाजे बजे बेसुम्मार
धनुषों की टंकोर घोर रथों की उठै झंकार
भरकै जोर घोड़े भी हिंकारे सारे एक बार
रतन जड़ित साज घोड़ों पै पड़े हैं पाल
तीतर हंस मोर मुरगाई भी चलैं हैं चाल
धनुषधारी पीछै पीछै आंवते हैं रखवाल
आकै मध्यान्ह काल में
अश्व नै जलपान कराये 1॥

भीमसेन बोल्या पुत्र यज्ञ बाजी दीखै नांय
खबर नहीं है कि नहीं राजा के भवन मांय
आना म्हारा वृथा हुया उलटे कैसे घर जांय
जग निंदा होय और मिलै हमको नरकवास
कृष्णजी हसैंगे क्या कहैंगे मुनि वेदव्यास
दीखै ना ठिकाना आज बीच धरती अक्काश
धर्मपुत्र भूपाल में
क्या बनी तीनों पछताये 2॥

इतने में नगरी सेती निकसा यज्ञका तुरंग
हीरे पन्ने मोती मणि लालों से शोभित अंग
छत्र तने चंवर ढलैं शूरवीर आवैं संग
धूप दीप नैवैद्य आरती उतरती आवै
शंख झालर दुंदभी बजैं हैं पुष्प बरसावैं
पैंड पैंड ऊपर हवन दान पुण्य करवावैं
देख अश्व इस हाल में
तीनों योधा हर्षाये 3॥

मेघवर्ण बोल्या जद आज्ञा मोहे दीजै तात
निकट अश्व आय गया अब समय बीता जात
अश्व को ल्याऊं पकड़ मैं दिन सेती करूं रात
वृषकेतु बोल्या पिता धर्म की है रीत यही
मेघवर्ण जाओ प्रथम पीठ या की मैंने गही
मेरै पीछै आप आईयो अश्व को छोडेंगे नहीं
कथा भरकै दुटेकी हरी चाल में
पद महोरसिंह नै गाये 4॥

दोहा –
आज्ञा पा कै भीम, की सुमरे सर्जनहार ।
वृषकेतु को टेर कै, उठे जो मेघाकार ॥


टेक अबसो सबसे पहले चल्या है रण को मेघबली ॥ टेक ।

भुजा उरू जंघा ताड़, चल्या मार कै चिंघाड़, गूंज उठे हैं पहाड़, सारी धरा हली
चढ्या गगन हू में जाई, निज माया दर्शाई, घटा घूम चढ़ आई, चिमकैं बिजली 1॥


इतने में अन्धकार, छाय गया बेसुम्मार, बालू कंकरी उडार, जब हवा चली
अंग अंग अर्श पर्श, नहीं होते हैं दर्श, रही नभ से बरस, जल की कतली 2॥


सबके मिच गये नैन, नहीं सुनते हैं बैन, झुकी दिन सेती रैन, नहीं भासैं गली
सुध बुध रही नांह, विपरीत भागे जांह, शोभा एक छन मांह, सारी रेत में रली 3॥


बड़े बड़े बलकार, खड़े शीश रहे मार, मन में कर रहे विचार, आज है ना भली
कहै महोर सिंह गुनी, दल की हो गई बिरूनी, होती नहीं अनहूनी, हूणी नांह टली 4॥

दोहा –
माया मेघावर्ण की, देखत देव अक्काश ।
भाग चल्या भयभीत हो, गया इन्द्र के पास ॥

अर्ज एक मेरी सुन सुरपति महाराज ॥ टेक । (जंगम)`

मृत्युलोक में एक अचम्भा देख्या आज बड़ा भारी
भद्रा नगरी निकट असुर एक खड़ा गरज रह्या बलकारी
घन घटा घूम दामनी दमकैं दिन सेती छा रही अंधियारी
गज बाजी व्यथित सब होय गये लाचार हुये नेजाधारी
सुर राज आज कहीं काज खबर ना माया आसूरी बिस्तारी
जो कुछ देर रह गई माया खैर नहीं है आज 1॥

देव वचन सुरपति श्रवण कर भरकै रोष जद बतलाया
भद्रावती नगरी जाओ देव कोई कौन असुर रच रह्या माया
देवों को संग ले हाथी चढ़ पीछै पीछै मैं भी आया
सुन वचन देव कोई चाल पड्या भद्रावती नगरी को ध्याया
उस अन्धकार में धंसा आय कै मेघवर्ण जब दर्शाया
देव कहैं तूं कौन पुरुष है माया रची किस काज 2॥

देवत की सुनकर वाणी कर जोड़ कै मेघवर्ण टेरा
सुन भीमसेन का पोता हूँ हेडम्ब पिता कहैं मेरा
और मेघवर्ण मेरा नाम कहाता हथनापुर का बासेरा
धर्मराज यज्ञ अश्वमेध करैंगे व्यास मुनी नै हम प्रेरा
यज्ञ बाजी हरण कै काज आज मैं किया आसूरी अंधेरा
मेघवर्ण की सुनकर वाणी देव चल्या है भाज 3॥

देवदूत नै जाय इन्द्र से हाल सुना दीन्हा सारा
तैंतीस कोट सुन मग्न हुये सब करन लगे जय जयकारा
सब रोष इन्द्र का दूर हुया एरावत से पाषर तारा
जद देव दुंदभी बजन लगे रहे पुष्प बरस बेसुम्मारा
संवाद जैमिनी जन्मेजय को सुना रहे न्यारा न्यारा
महोर सिंह नित उठ गुण गावै बजैं आनंदी साज 4॥

दोहा –
मेघवर्ण ठा तुरंग को, चढ्या गगन में जाय ।
जोबनाश्व के दलों की, कुछ ना पार बसाय ॥

टेक आपस में कट कट मरण लगे
रण खेत बीच रणधारी ॥ टेक ।

मेघवर्ण घोड़े को ठा कै
पहुंचा बीर गगन में जा कै
शूरवीर सब धोखा खा कै
परस्पर प्राण हरण लगे
मच गया जंग बड़ा भारी 1॥

शूरवीर लडैं रण में झूझैं
अपनी कहैं ना और की बूझैं
अंधकार में कुछ नहीं सूझै
रुधिर तनों से झरन लगे
जैसे पड़ै नीर फुहारी 2॥

रुंड मूंड कई जख्मी हो गये
कई बीर मूर्छित हो सो गये
रणधारी प्राणों को खो गये
कायर थे डरन लगे
भागन की करी तैयारी 3॥

कोई भाग नगरी को आया
राजा को अब हाल सुनाया
राजा नै सुन धोखा खाया
महोर सिंह हरि चरण लगे
चरणों में ही गुजर हमारी 4॥

ख्याल –
अश्व हरण सुन जोबनाश्व नै चतुरंगी दल सजवाया
सज सज सुभट रथों में बैठे धनुष बाण करों में ठाया

मारो मार ध्वनि करत करत रणभूमि में चलकर आया
देख आसूरी माया जोधा कर कै क्रोध जब बतलाया

कित गया अश्व कहो कन लीन्हा भेदभाव कुछ ना पाया
अग्निबाण दिया छोड़ गगन में मेघवर्ण जब दर्शाया

दोहा –
मेघवर्ण को देखकर, जोध्या चार हजार ।
कूद कूद चढ़े गगन में, ले लेकै हथियार ॥

अजी एजी जोध्या मेघवर्ण से टेरा
अरे चोर क्यों भगा जात अब काल आ गया तेरा ॥ टेक । (सांगीत)

मारो मार करते शूरवीर भागे सहस्र चार
जा कै रस्ता घेर लिया ठाय लिये हथियार
दुर्वचन बोल बोल करने लगे हैं प्रहार
जब गरजा मेघवर्ण
कम्प उठी है धरण
भग्या बांध कै पर्ण
दे लिया है सबकै घेरा 1॥

माया के प्रपंच सेती महाघोर करी रैन
छुटी है प्रचंड वायु सुभटों के मिंचे नैन
छूट गये हथियार जिनके मुख नहीं आवै बैन
देख आसूरी सी माया
शूरवीर घबराया
कौन अपना कौन पराया
कुछ रह्या ना उस घड़ी बेरा 2॥

कूद कूद पड़ै है जोधा लातों सेती मारण लग्या
घुटनों की मार करै मुष्टिका प्रहारण लग्या
शिला बरसाय बलीयों को संघारण लग्या
मेघवर्ण बल भरा
महाघोर जंग करा
कोई मरा अधमरा
कर ठाय धरण में गेरा 3॥

मेघवर्ण जीत रणसेती मुख फेर लिया
घोड़ा लेकर चल्या शूरवीरों ने घेर लिया
मार मार बाण जोधा धरणी ऊपर गेर लिया
जोधा अश्व को छुड़ावैं
झड़ी बाणों की लगावैं
महोर सिंह गुण गावै
सतगुरु चरणों का चेरा 4॥

दोहा –
वृषकेतु कहने लगा, सुनो भीम महाराज ।
देखा पुरषार्थ रण जंग में, किया मेघवर्ण आज ॥

वृषकेत कह रण जंग में
अब तो मैं भी जाता हूं ॥ टेक ।

धन्य धन्य मेघवर्ण पणधारी
निर्भय झूझ रहा धनुधारी
जो अब आज्ञा होय तुम्हारी
मैं भी जा रण दंग में
बल पौरुष दिखलाता हूँ 1॥

अश्व पकड़ रह्या जंग मचा रह्या
अपनी आप ही पीठ दबा रह्या
मेघवर्ण घेरी में आ रह्या
और ना दूजा संग में
इस बात से भय खाता हूँ 2॥

कुंतीसुत तुम मत नहीं आईयो
बाल समझ मतना घबराइयो
पुत्र पौत्र की खैर मनाइयो
जीत कै यज्ञ तुरंग मैं
देखो अब ही आता हूँ 3॥

जब तक अस्त होय नहीं भानू
तब तक जीत तुरंग को आनू
महोर सिंह मैं कुछ नहीं जानूं
भक्ति प्रेम उमंग में
नित हरि के गुण गाता हूँ 4॥

दोहा –
वचन श्रवणकर भीम कहै, धन्य धन्य वृषकेत ।
धन्य पिता धन्य मात को, चढ्या चाव रण हेत ॥

बेटा कैसे भेजूं जंग में
नादान उमर है तेरी ॥ टेक ।

जोबनाश्व राजा रणजंगी
आवै फौज सजा चतुरंगी
आज लड़ाई है बेढंगी
ऐकले को रण दंग में
भेजन की सलाह ना मेरी 1॥

भली बुरी जो रण में हो ज्या
दानी का नाम जगत से खो ज्या
एकलाए बेटा रण में वो जा
दूजा नहीं हो संग में
तेरै बल बाहू घनेरी 2॥

जो रण में जा पीठ दिखाई
कुल म्हारे की हो हल्काई
आज मचैगी घोर लड़ाई
भाल बहैंगी अंग में
झूझैंगे मर्द सुमेरी 3॥

मैं आया संग रक्षा हेतू
बेशक पुत्र आज जस ले तू
महोर सिंह कहता वृषकेतू
भर कै बीर उमंग में
कर जोड़ कै बाणी टेरी 4॥

दोहा –
आज्ञा पाकै भीम की, वृषकेतु बलवान ।
रणभूमि को चल पड्या, ले कर में धनुबान ॥

धनुष को ठा कै चल्या वृषकेत बली ॥ टेक । (जंगम)

कालरूप हो चाल पड्या है धनुषबाण कर में ठाया
बाणों की वर्षा करता हुया रणभूमि में चलकर आया
गज बाजी पदाती कटन मरण लगे देख देख सब घबराया
कोई आगै होकर भाग चल्या भद्रावती नगरी को ध्याया
कोई चढ़कै मोर्चे लगा रोकने वृषकेतु नै मार हटाया
बिना छुटाये आगै आगै
छुट गई आप गली 1॥


मेघवर्ण कै निकट बली काटत काटत पहुँचा जाकै
छुटवाय दिया मैदान मार घमस्यान बना दीन्हा आकै
गज बाजी पदाती बिछा दिये वृषकेतु नै बाण झड़ी लाकै
कोई मार दिया अधमरा कोई कोई आप मरा दहका खाकै
कन्ही खबर दई है जोबनाश्व को पिछला सारा हाल सुनाकै
क्या तूं भूप नचीता बैठा है नहीं आज भली 2॥


सुनकै दूत के वचन कहन लगे जोबनाश्व कर कै क्रोधा
बतलाओ बेग मेरा अश्व हरनिये कितनेक आय रहे जोधा
जिन्ही अश्व लिया नहीं भय किया दल मार मार कर दिया मोधा
बड़ी अचरज कैसी बात हुई अपना आपा तो नहीं सोधा
जन्ही जोबनाश्व राजा से आन कै बिना बिचारे किया बिरोधा
अनहूणी होने की नाहीं हूणी तो नांह टली 3॥


दूत कहै सुन जोधा तीन आ रहे हैं तेरे अश्वहारी
एक तो अश्व को ले चढ़ा गगन में दूजे नै फौज हती सारी
तीजा बैठा पर्वत के ऊपर पर्वत ही के आकारी
सुन राजा कहै वो तो तीनों देव हैं बिरंची विष्णु त्रिपुरारी
तीनों को जीत ल्याऊँ तुरंग कहै महोर सिंह हुई तैयारी
अरथ सजे गज बाजी सजन लगे घुडलों पै जीन घली 4॥

दोहा –
चतुरंगी सेना सजी, बाजे बजे अपार ।
जोबनाश्व नृप जंग को, होय लिया तैयार ॥

अबसो जोबनाश्व राजा चढ़ा सेना को सजा ॥ टेक ।

बाजे बजैं धररर, धरा करै थररर, नभ बीच फररर, रही फरक धजा
शस्त्र करैं झिमझिम, रही दामिनी सी रही खिम, धिम धिम धिमाधिम, अश्व साज बजा 1॥


घोड़े करैं हिनहिनाट, भागतों की पड़गड़ाट, उठै रथों की झरनाट, सब दिये भजा
मार मार कै चिंघाड़, चली हाथियों की धाड़, गूँज उठे हैं पहाड़, दृगपाल लजा 2॥


निज वाहनों को साज, शूरवीर चले गाज, कहै वीरों की आज, आ गई क़ज़ा
उठै सुभटों कै लहर, कायरों कै कहर, रण हेत राजा शहर, इस कदर तजा 3॥


जहां हो रहा संग्राम, झूझैं छत्रियों के जाम, होती आई घूमघाम, रथ बाजी गजा
महोर सिंह तेरी शरण, प्रभु पा लिया है पर्ण, वृषकेतु मेघावर्ण, दल देख गरजा 4॥

दोहा –
आती सेना देखकर, भीम तजे पाषाण ।
वृषकेतु के पास आ, खड़े हुये बलवान ॥

वृषकेत कहन लग्या भीम से तुम भी क्यों आये रण में ॥ टेक ।

अरिकुल का मदमान हड़निया
समरथ हो रह्या पुत्र लड़निया
पिताजी थारै आगै अड़निया
दीखै ना इनमें 1॥

वृद्ध भूप सूक्ष्म है सेना
इससे लड़ अपयश है लेना
मोहे हुक्म जल्दी से देना
जीतूं एक छन में 2॥

तुम्हे देख ये सेना सारी
भाग जायेगी डर की मारी
जस लेने दो शरण तुम्हारी
गिर गया चरणन में 3॥

स्थिर ना जवानी काया माया
ढलती फिरती समझो छाया
महोर सिंह कहै अवसर पाया
रह ज्यागी मन में 4॥

दोहा –
आज्ञा पाकर भीम की, ले कर में धनु बाण ।
हुया फौज के सामने, वृषकेतु बलवान ॥

ले धनुबाण वृषकेत बीर
पड़ा सेना कै अगवानी ॥ टेक ।

वृषकेतु नै सेना घेरी
जिमी स्यालों को घेरै केहरी
तिष्ट तिष्ट मुख बाणी टेरी
खैंच सरासन छोड़े तीर
कर्णसुत नै बेपरमानी 1॥

खैंचा धनुष प्रत्यंचा भड़की
छुटे बाण बिजली सी कड़की
कायरों की सुन छाती धड़की
थररर थररर कम्पे शरीर
सुभटों कै भी छई गिलानी 2॥

जोबनाश्व नृप चलकर आया
वृषकेतु को वचन सुनाया
बता क्या तेरा नाम कहाया
कौन वंश में मिल्या सीर
और कौन तेरी रजधानी 3॥

पिता कौन तेरा बलकारी
कौन मात है जनने हारी
महोर सिंह कहै बता दे सारी
पैदल किस कारण तूं रणधीर
क्या बात तैं मन में ठानी 4॥

वृषकेतु कहने लगा, सुनो वचन भूपाल ।
मैं अपने आगमन का, सुनाऊं सारा हाल ॥

हम कुरुवंशी नृप बालक हैं
राजन सुन साख्य हमारी ॥ टेक ।

नित सवा मण सौरण का दाता
रविसुत मेरा तात कहाता
सुरपति सुत किया रण में घाता
अब धर्मसुत म्हारे पालक हैं
वही तात वही महतारी 1॥

भानुसुता भ्राता सुत हेतू
आये लेन यज्ञ बाजी दे तू
मेरा नाम कहिये वृषकेतू
संग पवनसुत रखवालक हैं
खगसुता सुत सुत सहचारी 2॥

उदधिसुता पति यज्ञ सहाई
भूपति सुत जिनके अनुयाई
दयाभ्रात सुत यज्ञ रचाई
मीनसुता सुत मालिक हैं
गजपुर में हुई तैयारी 3॥

पूछी थी सो बात बता दई
कुल अपने की साख सुना दई
महोर सिंह नै कथ कै गा दई
ये बाण म्हारे घर घालक हैं
कुल पंडवों का पणधारी 4॥

दोहा –
जोबनाश्व कहने लगा, धन्य दानी के जाम ।
पैदल किस विध करैगा, तूं हमसे संग्राम ॥

जो है लड़न की मन में
आ जा हो रथ पै असवार ॥ टेक ।

मैं संग फौज बहोत सी ल्याया
तू आगै पैदल खड़ा पाया
बड़ी दूर से चलकर आया
चढ़ रही होगी हार 1॥

देख देख बालक मुख तेरा
मेरै छा गया मोह घनेरा
छत्रापन बिगड़ै है मेरा
जो ठा ल्यूं हथियार 2॥

ऐसा क्या बल है तेरे पै
जरा नहीं गलानी चेहरे पै
रे बालक जल्दी मेरे पै कर ले पहला वार 3॥

जो प्रथम वार मेरा हो जावै
फिर तेरा नहीं होने पावै
महोर सिंह नित उठ गुण गावै
राम नाम आधार 4॥

दोहा –
जोबनाश्व के सुन वचन, कहन लगा वृषकेत ।

दान लेन आये नहीं, आये हैं रण हेत ॥

हम दान लेन नहीं आये राजन आये हैं रण हेत ॥ टेक ।

दानी दान याचक को देगा
जाचक हो सो मांग कै लेगा
हम छत्री म्हारे कर में तेगा
झूझनिये रणखेत 1॥

सर्व बलों का बल है मेरे पै
फिर क्यों उदासी हो चेहरे पै
प्रथम वार राजन तेरे पै
करैगा नहीं वृषकेत 2॥

अब नृप धनुष बाण को धर तू
वृद्ध भया हरि नाम सुमर तू
उसको मेरै आगै कर तू
जो तेरै बानेत 3॥

वृद्ध अवस्था हुई बेसानी
तेरे संग लड़ने से हानि
महोर सिंह वृषकेत की बाणी
सुनकर हुया सुचेत 4॥

दोहा –
वृषकेतु के सुन वचन, करी धनुष टंकार ।
जोबनाश्व भूपाल नै, प्रथम किया है वार ॥

जब छुटे बाण सर र र र र र र
कड़ ड़ ड़ ड़ ड़ ड़ धनुष कड़कन लगे ॥ टेक ।

शूरवीर दिखलाते जोर को
धनुष टंकोरैं खैंचैं डोर को
सुन सुनकर धनुषों की घोर को
कायर कर रहे अर र र र र र र
हिये धड़क धड़क धड़कन लगे 1॥

गोले चलैं भरे और रीते
सुन सुन शब्द सुभट भय भीते
तोपों पर जद पड़े पलीते
होन लगी धर र र र र र र
संग भिन्दिपाल भड़कन लगे 2॥

भड़ ड़ ड़ भड़कन लगी भुसंडी
वाली रंगैं चेत गई चंडी
चढ़े मोर्चै मर्द घमंडी
धूज रहे थर र र र र र र
सुभटों को सुभट झिड़कन लगे 3॥

एक तरफ को है वृषकेतू
एक तरफ नृप सेन समेतू
महोर सिंह कहते रण हेतू धजा फरक रही फर र र र र र र
बजे बाजे खड़ग खुड़कन लगे 4॥

दोहा –
अश्व हेत संग्राम मंड्या, उठे जो गर्द गुब्बार ।
दिन से अंधेरी भई, हो रही मारो मार ॥

टेक वृषकेत बीर रण जंग में
खड़ा निर्भय झूझ रहा है ॥ टेक । (सांगीत)

कहीं भाल भल्कैं कहीं सांघ करैं झिमाझिम
चक्करों के पलके पड़ैं हैं दामिनी सी रही खिम
खड़गों की धार चिमकैं होय रही चिमाचिम
तोपखाने दगैं कहीं गोले चलैं धड़ाधड़
भड़कैं हैं भुसंडी वाली दाग रही भड़ाभड़
बाणों का सुम्मार नहीं खांडा बाजैं कड़ाकड़
सुन सुन शब्द उमंग में
वृषकेतू धूज रहा है 1॥

दस बाण नृप नै छोड़े वृषकेतू नै दिये काट
तीन छोड़े वृषकेतु नै राजा के छुटे हैं साठ
अर्धचन्द्र शस्त्र छोड़ा माच गया धर्राट
घोड़े मारे रथ तोड़ा सारथी भी दिया मार
राजा का धनुष कटा मच गई हाहाकार
हो गया अदृष्ट राजा बरस रही बाण धार
तिमर छाया रण दंग में
जहां कुछ नहीं सूझ रहा है 2॥

तिमर नाशन पावक अस्त्र वृषकेतु नै दिया छोड़
राजा के दलों में ज्वाला जग उठी ठोड़ ठोड़
वरुण अस्त्र नृप नै छोड़ा पावक अस्त्र दिया मोड़
अस्त्र के प्रभाव सेती होन लगी बरसात
वृषकेतु विफल हुया वायु अस्त्र लिया हाथ
मन्त्र पढ़ छोड़ दिया अस्त्र का किया है घात
राजा खड़ा इकंग में
गिरी अस्त्र को पूज रहा है 3॥

पर्वतास्त्र नृप नै छोड़ा बरसन लगे पाषाण
वृषकेतु अदृष्ट हुया बाण छुटे बेपरमान
हो गया विकल बीर भूल गया औसान
वृषकेतु को दबा देख भीमसेन आया भाज
गदा घुमाता हुया रण में बड़ा है गाज
महोर सिंह कथ रहे भाषा यज्ञ का समाज
जैमिनी के सत्संग में
जन्मेजय बूझ रहा है 4॥

ख्याल –
भीमसेन को आता देख वृषकेतु नै काट दिया सरजाल
हाथ जोड़ कै कहै भीम से तुम भी तात क्यों आये चाल

इतने में जोबनाश्व राजा नै तीक्ष्णधार उठाई भाल
वृषकेतु कै मारी तान कै जिगर में बह गई तत्काल

मूर्छा खा कै पड़ा बीर वृषकेतु का हुया हाल बेहाल
धनुष छुटा बेचेत हो गया देख कै ख़ुशी हुया भूपाल

दोहा –
वृषकेतू को देखकर, कोपे पवन कुमार ।
श्रीकृष्ण का ध्यान धर, गदा लई चुचकार ॥

टेक अजी एजी कोप कर भागे भीम बली
वृषकेतु को पड़ा देखकर मच गई तलामली ॥ टेक । (सांगीत)

दुश्मनों को काल विकराल रूप आता दीख्या
घमस्यान करता आवै गदा को घुमाता दीख्या
घोड़ों को दलै मलै है रथों को बगाता दीख्या
कूद कूद पड़ै है जोधा रथों हू को तोड़ रहा
हाथियों के तुंड पाड़ै सुंड को मरोड़ रहा
चिंथ चिंथ मरैं हैं जोधा मोर्चों को छोड़ रहा
सेना भाग चली 1॥

मोरचै चढ़े जो भट गदा से संघार दिये
पदाती पैरों से मार मार कै पसार दिये
आगै जो आये सो घात मौत कै उतार दिये
नाम है सुबेगराज पुत्र गदा लेकै ध्याया
भीम सम तुल्य बली आकै मोर्चा लगाया
जुट गये मर्द गर्द उठी जाय नभ छाया
रण मंडा धरा हली 2॥

वो उसपै वो उसपै हाथी ठाय ठाय बगेल रहा
गदा रही बाज वार प्रहारों को झेल रहा
कभी आगै बढैं कभी पीछे को धकेल रहा
इतने में आय कर्णपुत्र भी सुचेत हुया
धनुष बाण ठाया सावधान वृषकेत हुया
भूप से कहन लगा भला रणखेत हुया
इब मत समझ भली 3॥

वृषकेतु नै शस्त्र छोड़े धनुष की टंकार करी
अंधकार छाया सेना भूप की लाचार करी
जोबनाश्व राजा कै बली नै जिगरी मार करी
मूर्छित होकै भूप धरण में पड़ा है आय
छूट गया धनुष बाण सुध बुध रही नांय
महोर सिंह चाहे कोटि कोटि कर लो उपाय
भावी नांह टली 4॥

ख्याल –
मूर्छित देख्या जोबनाश्व को वृषकेतु हो गया उदास
जंग मोर्चा त्याग भागकर आया वृद्ध भूप के पास

इंद्री विकल शिथिल दसों दर हुये काया हो रही निश्वास
मर चुका राजा मेरे जंग का कौन सुनावैगा इतिहास

निरख निरख राजा को वृषकेतु कै हुई महात्रास
अपने वस्त्र से हवा करन लग्या नृप सजीव होने की आश

दोहा –
नब्ज टिटोलै भूप की वृषकेतु रणधीर । मुख मुरदाई छई शीतल हुया शरीर ॥   बचैं प्राण भूप के अब क्या जतन बनाऊं ॥ टेक ।

स्थान भ्रष्ट हुये नाड़ी छूटी
इंद्री सकल हो गई झूठी
दूर द्रोण संजीवनी बूटी
इब मैं किस बिध ल्याऊं 1॥

जीत पताल स्वर्ग में जा कै
देवों सेती जंग मचा कै
मुख में गेरूं अमृत ल्या कै
इस बिध नृप को बचाऊं 2॥

भरोसै किसके नृप को छोडूं
किस बिध उल्टे प्राण बहोडूं
दृष्टि पड़ै तो काल को मोडूं
बाणों से मार हटाऊं 3॥

हे दयाल प्रभु अंतर्यामी
बंधी मेरै पल्लै बदनामी
वृद्ध भूप हत्या रण संग्रामी
इब तो मैं पछताऊं 4॥

सुकर्म आड़ी आकर मेरा
भूपति का हो दूर अँधेरा
महोर सिंह चरणों का चेरा नित हरि के गुण गाऊं 5॥

ख्याल –
श्रीकृष्ण की सेवा और पूर्व जन्म का पुण्य प्रताप
वक्त पड़ा शुभ कर्मों का फल उदय हो गया आप ही आप

दयावंत वृषकेत बली है दयावंत राजा निष्पाप
दयावंतों पै कृष्ण दया करी जाग्या भूप उठा लिया चाप

वृषकेतु बैठा है पास में कृष्ण कृष्ण जपै मुख से जाप
हाथों से सेवा कर रहा जिमी शिशु की सेवा करैं माँ बाप

जोबनाश्व राजा बैठा हुया दिल प्रेम सिन्धु में हुया गरगाप
वृषकेतु छाती से लगाया महोर सिंह मिट गये सब ताप

दोहा –
जीवदान सम दान ना, ए दानी के जाम ।
आज उजागर कर दिया, तैं दानी का नाम ॥

टेक दानी का उजागर नाम किया
दानी के सुत महादानी ॥ टेक । बली नै दान वसुधा का कीन्हा
हरिश्चंद्र नै सर्बस दीन्हा
शिवि नै देह धड़ै धर लीन्हा
छ्योवन अंग तमाम किया
लिये रख कपोत के प्राणी 1॥

खोज खोज द्विज निर्धन कृपण
नृग करी सहस्रों गऊ समर्पण
दधिची नै इन्द्र के अर्पण
हाड़ मांस और चाम किया
रह गई अब शेष कहानी 2॥

इनसे कम नहीं तूं वृषकेतू
दयावंत दानी धर्मसेतू
जीव दान दिया तेरै हेतू
राजपाट धन धाम किया
दे चुक्या तोहे रजधानी 3॥

प्राण बचाय लिया तैं मेरा
यो गुण नहीं भूलूंगा तेरा
महोर सिंह नृप ऐसे टेरा
मैं विरथा संग्राम किया
तुम माननीय हो मानी 4॥

दोहा –
कृष्ण दर्श की लालसा, अश्वमेध उत्साह ।
वृषकेतू को संग ले, चले ऊठ नरनाह ॥

आल्हा

(कृपया इसे अलग डालना जी) भीम सुबेग का मंडा अखाड़ा उसी जगह पै पहुंचे आय
टक्कर बाज रही दोनों की पड़ैं धरण में चक्कर खाय

दलैं मलैं ऊपर तलै हो हो पकड़ वीर कभी दे हैं बगाय
कभी दोनों की गंफी पड़ ज्या आगै पीछै रहे धिकाय

उल्टे हट हट कूद कूदकर रहे सूरमा गदा बजाय
चढ़े सांस बाजैं हैं नास जिनको आपे की सुध बुध नाय

सिंहनाद ज्यों करैं गर्जना चेहरों पै रही सुरखी छाय
बलैं आँख आपस में जिनकी तिरछी भ्रकुटी रहे चढ़ाय

झरैं पसीने छाती धड़कैं तनों पै धुल रहे लिपटाय
विकट भयंकर हो रहे दोनों काल कराल रूप दर्शाय

जंग खिलारी भट बलकारी छवि जिनकी नहीं बरनी जाय
महोर सिंह कहै जितनी उपजी उतनी दई आल्हा में गाय

भूप नै वचन सुनाये जी
तजो समर भीम बलवान ॥ टेक । (चित्रमुकुट)

घोड़े का बहाना किया दर्शन दीन्हे आय
इस अपवित्र देश को पवित्र दिया बनाय

कर्म से दर्शन पाये जी 1॥

इस वृषकेतु वीर नै किया उग्र संग्राम
इसकै अर्पण कर दिये राजपाट धनधाम
मेरे इन प्राण बचाए जी 2॥

दस खोहन दल है मेरै दस सहस्र गज श्वेत
श्रीकृष्ण अर्पण किये मैं अश्वमेध कै हेत
यज्ञपति कृष्ण कहाये जी 3॥

बदले मैं धर्मपुत्र कै दे दूं अपना शीश
भीमसेन वृषकेत कै जच गई बिश्वाबीस
मिले धर्म बंधु बनाये जी 4॥

मेघवर्ण कहने लगा हूणी हो सो होय
हूणहार भावी प्रबल मेट सकै ना कोय
कर्म नै मेल मिलाये जी 5॥

हंस हंस बोलैं प्रेम से करैं मर्म की बात
महोर सिंह रण खेत में जुड़ बैठी पंचात
सबके मन आनंद छाये जी 6॥

दोहा –
अगुवाई भूपाल नै, भेज दिये प्रतिहार ।
जल्दी पुरी सजाय कर, सज धज लें नरनार ॥

सज धज गज तुरंग पलान कै
पंडवों की चली सवारी ॥ टेक । (सांगीत)

जोबनाश्व भीम एक हाथी पै हुये सवार
दूजे पै सवार हुये वृषकेत मेघाकार
तीजे पै सुबेग बली बैठ गया आसन मार
सिरों पै तने हैं छत्र चंवरों के फटकारे
बना कै जलूस जय बोल पुरी को पधारे
बोलैं हैं नक बाजैं ढोल और धोंसे न्यारे
दरवाजों पै आन कै
पहोंचे हैं छत्रधारी 1॥

दरवाजै सुहागन सजी धजी मंगल गाय रही
आरता उतारैं लाजा पुष्प बरसाय रही
अप्सरा करैं हैं नृत्य ख़ुशी जो मनाय रही
पुरी है सचित्र चित्र साज सजे अनमोल
गायन बजायन की मांच रही रमझोल
होते सन्मान चलैं जाय पहोंचे राजपोल
कुन्तीसुत बलवान कै
करैं दर्शन दें बलिहारी 2॥

स्वर्ण के थाल में कपूर केसर कस्तूरी
पंचमुख देव धर ल्याई रानी भाग पूरी
आरता करूंगी मैं बधाई गावो कुलबधूरी
आरता करन लगी होय रही बाग़ बाग़
वीर वृषकेत मेरै तेराए दिया सुहाग
वार वार पानी पीऊँ चरणों में लाग लाग
कुलगुण कर्म बखान कै
दें धन्यवाद नरनारी 3॥

रत्न जड़ित सहस्र खम्भ भवन में किया निवास
खान और पान का प्रबंध किया जोबनाश
भवन है अनूप भूप ने भी लिया संग वास
लग्या है दरबार जुड़ बैठ गई पंचात
सलाह मशवरा में बीत गई सारी रात
महोर सिंह छवि गावै होय गया परभात
हुक्म भूप का मान कै
उठ चले सकल दरबारी 4॥

दोहा –
पांच दिवस रहे पुरी में, हुये नित नये रंगचार ।
छठे दिवस हथनापुरी, चलने को हुये त्यार ॥

दोहा –
टामक धर गज पीठ पर, पड़ी चोब उठी घोर ।
पिटैं मनादी पुरी में घर, घर मच रह्या शोर ॥

टेक चलो हथनापुर को पंडू जज्ञ करैंगे ॥ टेक ।

छप्पन कोटि जादू ब्रजवासी
आवैंगे ऋषि सहस्र अट्ठासी
पारथ धर्मपुत्र सुखरासी
मिलैंगे चाव भरैंगे 1॥

रुक्मण आदि कृष्ण की प्यारी
सोला सहस्र आवैंगी नारी
कुंती द्रोपदा मिलैंगी सारी
अटके काम सरैंगे 2॥

गंगधार जाहां मुक्ति निशानी
दरश परश से हो अघ हानी
वेद आवाज पड़ैगी कानी
धुन सुन पाप हरैंगे 3॥

जो सज धज पहले आवैंगे
वै नृप से आदर पावैंगे
जो पीछै को रह ज्यावैंगे
मेरै हाथ मरैंगे 4॥

ले धनमाल चलो सब जाति
कोई वाहनों पै कोई पदाती
दुनिया में होगी विख्याती
सर्बस भेंट धरैंगे 5॥

बज रह्या ढोल कूच की भेरी
जल्दी चलो करो मत देरी
महोर सिंह तज भूल भुलेरी
नांह लिखंत टरैंगे 6॥

राम.  

अरिल -(छंद)
पुरवासी नरनार समट आवन लगे
निज निज का धनमाल सभी ल्यावन लगे

आ रहे रथ गज बाजी पिनस और पालकी
छखड़े गाड्डे गाड़ी भरी धनमाल की

धैन लंगार कतार करहों की आ रही
यज्ञ सामान लदे हथनापुर जा रही

फौजों में बाजैं हैं बिगल तैयारी हो रही
श्यामकरण की सजावट न्यारी हो रही ॥

दोहा –
खजानची है भूप का, सुदेव जिसका नाम ।
आज्ञा पाकै भूप की, गया वो अपने धाम ॥

टेक – 3
माता जल्दी हो तैयार
पुरवासी हथनापुर जा रहे ॥ टेक ।

पाँचों पंडू धर्म अवतार
जिनके मित्र हैं कृष्ण मुरार
निर्मल बहै गंग की धार
गंग किनारै जज्ञ रचा रहे 1॥

माता बोली बचन उचार
तेरी किसनै दई मति मार
ये सभ मूरख हैं नर नार
विप्रों की फंटी में आ रहे 2॥

दान पुण्य व्रत पर उपगार
करने से हो बेड़ा पार
माता क्यों तूं ला रही वार
जल्दी उठ चल भूप बुला रहे 3॥

बेटा तैं दई बुद्धि बिसार
इन कामों से होगा ख्वार
अपना नफा नुकसान निहार
कथ कथ महोर सिंह पद गा रहे 4॥

दोहा –
सख्त हुक्म भूपाल का, माता कहना मान ।
चलना जरुर होयगा, ये निश्चय कर जान ॥

बेटा किसकै भरोसै घर छोड़ कै चलूं ॥ टेक । (दादरा)

गीहूं पके खड़े खेत में धानों का है पकान
पीछे से ग्वाल उजाड़ देंगे हो कितना नुकसान
हथनापुर जाने से मैं तो रेत में रलूं 1॥

म्हारै चोरटी चटोरी घर में गंठड़हा नार
मेरे आगै भी ये नांट लैं कैसे करूं इतबार
इनकी मारी मैं तो ना घर बाहर निकलूं 2॥

मेरे घर में हरदम रहते घृत दूध दही के ठाठ
मेरै चलीं गऊ भैंस सब हो ज्यांगी बाराबाट
मैं ना चलती भूपाल मोहे मार दो भलूं 3॥

सूना घर देख चोरटे धन ले ज्यांगे निकाल
इस जज्ञ के झगड़े में हो बैठैगा कंगाल
महोर सिंह बिरधा कहै मैं ना घर से हलूं 4॥

माता कहना मेरा मान
कहना मानै तो हो कल्याण ॥ टेक ।

जी श्रीकृष्ण का दर्शन करिये गंगा का अस्नान
महापरब अश्वमेध यज्ञ में हंस हंस करना दान 1॥

जी माता बोली करै ठिठोली बिरधा सेती आन
लग्या मेरै परमोध लगावन समझ मोहे अणजान 2॥

जी जब कभी धर्म करा घर में हुई धन कुटम्ब की हान
च्यारूं कूणे भर गये जब से छुटी धर्म की बाण 3॥ जी हमनै तो ना धरम लहनियां भूल्या जान पिछान
पीहर सासरै धर्म बंध है सोच समझ अज्ञान 4॥

जी धनमाल बरबाद करण की बेटा तैं लई मन में ठान
धर्म में दमड़ी भी दे दई तो खो द्यूंगी अपनी ज्यान 5॥

जी धन से आदर धन से इज्जत धन हो कुलवान
महोर सिंह कहै जर दगवा सुत धन है जीवन प्रान 6॥

राम. राम.

दोहा –
जा सुदेव नै भूप से, दिया सब हाल सुनाय ।
दूत भेज भूपाल नै, बुढ़िया लई बुलाय ॥

  माता अब तो कर कुछ ख्याल
बचपन गया जवानी गई लई बुढापै घेरी घाल ॥ टेक ।

आंख्यौं में छा गई अंधेरी हाडों से छुटी खाल
मुख में जाड़ दांत नहीं सिर के सफ़ेद हो गये बाल 1॥

घर कै गंफी घालीं बैठी दबा रही धनमाल
खर्च्या खाया ना धर्म किया बांधै कुटम्ब की पाल 2॥

घणी गई थोड़ीये रही अब निकट आण लग्या काल
काट्या जा तो काट तूं अबभी मोह माया का जाल 3॥

गंग किनारा जज्ञ पंडवों की आय रहे नंदलाल
तीनों अणी मिली हैं अब तो चलकर हाथ पखाल 4॥

ऐसा अवसर फेर मिलै ना मत चुकै कर छाल
दिया लिया आडीं आवै ना लावै कुटम्ब की ढाल 5॥

ओस का मोती पाणी का बुलबुला सामण की हरियाल
काया माया महोर सिंह ऐसी हो होकर गई चाल 6॥

हो ज्या बरबाद घर मेरा तेरा क्या बिगड़ै भूपाल ॥ टेक ।

मनै हथनापुर से क्या लीणा
ना पैसा धरम में दीणा
घर उजड़ै मेरा लखीणा धीणा की करै कौन संभाल 1॥

पाँचों पंडू सुने बानेती
ये तो फिरैं कोई धाड़ेती
मैं नहीं चलती इनकै सेती खेती उजाड़ देंगे ग्वाल 2॥

मैं दाबीं बैठी थी दाबा
कोई घर बड़ ज्या किसकी ताबा
बेटा तैं करा खराबा काबा लूटैंगे धनमाल 3॥

पाँचों पंडू कृष्ण पड़ो झेरै
ना गंगा का प्रेम है मेरै
महोर सिंह जरदगवा न्यूं टेरै गेरै आंसू बकण लगी गाल 4॥

शिव. शिव.

दोहा –
बार बार समझा लई, बिरधा समझी नांय ।
हाथ पैर कस बांध दई, बिठा पालकी मांय ॥

बिरधा राजा को दे गाल
परबस हो रही रुदन मचा रही ॥ टेक ।

बिरधा करने लगी कुलाल
भाखै बिंग बचन बिकराल
तेरा जाइयो नाश भूपाल
या बिरधा कितनी दुःख पा रही 1॥

सभ का मंगा लिया धनमाल
पुरवासी कर दिये कंगाल
तूं भी होय चुका खस्ताल
तेरै अक्ल अंधेरी छा रही 2॥

ना पंडू लावैंगे ढाल
ना वा गंगा करै निहाल
ना कड़ लावैगा नंदलाल
तेरी हूणी तोहे बुला रही 3॥

जज्ञ नहीं लूटण का जाल
अब भी समझ सोच कर टाल
महोर सिंह की बाज रही ख़टताल
बिरधा राजा को भरमा रही 4॥

ख्याल –
कूच नंगारा बजा भूप सिद्ध गणेश मनाय चले
ईष्ट देव कुलदेव ग्राम देवों को भूपति ध्याय चले

बजैं नफीरी नोबत झड़ रही धोंसै चोब लगाय चले
घुरैं निशान धजा फरकैं हैं बल्यम चोब सजाय चले

आगै आगै सावकरण है पीछै लस्कर लाय चले
जयति जयति मुख से बोलैं उमंग उमंग हर्षाय चले

चारण भाट सूत बंदीजन बंश बिरदावली गाय चले
भरा भाव चढ़ा चाव महोर सिंह गजपुर को हुलसाय चले

दोहा –
राजा नै युवराज को, दिया राज का भार ।
कई सहस्र भट पुरी के, छोड़े रक्षाकार ॥
सज धज गजपुर को लस्कर जाय रहा ॥ टेक ।

रथ गजबाज करहों की डारा
चले तुंग बन न्यारा न्यारा
उठ उठकर गरद गुबारा
अम्बर छाय रहा 1॥

बजैं साज धुनि दशों दिश छा रही
धुन सुन परजा समटी आ रही
तुरंग की पूजा होती जा रही
भेंट चढ़ाय रहा 2॥

बोला भीम भूप से बानी
जोजन बीस रही रजधानी
मैं जा खबर करूं अगवानी
भूपति आय रहा 3॥

भूप कहै जल्दी से जाना
धर्मसुत से जा कुशल सुनाना
महोर सिंह नित हरिगुण गाना
अवसर पाय रहा 4॥

---- इति श्री ----