किले के धनी बचन हमारा मान ॥ टेक । (जंगम)
ग्वाल मैं ही, नंदलाल मैं ही, गऊपाल मैं ही, मैं ही जार चोर
मेरै जात नहीं, पिता मात नहीं, सुत भ्रात नहीं, नहीं घर की ठोर
जो जो तै कही, वो सारी सही, मैंने खाया दही, गौरस चटोर
मैं ही नाचूँ नचाऊँ, खेल खिलाऊं, ताल बजाऊं, हूं कठोर
नहीं किसी का शत्रु मित्र हूं सम है सकल जिहान 1॥
पर आपस के वाद, में ना स्वाद, जागै बिषाद, मेरी मान कही
वो पांचों रणी, जिनके शस्त्र फणी, कुछ थोड़ी घनी, दे बांट मही
आपस में प्रीत, कर तज अनरीत, राजों की रीत, कुल धर्म यही
जो चाहै बुरी, राखै दृष्टि घुरी, वा कंठ छुरी, द्यो दोष नहीं
वै तो थारी बुरी ना चाहैं तुम चाहो उनकी हान 2॥
थारै आठों पहर, रहै मन में कहर, लडुवों में जहर, दीन्हा खुवाय
कर कपट खेल, ना रख्या मेल, दिये बन में पेल, कीन्हा अन्याय
द्रोपदी का चीर, गह्या हो बेपीर, नंगा शरीर, करना ठहराय
चिन लाखा भवन, वा में करकै गवन, ला दिया अगन, भीतर बसाय
थारे बचन मान गये बन में तजकर राज अस्थान 3॥
इब मतना नाट, दे राज बांट, अब सीम छांट, उनकी न्यारी
होये सर्ब निंगला, ना तेरा भला, उनका भी रला, वो हैं अधिकारी
तज बैर भावो, कर मन में चावो, पंडवों को ल्यावो, महिमा थारी
करकै उमंग, कुछ बांध ढंग, गावै महोर सिंह, दे बलिहारी
दुर्योधन कै ज्वाला जागी सुनकर कृष्ण बखान 4॥
दोहा सेल अणी मोटी घनी, टिकै मूंछ का बाल ।
भूमि इतनी द्यूँ नहीं बांटकै, सुन नंदमहर के लाल ॥