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शांति पर्व

क्या राजनीति को जानै
बन बन धैन चरावनिये ॥ टेक ।

जात पात जानूँ हूँ तेरी
ले ले टूक गऊ तै घेरी
इब आया राड़ बुझावन मेरी
बंसी बजावनिये 1॥

गोपियन से करी बाराजोरी
लठिया मार मटकिया फोरी
करता फिरा ब्रज में चोरी
बस्त्र चुरावनिये 2॥

कब से पंच हुया रे सांगी
नाच्या पहर घगरिया आंगी
घर घर छाछ ब्रज में मांगी
नाच रिझावनिये 3॥

देखो आया न्याव करनिया
ग्वाल गैल गौओं कै फिरनिया
महोर सिंह तेरा ध्यान धरनिया
भगत बचावनिये 4॥

राजों के राज दरबार में
आयो न्याव करनियो कान्हू ॥ टेक । (सांगीत)

भाई कर्ण दुस्सासन पूछो तुम या की जात
कौन या की जन्म भूमि कौन या को तात मात
शर्म या को आवै नहीं खड़ा यो बनावै बात
तुम देखो या की ओड़
शीश बांधकर मोड़
सभा बीच आया दौड़
कुछ है नहीं कसर गंवार में
या को बन्यो कुचलनू बानू 1॥

मामा सुगनी तुम भी देखो कैसा वक्त गया
आय पैर की तो जूती और शीश को रही लुभाय
ऊंच नीच जानै नहीं मद या कै रह्या छाय
जात बर्ण कुलहीन
हमको सीख आया दीन
मानो करकै यकीन
या के अवगुण जानू हजार मैं
कहो कब लग आज बखानूं 2॥

हमको सुनावै देखो राजनीति के यो धर्म
ग्वालिये की भाज गई आज देखो सारी शर्म
जिद जिद हम सेती खुल गयो या को मर्म
आधे राज को चहै पूछो कित यो रहै कौन होय कै कहै
सबसे कहूं पुकार मैं
या की एक कोय मत मानो 3॥

आज तो आधा मांगै कल मांगै सारा राज
न्यू के भाई पार जा है यो है बड़ा निरलाज
सूनी नहीं राजधानी एरे कृष्ण बेलिहाज
टिकै सेल की अणी
भूमि द्यूँ ना इतनी
कहूं और क्या घणी
महोर सिंह कृष्ण आधार मैं
लियो और कुछ नहीं जानूं 4॥

डिग ज्यागी धरण तेरे भय से
जरा झीना झीना बोल रे ॥ टेक ।

झाल तेरी ना जाय सहारी
डिग ज्यागी या भोम बिचारी
जल में बसै द्वारका म्हारी
खा ज्यागी कहीं झोल रे
फिर ठहराऊंगा कैसे 1॥

मैं तो बन बन गऊ चराई
तैं कित कित रण में जय पाई
मुझको चोर कहै अन्याई
वो पांचों अनमोल रे
तै ठगे ठगै ठग जैसे 2॥

राजनीति को जानन हारे
हम तो नहीं पर तुम हो सारे
परत्रिया चुरावन हारे
क्यों रहा धरती तोल रे
बिन जीव पैदना तैसे 3॥

जो तू खैर चाहे जरजोधन
आधा बांट पंडवों को द्यो धन
महोर सिंह कहै आया बोधन
अब चलैगी नहीं पोल रे
जूए में चली थी वैसे 4॥

किले के धनी बचन हमारा मान ॥ टेक । (जंगम)

ग्वाल मैं ही, नंदलाल मैं ही, गऊपाल मैं ही, मैं ही जार चोर
मेरै जात नहीं, पिता मात नहीं, सुत भ्रात नहीं, नहीं घर की ठोर
जो जो तै कही, वो सारी सही, मैंने खाया दही, गौरस चटोर
मैं ही नाचूँ नचाऊँ, खेल खिलाऊं, ताल बजाऊं, हूं कठोर
नहीं किसी का शत्रु मित्र हूं सम है सकल जिहान 1॥

पर आपस के वाद, में ना स्वाद, जागै बिषाद, मेरी मान कही
वो पांचों रणी, जिनके शस्त्र फणी, कुछ थोड़ी घनी, दे बांट मही
आपस में प्रीत, कर तज अनरीत, राजों की रीत, कुल धर्म यही
जो चाहै बुरी, राखै दृष्टि घुरी, वा कंठ छुरी, द्यो दोष नहीं
वै तो थारी बुरी ना चाहैं तुम चाहो उनकी हान 2॥

थारै आठों पहर, रहै मन में कहर, लडुवों में जहर, दीन्हा खुवाय
कर कपट खेल, ना रख्या मेल, दिये बन में पेल, कीन्हा अन्याय
द्रोपदी का चीर, गह्या हो बेपीर, नंगा शरीर, करना ठहराय
चिन लाखा भवन, वा में करकै गवन, ला दिया अगन, भीतर बसाय
थारे बचन मान गये बन में तजकर राज अस्थान 3॥

इब मतना नाट, दे राज बांट, अब सीम छांट, उनकी न्यारी
होये सर्ब निंगला, ना तेरा भला, उनका भी रला, वो हैं अधिकारी
तज बैर भावो, कर मन में चावो, पंडवों को ल्यावो, महिमा थारी
करकै उमंग, कुछ बांध ढंग, गावै महोर सिंह, दे बलिहारी
दुर्योधन कै ज्वाला जागी सुनकर कृष्ण बखान 4॥

दोहा सेल अणी मोटी घनी, टिकै मूंछ का बाल ।
भूमि इतनी द्यूँ नहीं बांटकै, सुन नंदमहर के लाल ॥

भूमि इतनी द्यूँ नहीं बांट कै
जितने में टिकै सुई की अणी रे ॥ टेक ।

सुन ले रे तूँ नंद महर के
जानत हैं सब लोग शहर के
जो हम देते लड्डू जहर के
मर जाते हिया पाट कै
क्या उनको विपत बनी रे 1॥

वो हैं पांचों नमक हरामी
खाय पीय मेरी करैं बदनामी
तूँ क्या जानै उनकी गुलामी
द्वारापुरी से छांट कै
तेरी ल्याये उड़ा भगनी रे 2॥

जार भाव से हुये अधर्मी
फिरै जार पकड़ी बेशर्मी
देखे सुने ना इसे कुकर्मी
एक त्रिया घर डाट कै
वा परणी पाँच जनीं रे 3॥

वो नहीं राज करन के लायक
घुडसाला में आ रहो पायक
महोर सिंह हरि नाम सहायक
धड़ से शीश को काट कै
कोई बनैगा राज धनी रे 4॥

बेईमान बैठ पंचात में
उस दिन क्यूँ लिखत करी थी ॥ टेक ।

लिखत करनिये जीवैं सारे
दस्तक हो रहे न्यारे न्यारे
तिल गंगा जल डाभ गिरा रे
भर भर कलम दवात में
लिखने को भुजा पसरी थी 1॥

लिखत करे पीछै जो नाटै
लगे पाप जैसे गऊ सिर काटै
क्यों नहीं आधे राज को बांटै
कुल तेरा बर्ष हिदात में
लिख गंगाजली हाथ धरी थी 2॥

जो थारै या हे थी मन में
क्यों नाहक वो काढ़े बन में
क्यों किये धर्म कर्म पंचन में
उगमते प्रभात में
सूरज की साख भरी थी 3॥

लिखत थारी ना हुई पुरानी
डूबोगे करते बेईमानी
महोर सिंह नै साख बखानी
गुण गाउँ दिन रात मैं
पल की ना भूल परी थी 4॥

तूँ कन दिया बीच बिचोला
म्हारा सौ आपस का झगड़ा ॥ टेक ।

हम उनके वो भाई हमारे
एक पेट कुछ हैं ना न्यारे
तू है कौन हमे बतला रे
होय गया बड़बोला
जा गा उतरा कै पगड़ा 1॥

म्हारी राड़ बुझेगी हमसे
हो ना फैसला तेरे दम से
न्याव करनिये ज्यादा तुमसे
बैठे क्यों करैं रोला
यो भाईबंदी का रगड़ा 2॥

जब कोई न्याव करन की बूझै
कहिये जो कुछ तुझको सूझै
बिन बूझे क्यों नाहक झूझै
तेरा लाया लगै ना डोला
आया लड़न होय कै तगड़ा 3॥

जो तुझको कहीं ठोड़ ठिकाना
भली भांति से उठ जा कान्हा
महोर सिंह है बुरा जमाना
ले राम नाम का ओल्हा
है बिकट दुनी का दगड़ा 4॥

इनका जन्म अगारत जायेगा
डूबैं ये लिखत करनिये ॥ टेक ।

पहली लिखत भीष्म नै करी थी
ठा गंगाजलीं हाथ धरी थी
सूरज की इन साख भरी थी
कित यो पाप समायेगा
गऊ कै गल छुरी धरनिये 1॥

डूब गया यो अंध कुरु जी
लिखत करी थी इस नै दूजी
ज्यादा डूबा द्रोण गुरूजी
क्या मुख ले बतलायेगा
फिरैं झूठी साख भरनिये 2॥

लिखत करी सब सरदारों नै
थारे ओर उनके प्यारों नै
लिखत करी चिंडाल च्यारों नै
नहीं मांस पखेरू खायेगा
अनरथ से नहीं डरनिये 3॥

बीसों बिश्वा लिखत शहर की
मतना विचारो बात कहर की
राड़ भली ना आठों पहर की
वंश नष्ट हो जाएगा
महोर सिंह गुरु ध्यान धरनिये 4॥

हो जाएगा राज बंटेरा
जा इब तो फेर कदे आइये ॥ टेक ।

इबतो मुझसे नाह निकस गई
द्यूँ ना राज ये मन में बस गई
तेरी बोली जिगर को डस गई
अब नही हो सुलझेरा
दिन पाँच सात गम खाईये 1॥

इब नहीं डोर धरण द्यूँ भू पर
हो जाईयो चाहे तल की ऊपर
जो लग गया चपेटा मूंह पर
क्या बड़पन रह तेरा
जो चाहै खैर उठ जाईये 2॥

भाग रेख जो हो मकसूमी
तिल तिल या बंट ज्यागी भूमी
साध मुहूर्त पूछन यौमी
करिये गमन सवेरा
दो चार पाँच संग ल्याये 3॥

ऐसा राज आज तू लेगा
मोड़ मुकट अपना तू देगा
महोर सिंह क्या बंधेगा सेगा
दे लेंगे हम घेरा
फिर धोखा धार पछताईये 4॥

मतना करै तकरार तू
राजा पंच फैसला कर कै ॥

न्यू मतना समझिये प्यारे
उलटे हट ज्यांगे भय खा रे
लेंगे राज को जंग मचा रे
फिर रोवै सिर मार तू
पडै धड़ से शीश उतर कै 1॥

आधी नहीं पर देगा सारी
कर अपनी और उनकी ख़्वारी
घर से गई समझ सरदारी
क्यूं बहक्या फिरै गंवार तू
सिर टेढ़ा पगड़ा धर कै 2॥

जो तूँ नाहक ज़ोर करै है
अपने कंठ कुठार धरै है
क्यूँ थोड़ी से घनी करै है
मिल ले भुजा पसार तू
महोर सिंह चाव मन भर कै 3॥

पंचों की लिखत मंजूर है
जो लिखी सो सब मैं जानूँ ॥

ये है राड़ न तेरे बसकी
लग गई बाजी म्हारी आपस की
देसोटे में कसर दिन दस की
लिखतम पाँच जरूर हैं
मँगवा ले पंच परवानू 1॥

पांचों बंधु मुचलके करकै
गये डंड पंचाती भरकै
इब फिर आया राड़ से डरकै
उनकै कुछ मगरूर है
लग गया बहकाव बिरानू 2॥

वो हो गये चोर पंचाती
चोरों के हुये चोर हिमाती
राज बंटाते शर्म नहीं आती
कित का कौन फितूर है
मैं तुझको नाह पिछानू 3॥

सध लई तेरी उठ इब तू जा
ना तो होगी गहरी पूजा
महोर सिंह कहै फिरैगा सूजा
तुझको नहीं सहूर है
कुछ हो ज्यागो जुर्मानू 4॥

उनका तो नहीं कसूर है
तेरी रही न नीत ठिकाने ॥

देशोटे मैं कसर रही ना
बचा लोन्ध का चार महिना
इब तक तुझे कभी कही ना
तू बेईमान जरूर है
नहीं कहे सुने की माने 1॥

लिखतम येही हुई थी पहली ...................

वैसों के वैसे ही यार हैं
कोई नहीं पंच पांचन में ॥ टेक । (सांगीत)

भीम तो है पशुबुद्धि घणा सोवै घणा खाय
अर्जुन नहीं बीर मर्द हीजड़ा बना है जाय
धर्मपुत्र डरपोक जंग सेती भय खाय
नकुल निर्भाग और सहदेव कर्महीन
ग्वालिये फिरैं हैं दोनों ग्वालापन में परबीन
असल नहीं एक जिन में पांचों कम सलचीन
पांचों मूढ़ गंवार हैं
रहै मग्न टूक जाचन में 1॥

जो कोई उनमें पंच होता पंचों की जानै बिचौल
वै पांचों निहंग फिरैं हाथों में लेकै सिटोल
पेट भर पड़ रहैं ऊंच नीच का ना तोल
जो वो किसी लायक होते पड़ता क्यों पंचाती डंड
राज में जो हक होता बंटवाय लेता पंड
इब तकरार ठाई करने लगे घमंड
इब हम भी तैयार हैं
बड़ी खुशी जंग मांचन में 2॥

विदुर से हिमाती जिनके दासीपुत्र जाका नाम
कृष्ण से सरपंच जिनके जानै वो किसका ठाम
ओछा कुल ओछी जात ओछे-ओछे करैं काम
ओछे ही हैं आप पांचों ओछा जिनका परिवार
ओछे ही से प्रीति करैं ओछे मुलाकाती यार
ओछी कहैं ओछी सुनें ओछापन हरबार
करैं प्यार बड़े हूंशयार हैं
बीरों के बीच नाचन में 3॥

कहना मेरा मान प्यारे कही मैंने बार बार
ग्वालियों में पिटते फिरैं उनके मुलाकाती यार
जो कोई हिमाती उठे पगड़ी उनकी लेंगे उतार
इब तक बख्श रहे उनको गरीब जान
इब ना घड़ी की ढ़ील खाली पड़ा मैदान
महोर सिंह कथ गाया भाषा में किया बखान
एक राम नाम आधार है
लगी सुरत रंग राचन में 4॥