सोहनी
(आधुनिक काल में रिश्तों की बदलती परिभाषा)
बिन आपस के मेल का जीवन नहीं ये नरक है
समझो उन्हें नादान जिनके मनों में फरक है ॥
जहां भाव का आभाव है और छल कपट का मेल है
वहां धर्म ना अधर्म है जहां पक्षपाती खेल है ॥
लोभ लालच तृष्णा बिन मुश्किल जगत में जीना है
राजेश कहै हरिभक्ति बिन वृथा जन्म धर लीना है ॥
दोहा
रिश्ते नातों की कद्र, जानत ज्ञानी लोग
अपनाकर सद्भाव को, बिसराते सब सोग ॥
भजन (जकड़ी)
बदली जग की सार, भावना हीन हुई ॥
रिश्ते नाते और अश्नाई, महिमा जिनकी बड़ी बताई
समझा जिनको सदा हितकारी, उंची थी जो रिश्तेदारी
जिनके नाम से खुश होते थे, मिले बिना ना पल सोते थे
जिनके संग में जिंदगानी थी, प्रीत प्रेम की नई कहानी थी
जिनके संग सजते थे सपने, जिनको नित बतलाते अपने
जिनके संग हंस बोलते खाते, पल ना उन्हे हम मन से दुराते
जिनके लिये बढ़ जाती धड़कन, बिन दर्शन होती थी तड़पन
जिनके संग था जीवन प्यारा, सुख चहे दुख हरपल का सहारा
दई सब रीत बिसार, समझ मलीन हुई 1॥
बुआ बहन का रिश्ता प्यारा, भाई भतीजा जिनका दुलारा
घर में उनकी कदर घटी है, मिलन जुलन की चाह हटी है
गर्मी की छुट्टी में आना, संग बैठकर भोजन पाना
बच्चों के वो खेल निराले, दूध दही और छाछ के प्याले
खेल खेल में मित्रता बढ़ती, आपस-प्रेम की बेल भी चढ़ती
मोबाईल नै चाल बिगाड़ी, प्रेमभाव तज बने अनाड़ी
अपने मन मदमस्त हुये है, संस्कार भी ध्वस्त हुये हैं
इकलखोरी की भावना जागी, मेलजोल की राह तक त्यागी
टूट गये परिवार, एकता क्षीन हुई 2॥
बहू का घर में वर्चस्व बढ़ गया, स्वार्थसिद्धि का रंग जो चढ़ गया
पीहर का रहै चाव निराला, ससूराल के नाम पै ताला
सास ससुर का मान रह्या ना, संस्कृति का ध्यान रह्या ना
जो थे कभी भगवान समाना, वो अब खाते केवल ताना
बन मेहमान रहैं अपने ही घर में, कोई कोई अलग रहै उसी नगर में
रात और दिन बस ताड़ना खाते, सास ससुर इसे भाग्य बताते
मायके और ससुराल का अंतर, बच्चों संग भी दिखा तदन्तर
मायके के बच्चों को प्यार दें, बाकी को वे तुरंत दुदकार दें
सौतैला सा व्यवहार दिखाती, हिचक समाज की अब नहीं आती
सनातन रिवाज़ आधार, तेरह-तीन हुई 3॥
बेटों का भी हाल यही है, करते वही जो पत्नी ने कही है
पत्नी-प्रेम में अंधे हो रहे, मातपिता का दुलार जो खो रहे
साली सलहज और सास का, भरा भाव अब नये विश्वास का
छूट गये अब मामा नाना, जिनके यहाँ था नित का जाना
लोगों की अब सोच बदल गई, पत्नी के ही रंग में ढल गई
बहन से प्यारी लगती साली, जिसने घर में पकड़ बना ली
सास का कद बढ़ गया मात से, होते काम उस ही की हिदात से
पिता का दर्जा उत्तम कहाया, पर ससुर के आगे क्यूं डगमगाया
जग में न्यारी बयार बही है, ईश्वर जाने कौन सही है
गुरु महोर सिंह जी कृपा करना, दास को अब लीजे शरणा
रट राजेश करतार, भला हो मीन हुईं 4॥