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द्रोपदी स्वयंबर

दोहा –
रच्या स्वयंबर भूप नै, अवसर समय विचार ।
दशों दिशा के भूपति, बुलवाये तेही बार ॥


रच दिया स्वयंबर राजा द्रोपत नै ॥ टेक ।

दशों दिशा के भूप बुलाये
उमंग उमंग सब ही चढ़ आये
यथा योग आसन बैठाये
आये नृपति जितने 1॥

एक योजन का रखकर सांधा
बांसों का एक मंचा बांधा
सुवरन मच्छ वा कै ऊपर फांदा
द्रोपद के सुत नै 2॥

नीचै रख दिया तेल कढ़ावा
वाके पास एक धनुष गिराया
तेल में देख मच्छ की छाया
बींध सो राखै पत नै 3॥

वही भूप मेरे मन मानै
वाही को द्रोपदी बर ठानै
महोर सिंह कोई नहीं जानै
प्रभुजी की अवगत नै 4॥

दोहा –
देख प्रतिज्ञा भूप की, हारे सभ सरदार ।
द्रुपद भूप खड़ा होयकै, बोल्या वचन उचार ॥


कोई छत्री भी यहां आया है
मेरे पण को पार करनिया ॥ टेक ।

पहर-पहरकर जोड़े जामे
आये बहोत ले लेकर सामे
क्या सारे स्यालियों नै जामे
सिंहनी नै भी कोई जाया है
द्रोपत की पैज हरनिया 1॥

क्या नरबीज हो गई धरणी
छत्री कुल क्या हारा करणी
अब मैं जाऊं किसकी शरणी
छत्रीकुल बड़ा कहाया है
मौकौं पर कटन मरनिया 2॥

है कोई राजा मच्छ उतारै
तार कै मच्छ तेल में डारै
पकड़ कै पैज भरोसै थारै
अपना ही धर्म घटाया है
पुत्री को अब कौन बरनिया 3॥

जो थारे बल की थाह हम पड़ते
कभी नहीं हम पैज पकड़ते
क्यूं म्हारे कुल धर्म बिगड़ते
महोर सिंह गुण गाया है
भाषा में छंद धरनिया 4॥

वचन सुन हो गए खड़े भूपाल
उमंग उमंग कटिबंध बांध आये मच्छ यंत्र पै चाल ॥ टेक । (सांगीत)


सुनकै वचन राजा खड़े हुये बेपरमान
यंत्र कै निकट आये बड़े बड़े बलवान
तप्त तेल देख देख शुष्क हुये जिनके प्राण
कोई वहीं गया डट
कोई उल्टा गया हट
देख छाती रही फट
उठैं तप्त तेल की झाल 1॥

तेल के कढ़ाये कै खड़े हुये जो चहूं और
धनुष को उठांवते हैं नृपति गहैं हैं डोर
शिव धनुष उठै नहीं ला लिया बहतेरा ज़ोर
दूर खड़े बाण मारैं
सुरति मच्छ ऊपर धारैं
छाया तेल में निहारैं
जलैं मूछ डड्ढी के बाल 2॥

करते हैं विचार राजा अब क्या बनै भाई
धनुष को उठाओ तो बनैगी महा दुखदाई
बिन ठाईं जग हंसी छत्रीकुल की हल्काई
चाहे जल कै मरो
भाई चाहे उभरो
सुरति मच्छ पै धरो
बिलकुल नहीं होगी टाल 3॥

बल पराक्रम जांच जांच उल्टे हट गये भूप
अंग वस्त्र दह गये रूप भी भये कुरूप
बरण बेबरण हुई कंचन काया अनूप
दूर खड़े पछतावैं
मन माहीं धोखा खावैं
महोर सिंह गुण गावै
बजा तंबूरा खड़ताल 4॥

दोहा –
फुलमाला ले द्रोपदी, सभ सखियन के साथ ।
डटी सभा में आयकै, जहां छत्री पंचात ॥


मेरे बाबल या फुलमाल बता किस राजा को पहराऊं
बर कौनसा पसंद जिसकै बामै अंग आऊं ॥ टेक ।

मैंने सुनी पिता राजभवन में
जुड़े भूप आ गई देखन मैं
बाबल मुझको तो कोई इनमें
दीखै नहीं भूपाल माल कहो किसकूं परनाऊँ 1॥

हीन दीन बल रूप कुरूपा
इनको कौन बतावै भूपा
सिंहनी जनती सिंह अनूपा
अब जनने लगी स्याल स्यालूं से क्या ब्याह रचाऊं 2॥

धनुष उठा नहीं मच्छ उतारा
ना कनी तार तेल में डारा
प्रण नहीं पूरा हुया तुम्हारा
हुई ब्याह की टाल मैं यहां क्वांर कोटड़ा छाऊं 3॥

मत नहीं बाबल नैन बहावै
भाग लिखा सोई फल पावै
महोर सिंह नित उठ गुण गावै
भली करैंगे नंदलाल मैं उन ही के गुन गाउँ 4॥

दोहा –
जरासंध शिशपाल से, उठा नहीं वो चाप ।
देख शिखंडी भीष्मजी, हारे आप ही आप ॥


दोहा –
द्रोपती का छोटा बंधु है, धृष्टद्युम्न है नाम ।
खड़ा होय कहने लगा, राजन सुनो तमाम ॥


जो अब होता अर्जुन मच्छ को देता बींध सौ बार ॥ टेक ।

चोताल-
यो सुगनी है माहाकूर कपट भरपूर ज़ुलम अन कीना
वै लाखा भवन में बसा दग्ध कर दीना
कोई रह्या ना छत्री अंश हुई निर्बंस धरा बल हीना
अर्जुन समान दुनिया में कोये बली ना ॥
चौपैया -
यो सुगनी मित्र है किसका
चिंडाल कर्म है जिसका ।
दिया भीम को लड्डू विष का
मुख मतना देखो इसका ॥
उठत -
पांचों दग्ध कर दिया
बता क्या लिया
कम्प्या ना हिया
अनर्थी धृक जीवन धरकार 1॥

चोताल-
सुन बचन कोप गया कर्ण बांध कै पर्ण उठा बलदाई
तेरी तुच्छ पैज पै द्यूं कहै धरण डिगाई
मेरू मंदर पाषान लेकै धनु बाण द्यूं खाक मिलाई
मैं काल मौत से भी कर सकूं लड़ाई ॥
चोपैया –
जिस घड़ी धनुष को ठाऊं
रिष भरभर बाण चलाऊं
दिग्पालों के पैर डिगाऊं
धरती अंबर को छाऊं ॥
उठत -
मच्छ बींधूं हजार बार
नीचै लूं तार, द्यूं तेल कढ़ावे में डार
कोप कै उठा कर्ण दातार 2॥


चोताल –
जब सुने कर्ण के बैन लगी है कहन वा राज क्वाँरी
पिता हाथ जोड़कर कहूँ अर्ज सुन म्हारी
सब जानत है संसार कर्ण दातार बड़ा बलकारी
पर सूत पुत्र राधा जिसकी महतारी ॥
चोपैया –
सूतज को नहीं बरूंगी
विष खा कै प्राण हरूंगी
ना कर्ण पै सुरत धरूंगी
कर कै अपघात मरूंगी ॥
उठत –
दिया मार कर्ण का मान
छाई गिल्यान, सूंत लिया है म्यान
बली नै हाथ लई तलवार 3॥


चोताल –
खड़ा होकै कर्ण के पास देकै विश्वास कृष्ण समझावै
कन्या पै हाथ मत ठाय छत्री कहलावै
ये छत्रिन का ना धर्म तजै कुल कर्म शर्म ना आवै
दातार अगारथ तेरी दातारी जावै ॥
चोपैया –
बेबुद्ध है राजकुमारी
महिमा ना लखी तुम्हारी ।
सब जानत हैं नरनारी
दातार बड़ा बलकारी ॥
उठत -
कहै महोरसिंह तज रोष
समझकै दोष, होकै खामोश
बैठ गया दानी आसन मार 4॥

दोहा –
धृष्टद्युम्न के सुन वचन, छाई खुशी अपार ।
आसन तज खड़े हुए, सब राजा तेही बार ।।


अजी एजी सुनके एकदम हुए खड़े
लक्ष्य गिरावन हेत नृपति योद्धा बड़े बड़े ॥ टेक ।

शस्त्रधारी भूप सभ खड़े हुए एक संग
लक्ष्य बींधने की सबके दिल में चढ़ी उमंग
द्रोपती का रूप देख काम की उठें तरंग
द्रोपती के कारण ऐसा राजाओं कै चढ़ा चाव
मित्र थे पुराने वै भी मानन लगे बैरभाव
परस्पर द्रोह और ईर्ष्या कर रहे राव
सबके दिल बिगड़े 1।।

स्वयंबर के देखने को देव चले आये हैं
ग्यारा रुद्र अष्ट वसु वरुण यम ध्याये हैं
उनंचासों पवन आये नभ बीच छ्याये हैं
सूरज चांद साध्य गण कुबेर आये भण्डारी
गंधर्व गुहाक चारण आये देख तमाशा भारी
नारद और पश्वतक्र आय गये ब्रह्मचारी
विमानों से विमान अड़े 2।।

अनहद बाजे बज रहे होय रहे मंगलाचार
नभ सेती पुष्प बरसाय रहे बारंबार
जै जै ध्वनि होय रही शोभा तो छाई अपार
लक्ष्य बींधने को उठे जरजोधन राजा बंग
वक्र और सुनिथ पौण्ड्र यवनों के राजा कलिंग
हार थक बैठ गए हुया नही लक्ष भंग
सबके मान झड़े 3।।

किसी के तो शीश की पगड़ी उतर जाय पड़ी
फेट लाग पड़े कई हारों की टूटी हैं लड़ी
थकित होय बैठ गए जान के अशुभ घड़ी
शरमा कै बैठ गए द्रोपती की तजी आश
धरती को कुरेद रहे मार रहे लंबे श्वास
महोर सिंह गुणी गावै बसै ग्राम साल्हावास
भाषा छंद जड़े 4।।

दोहा –
सुता के सुनकर वचन, जलभर आए नैन ।
कंठ लगाय रुदन करै, बोला नृपति बैन ॥


धोखे में पुत्री धर्म गया मैं हार ॥ टेक । (जंगम)

जल भर कै नैन, राजा बोल्या बैन, नहीं पड़ै चैन, हुई हैरानी
धोखे की बात, ना रही हाथ, करकै अपघात, तज द्यूं प्रानी
ब्रह्मा के अंक, अनमिट असंक, लग गया कलंक, तजूँ रजधानी
छत्रिन के बंश, हो गये विध्वंस, ना रहे अंश , अब मैं जानी
क्या विचार किया हो गई क्या हूणी कै अख्त्यार 1॥

मैंने जिनके काज, रोप्या समाज, वो शख्स आज, दीखैं नांई
मर गये कहीं, या बैठे यहीं, मेरी हुई नहीं, मन की चाई
मुझको डबोय, गये मुंह ल्हकोय, कहीं गये सोय, निद्रा माई
नहीं पहूंची खबर, कोई काम जबर, ना आवै सबर, बिन दर्शाईं
मैं भरे भ्रम, यो किया कर्म, अब आवै शर्म, मोहे सब राईं
धनुष उठा ना मच्छ उतारा हारे सब सरदार 2॥

सुन वचन कर्ण, लग्या ज़ोर भरण, मारूं मोधी धरण, अब ही सारी
यो मच्छ मुरदार , जो ल्यूं उतार , हंसैंगे नर नार , हांसी म्हारी
मुर्दे कै हाथ , लाईं जा करामात , छत्री बिख्यात , हम धनुर्धारी
यो तुच्छ कर्म , करतीं आवै शर्म , बिगड़ै है धर्म , जग दातारी
गह पैज और, जब देख ज़ोर, होज्या यहीं ठोर, जय जयकारी
मच्छ बींधकर ब्याहूं द्रोपती तो मेरा नाम दातार 3॥

राजा होय उदास, मारै है श्वास, आये धनुष पास, भूपति सारे
ना उठा चाप, क्या चढ़ा पाप, आप ही आप, सब बल हारे
तप्त तेल झाल, उठ रही कराल, दह गये भूपाल, कर्मों के मारे
काहू के केश, काहू के भेष, कोई जीवशेष, बने दुख भारे
महोर सिंह नित उठ गुन गावै खेवा करियो पार 4॥

दोहा –
उसी समय सभा में, सन्नाटा गया छाय ।
गुप्त भेष में उसी दम, पंडू पहुंचे आय ॥


इतने में पंडू आ गये
भर रहे फकीरी बाना ॥ टेक । (सांगीत)


व्यासजी नै जाकै पंडवों को उपदेश दिया
गुरु आज्ञा पाकै चकरापुरी से गमन किया
कंपलापुरी में आये चकरी घर वास लिया
भिक्षाब्रती सेती ल्याय
भोजन जीमा है बनाय
माता सेती आज्ञा पाय
जब पांचों रूप छिपा गये
हुया राज सभा में आना 1॥

जटा तो छटक रही अंग में सोहै बिभूत
राजों की सभा में आये चलकै पांचों अवधूत
देखकै सुगनी बोल्या ये तो पांचों कोंता पूत
ये तो द्रोपती बरैं
गर्व राजों का हरैं
मच्छ भेदन करैं
हम तो मतलब पा गये
औरों को है मुश्किल पाना 2॥

तरकना करैं हैं राजा यह तो कोई भूपाल
गुप्त भेष भरकै आये भुजा हैं विशाल भाल
मच्छ भेदन करकै ये तो पहरैंगे फुलमाल ये तो द्रोपती परणावैं
मान राजौं का घटावैं
राजा ऐसे बतलावैं
संतों के तेज से छा गये, ना मर्म किसी नै जाना 3॥

कोई ताने मार रह्या पंडवों के खड़ा पास
कोई दर्शन करै कोई कोई करै उपहास
भेदभाव जाना नहीं बंध रह्या विश्वास
जैसा जैसा जिसका भाव
वैसा बरत रहे राव
करकै मन माहीं चाव
पद महोर सिंह कथ गा गये
भाषा में छंद बखाना 4॥

दोहा –
पांचों संतों को देखकर, सुगनी भया उदास ।
भेदभाव लेने चला, गया पंडवों के पास ॥

चल शुगनी धूने पै आया
हाथ जोड़कर शीश झुकाया
लियो दंडवत त्रिगुणी माया
सेवक अपना जान के ॥ टेक ।

हम संतों के संत हमारे जीवन प्रान
कहता फिरा वन आश्रमों दरम्यान
तमाम बाबा साधू थारै
नजर पड्या ना भान तक म्हारै
फिर फिरकै देख्याया सारै
बीच धरती असमान के 1॥

कौन दूध कहां जन्म स्थाना
कौन भेष और कौन थारा बाना
बतलाना कहां गुरुद्वारा
संतो कौन गुरु है थारा
दिल का भरम भजा दो म्हारा
मुख सैं बैन बखान के 2॥

सूरत तो दीखै पंडवन की
मूरत बनी पांच संतन की
मन की भ्रमता चाहिये हरनी
अब तो चहिये किरपा करनी
संतों आ गया थारै शरणी
हरो भरम अज्ञान के 3॥

कहां से आते कहां जाते हो
बैठे सभा में क्या चाते हो
बतलाते हो भेद नहीं अपना
क्यूं हुया राजसभा में तपना
महोर सिंह कहै नित हरि जपना
यही है धर्म जबान के 4॥

चौपाई –
चल सुगनी धूणे पै आया, हाथ जोड़कर वचन सुनाया ॥
सूरत तो दीखै पंडवन की, मूरत बनी पाँच संतन की ॥
कौन दूध कहां जन्म अस्थाना, कौन गुरु क्यों निहंग बाना ॥
दोहा –
पचहारा बोले नहीं, पंडू मुख से बैन ।
श्रीकृष्ण का ध्यान धर, मींच लिए थे नैन ॥

बन गये मोनी पांचों बोलत नाईं जी ॥ टेक ।

हाथ सुमरनी गल में सैली बैठे राख़ रमाईं जी
पत्थर बोलै तो वै बोलैं
सिर को मार हट गया सुगनी पूछ सब राईं जी 1॥

राजा द्रुपद रुदन करै पुत्री को गलै लगाईं जी
पुत्री कहै पिता अपने से
अब क्या बनै है बाबल नैन बहाईं जी 2॥
सुन सुन राजा गारत हो सब बैठे भुजा थकाईं जी
धर्मपुत्र से भीम कहन लग्या
डूबै छत्रापन म्हारा अब तो गम खाईं जी 3॥

राखैं लाज ब्रजराज आज ना पार पड़ै घबराईं जी
महोर सिंह प्रभु शरण आपकी
आप को सरैगा नैया पार लंघाईं जी 4॥

दोहा –
आज्ञा पाकै बंधु की, उठे पार्थ बलकार ।
दृष्टि भर देखन लगे, स्वयंबर के नरनार ॥


माया में बह ग्या रमता राम फकीर ॥ टेक ।

अनर्थ किया द्रोपद यज्ञकर
जलकर आज मरैगा फ़क्कर
कोई कहै संत नहीं यो मक्कर,
छत्री कोये रणधीर 1॥

तेल कढ़ाये कै ढिग जा-जा
दशों दिशा के हार लिये राजा
संत कै कालचक्र सिर साजा
होगा ईब दग्ध शरीर 2॥

सुगनी लग्या ज़ोर जब भरने
अर्जुन-अर्जुन लग्या उचरने
बींधै मच्छ द्रोपती परणै
अब क्या बनै तदबीर 3॥

स्याल सभा में सिंह ज्यूं जाता
या बिध चलकर अर्जुन आता
महोर सिंह नित उठ गुण गाता
सुध लेंगे यदूवीर 4॥

दोहा –
ईष्टदेव का ध्यान धर, सुमरे सर्जनहार ।
सकल सभा को नमनकर, धनुष लिया चुचकार ॥


अजी एजी बली नै सुमरे सृजनहार
इष्टदेव का धरकै ध्यान जब धनुष लिया चुचकार ॥ टेक ।

जटा जूट बांध लिये दृग तीनों लिये खोल
दायें से धनुष ठाकै बायें हाथ लिया तोल
खैंचा ताना टंकारा सज्ज़ किया दे-दे झोल
करकै मच्छ की निशानी
सुरती ज़चा आसमानी
बाण लिए लक्षंधानी
दई तेल में नजर पसार 1॥

ऊर्ध दृग खोल लिए अधो दृग लिये मींच
कर्ण नासा बंद करी मुख भी लिया है भींच
चित्त बुद्धि स्थिर किये श्वास भी लिया है खींच
लागी नाम से लग्न
ठंडा हो गया अग्न
राजा होय कै मग्न
करने लगे जय जयकार 2॥

पार्थी धनुष सेती छूट कै चल्या जो बाण
धरती धर्राय उठी कंप उठा आसमान
सुर नर मुनियों के डिग गये अस्थान
बाण मच्छ भेदन किया
और फंदा काट दिया
मच्छ नीचै तार लिया
दिया तेल कढ़ावे में डार 3॥

मच्छ भेदन होते ही जै जै जै करैं भूपाल
द्रोपती नै संत को पहराय दई फुलमाल
दुंदभी बजन लगे बजैं शंख घड़ियाल
बजैं ढ़ोल और मृदंग
सबकै छाई है उमंग
गुन गावै महोर सिंह
मेरा सत रखियो करतार 4॥

ख्याल –
शुगनी कहै सुनो भूप अब क्या तै मन में विचारी जी
जरजोधन के होते द्रोपती नै संत कै माला डारी जी ।

मांग ये है दुर्योधन की कहो क्या सला तुम्हारी जी
सोच समझ कर उत्तर दीजे ना सुननी चहूँ इनकारी जी ।

जरजोधन की गदा का वार जा ना खाली छत्रधारी जी
महोर सिंह कहैं कैरुओं की हूणी नै मति मारी जी ॥

भजन –
मेरी बेटी माड़ी तकदीर की
धूणों कै बीच तपैगी ॥ टेक ।

विधिना की है यही लिखंत जी
बेटी मेरी पर्णे संत जी
राजों का लिया देख तंत जी
करतूत देख फकीर की
थारी भी काया कंपैगी 1॥

नृपति ब्याहण जितने आये
लक्ष्य कोई भेद ना पाये
पैज कूं देख देख घबराये
ऐसे नामर्द ....... . की,
बिरथा ही देह खपैगी 2॥

मच्छ भेदन संत नै कीन्हा
राजों का मदमान हड़ लीन्हा
द्रोपत नै स्पष्ट कर दीन्हा
भगनी धृष्टद्युम्न वीर की
जंगल में नाम जपैगी 3॥

तुम और तुम्हारे कैरू प्यारे
बैठे दिखे बने बेचारे
महोर सिंह हरीनाम सहारे
कही भूप बात जमीर की
अब हूणी कहर बरपैगी 4॥

दोहा –
क्रोध भरा शुगनी कहै, मत नहीं लावो देर ।
मांग खड़ी थारै सामनै, ल्यो संत को घेर ॥


कैरूवों ने अर्जुन घेर लिया
द्रोपत की कही ना मानी ।। टेक । (त्रिभंगी)

अस्त्र शस्त्र लेकै हाथ, चले इकोत्तर सौऊँ भ्रात, करने लगे वारदात, ना मानी कही
रहे भीष्म जी बरज, गुरु द्रोणाचारज, विदुर भक्त की भी अरज, कनी सुनी नहीं
जद बोल्या दानी कर्ण, द्रोपती से चरण, दबवाऊं जीत रण, मेरा पर्ण यही
मेरा मान जो घटाया, सूत पूत जो बताया, दोष कुल कै लगाया, के कसर रही
शुगनी कहै मारो मारो, मत बात और विचारो, शीश संत का उतारो, होगी मन की चही
कैरू भर भरकै जोर, करैं धनुषों की टंकोर, फिरे अर्जुन के चहुं और
अर्जुन नै भीम को टेर लिया
चुचकारा लख़्संधानी 1।।


जब भीम बली आया, मार गदा से गिराया, कौरवों को धमकाया, दूर किये सारे
चले अर्जुन के बाण, कम्पे धरती असमान, कैरू हुए सावधान, कई धनुष धारे
मारोमार करता आवै, झड़ी बाणों की लगावै, बड़ा जोश जो दिखावै, ना टरे टारे
हुया भारी संग्राम, नहीं मिलै उपराम, राजा देखैं थे तमाम, युद्ध हुये भारे
कई हुये छिन्न भिन्न, कोई भुजा शीश बिन, कइयों को गया चिन
जब सौवों नै मुख फेर लिया
गये जीत जंग सेनानी 2।।


चल पड़े जंग जीत, पांचों होय कै नचीत, राजा गाने लगे गीत, पाई प्रभुताई
कैरूओं का समाज, हाथी घोड़ा रथ साज, गए हथनापुर को भाज, वो सौऊँ भाई
जीत कैरुओं से जंग, चले पांचों निहंग, द्रोपती को लेकै संग, हुई सुखदाई
छाई द्रोपत कै उदासी, पुत्री ले गया सन्यासी, मेरा मरण जग हांसी, हुई हल्काई
मेरा डूब गया धर्म, और बिगड़ा है कर्म, आई राजा को शर्म
मुख पर पल्ला गेर लिया
नैनों में भर आया पानी 3।।


वो तो पांचों हरिजन, सजनों होकै मगन, कुम्हरी के भवन, चलकर आया
दई अर्जुन नै आवाज, माता भिक्षा लाये आज, सुन जननी आई भाज, आनंद छाया
जै जै बोली कोंता माईं, जो कुछ भिक्षा तुमने पाई, बांट लियो पांचों भाई, सुन पछताया
खोला कुटी का द्वार, माता निकसी बाहार, देखी खड़ी राजक्वांर, नैनीं नीर छाया
देख देख पछताती, धोखा मन माहीं खाती, कुछ पार ना बसाती, खूब समझाया
उस चकरी के धाम, पांचों ले रहे विश्राम, साँचा एक राम नाम
पद महोर सिंह नै हेर लिया
कथ दिया भजन परमानी 4।।


--------ॐ श्रीरस्तू--------