दोहा-
कृतवर्मा कृप द्रोणसुत, दुख भरे मारत श्वास ।
बख्त मिला तीनों गए, दुर्योधन के पास ॥
दुर्दशा देख दुर्योधन की
तीनों को हुई दुखदाई । टेक । (त्रिभंगी)
तीनों होय कै उदास, बैठ गए ल्हास पास, दुख भरे मारैं श्वास, बोले बानी
एकबार दृग खोल, भूप मुख सेती बोल, तेरा पूरा करैं कोल, मन में ठानी
रोष भरे आरत बैन, सुन खुल गए नैन, चित को ना पड़ै चैन, दृग भरे पानी
पापी भीम मेरे संग, लड्या तोड़ गया जंघ, हुया पड्या हूँ अपंग, रण मैदानी
दल हुये बारा बाट, गए आए राजपाट, हुई मोत के आ घाट, कुणबाघानी
पांचों पंडु मरे नांय, स्याल रह्या छाती मांय, जो वै अभी मारे जांय, सुन तजूँ प्रानी
वै तो पांचों जंग जीत, बैठे होय कै नचीत, मेरी मट्टी है पलीत,
जब तपत बुझै मेरे तन की
मारे जां पांचौं भाई 1॥
अश्वथामा बलकार, बोल्या भूप धीर धार, शीश पांचों का उतार, तेरे पास ल्याऊं
उल्लू गुरु मैं बनाया, कुछ सीख उनसे पाया, करूँ तेरा मनचाहा, अब ही जाऊं
इतनी कहकै चाल पड्या, जाय शिविर मांह बड्या, आगै द्वारपाल खड्या, क्या जत्न बनाऊं
करै शस्त्रों से प्रहार, खाली गए सब वार, देख्या रूद्र का आकार, शिव को ध्याऊं
हुया अग्नि में प्रवेश, प्रकट हुये तब महेश, हतूं दल रहे शेष, यही वर पाऊं
शिव देकै वरदान, होय गए अंतर्ध्यान, अब करूँ घमासान, शिव खड़ग ठाऊं
द्वारै कृतवर्मा बैठाया, आप खड़ग लेकै ध्याया, द्रुपद पुत्र जा जगाया
कर मार पीट धृष्टद्युम्न की
बड़ी देर में जान छुड़ाई 2॥
धीर वीर अश्वथामा, पहन लिया खूनी जामा, बोल दिया कतलामा, दें किलकारी
खड़ग लिया है चुचकार, करन लग्या है संहार, शयनसेज को बिसार, भाग चली नारी
मांच गई हाय होय, आगै पड़ै नहीं कोय, बालक भागैं रोय रोय, छोड़ महतारी
हो रही भागा दौड़, भागे शिविर छोड़ छोड़, आग लाई ठोड़ ठोड़, जलैं छोलदारी
भागे फिरैं घोड़े हाथी, चिथ चिथ मरैं पदाती, जिनका कोई ना हिमाती, हुई लाचारी
दरवाजे पै डाट डाट, कृतवर्मा रहे काट, शिविर हुया बाराबाट, छवि गई सारी
पैदल काटे दस हज़ार, पंच सहस्र घुड़सवार, दो सहस्र रथी मार
लग्या तल्लाश में फेर पंडवन की
कहीं देते नहीं दिखाई 3॥
हाथीवान शत सात, करकै उनका भी घात, शिव खड़ग लिया हाथ, आगै ध्याया
देख्या नज़र को पसार, पांचौ द्रोपदी कुमार, लिये खड़ग हथियार, मोर्चा लाया
पाँचौ उमंग उमंग, खूब खेले रण जंग, आखिर वै भी हुये तंग, काल सिर छाया
करकै खड़ग का प्रहार, पांडवसुत दिये मार, शीश पाँचौं का उतार, चलकर आया
जैसे पंडु हैं अनूप, पांचों पुत्र तदरूप, देख दुर्योधन भूप, बड़ा हर्षाया
देखते ही दृग मींच, गया कपाली कूं खींच, प्राण त्यागकै कुलींच, स्वर्ग पद पाया
महोर सिंह मतिमंद, नित भाषा कथै छंद, गुणी करते पसंद
टूटी फूटी वृद्धापन की
ये है मेरी कविताई 4॥