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पंडित रतिराम जी (परम गुरु)

त्याग कै कपट झट डट रट राम राम राम ॥

चोरासी में मर्म धर्म शर्म कर्म कीन्हा
नेक कमाई कर धर नर तन लीन्हा
गट पट सट हट त्याग रट सुबह शाम 1॥

बना विषियों का स्वादी आधी व्याधि नै सताया
काम कीच बीच नींच वृथा जन्म गंवाया
तृष्णा बीमारी खारी भारी प्यारी लागै बाम 2॥

धरै नहीं धीर शरीर नीर सा वहीर लागा
किया ना भगवान ध्यान ज्ञान कोन्या अभिमान त्यागा
मतलब सार परिवार नार प्यार करैं तमाम 3॥

किया था करार गुण गावै बारंबार
हुया वचन हार नाव सै हुआ नहीं पार
रतिराम दिल थाम सर ज्यां सब काम रट घनश्याम 4॥

क्या जवाब दे सरकार में, पड़ा भ्रम बुर्ज में सोवै ॥

भ्रम बुर्ज में सेज बिछाई
गाफिल हो तुझे निंद्रा आई
लाखों जन्म की खोई कमाई
ममता के बाजार में, फिर जमा देख क्यू रोवै 1॥

दुरमत दूती फिरै अमानी
संग लिए दुविधा पटरानी
शील संतोष दया नहीं ठानी
लग्या कुबद्ध की कार मैं, क्यूँ विष के बिरवे बोवै 2॥

आवै जनरेली परवाना
होगा कूच पल भर में जाना
पकड़ मंगा ले यम का थाना
ले ज्या छोड़ै दरबार में, जद जी को मुश्किल होवै 3॥

चेत चेत नर मूर्ख अंधे
भजन करो कट ज्यां यम फंदे
रतिराम सतगुरु के बंदे
ज्ञान गंग की धार में, जहां सुरता धोबट धोवै 4॥

धन धन है तेरी कारीगरी भगवान
भेद समझ में आया ना तेरी अजब निराली शान ॥

हाथी बड़ा बना दिया इतना छोटी आंख बनाई क्यूं
सूरज इतना गर्म किया फिर चाँद में शीतलताई क्यूं
छोटी सी चिट्टी के पेट में भारी गांठ लगाई क्यूं

कोई टुकड़े से मोहताज फिरै दर दर का बना भिखारी क्यूं
गद्दी आसीन किया कोई दी इतनी साहूकारी क्यूं
उसी राह से आते सब धर्मी एक अत्याचारी क्यूं

सांप कै कान दिये कोन्या वो बिना कान बेचारा क्यूं
हीजड़े पैदा क्यों होते हैं ढंग दुनिया से न्यारा क्यूं
जब निर्मल नीर नदी का है तो बना समंदर खारा क्यूं

किसी कै लार फिरै बेटों की किसी कै एक पिल्लर क्यूं ना
सभी गगनचर पर वाले फेर चमगादड़ कै पर क्यूं ना
गुल्लर कै फल फुनगे आला आधा फूल नजर क्यूं ना
कैर कै तनै पात दिये ना कर दिया डुंड समान 1॥

उल्लू कै तनै आँख दई दिन में ना दे दिखाई क्यूं
किसी किसी के हाथ में उंगली भगवन छः बनाई क्यूं
जब रात बनाई सोने को चकवे नै रात जगाई क्यूं

बता किस तरियां दुबकाई तनै मेहंदी के भीतर लाली
सीप को मोती बख्स दिया और मणि सर्प को दे डाली
पत्थर में से हीरा निकलै ये अजब बात देखी भाली

दुम्भे को दुम लंबी कर दई इतना बोझ बढाया क्यूं
दुम की जगह करंट बिजली का जुगनु कै चिपटाया क्यूं
मेंढक नै के खता करी यो बिना जबां कहलाया क्यूं

जब सृष्टि इतनी लंबी रची फेर शक्ल सभी की न्यारी क्यूं
जानबूझ तृष्णा के भंवर में डूबैं ये संसारी क्यूं
कौवे कै तनै नैन दिए दो एक पुतली डारी क्यूं
दुर्बल क्यूँ खरगोस बनाया शेर किया बलवान 2॥

कोयल को सुरमस्त बना दिया रंग बनाया काला क्यूं
नालोदर कपि सुने जन्म से ऐसा ढंग निराला क्यूं
जिंदगी भर ना ख़त्म होय मकड़ी के मुंह में जाला क्यूं

वही सूरज और चंद्रमा फेर मौसम न्यारे न्यारे क्यूं
गर्मी और बरसात कभी पड़ते हैं शीत करारे क्यूं
मटर के दाने में बतला भुनगे नै पैर पसारे क्यूं

एक अचंभा भारी है ये जीव कहां से आता है
जन्म से पहले अस्तन में तूं कैसे दूध बनाता है
हाड का पिंजर पेट कै अंदर किस रस्ते पहुंचाता है

आँख कान मुंह नाक बनाये भीतर कहां उजाला था
ऐसा बड़ा अस्थूल बना दिया कैसे देखा भाला था
जब हाड मांस की देह बनाई कहां से लिया मसाला था
ज्ञान इंद्री कर्म इंद्री रच दई पांच तत्व परवान 3

काम क्रोध मद लोभ मोह तनै जीव के साथ लगाये क्यों
अहंकार नै जगत के प्राणी बुरी तरह लुटवाये क्यों
अंधे कोढ़ी बहरे गूंगे ये जीव नजर में आये क्यों

नीचै जल और ऊपर पृथ्वी कैसे इसे टिकाया है
ढूंढा घर ना मिला पवन का कहां पर इसे छुपाया है
रेतीला मैदान कहीं ऊँचा पर्वत लहराया है

सोना चांदी अभ्रक निकलै कहीं लोहे की खान हुई
पैट्रोल धरती से निकलै देख अक्ल हैरान हुई
एक भूमि जब रची एक नै तो क्यूं ना एक समान हुई

हँसते बोलते पता चलै ना ये जीव कहां रम जाता है
ले जावनिया कौन इसे और कहां से लेने आता है
धन्य प्रभु प्रभुताई तेरी ना भेद समझ में आता है
रतिराम ऐसा ना करता तो रटता ना तुझे जहान 4॥