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पंडित मनीराम जी खरकड़ा वाले

भगवती मुक्ति दे गति शुद्ध हो मति जती तेरी सती रटैं माला

धर शक्ति अवतार अपार शेष हजार फनों से गाई
रटैं आठों वसु खग पशु कला तेरी चहुं दिशुं में छाई
चंडी अखंडी ब्रह्मण्डी भुसण्डी मार्कण्डेय मुनी तेरा यश बरण्या ज्वाला 1।।

महिसासुर काज रहे असुर गाज जब साज शेर आई
पीकर मद प्याला ज्वाला नैन मतवाला हुया माई
काली कराली कुशाली संतन प्रथपाली चाली ठा कर में भाला 2।।

वध किया भगण नहीं दिया असुर सिर लिया काट छन में
मधु कैटभ हतन कर मथन कथन सुन गाई वेदन में
कालरात्रि सावित्री गायत्री जगत विथात्री वरदात्री करिये प्रथपाला 3।।

तेरा दिव्यरूप शोभा अनूप सुर भूप तुझे ध्यावैं
लख छवि अस्त हो रवि कवि यश महोर सिंह गावैं
मनीराम नाम रट आठों याम सुबह शाम काम पूर्ण हों तमाम कर खोलो घट ताला 4॥

श्री सतगुरु दीनदयाल को, हम प्रथम नमन करते हैं

श्री सतगुरु देवन के हैं देवा
करनी चहिये गुरुजी की सेवा
पार लगाते हैं गुरु खेवा
श्री सतगुरु रूप दिग्पाल को, हम उनका ही ध्यान धरते हैं

गुरु के बराबर नहीं कोई दूजा
करनी चाहिए गुरु पद पूजा
इनसे शबद ज्ञान का सूझा
गुरु काटैं भव के जाल को, गुरु पतितों का दुख हरते हैं

गुरु के बिना मिलै ज्ञान नहीं जी
ज्ञान बिना लगै ध्यान नहीं जी
ध्यान बिना मिलै मान नहीं जी
सतगुरु लखाते उस ताल को, जहां जन्म जीव मरते हैं

विघ्नों के विनाशक सुखदायक गुरु हैं गणेश
सृष्टि के वो कर्ता ब्रह्मा आप गुरू हैं दिनेश
पालना के करने वाले विष्णुजी का धरते भेष

देवों के देव महादेव गुरु हैं महेश
गुरु पारब्रह्म और गुरु सचिदानंद शेष
जिनके ध्यान धरने सेती जनों के मिटते क्लेश

मण्डल है अखण्ड ज्योति जहां अनहद की
चराचर व्याप्त सीमा नहीं उस नद की
गुरु बिन लखावै कौन गति उस पद की

अविद्या अज्ञान मोह माया तीव्र अंधकार
ज्ञानंजन सला सेती खोलै गुरु चक्षु द्वार
ऐसे परम सतगुरुजी को नमन करते बारंबार

वेद शास्त्र पढ़ ले कथा जान ले पुराण की
गुरु बिन मिलै नहीं ताली तत्व ज्ञान की
तत्व ज्ञान में है कृपा गुरु की जबान की

जैसे रत्न धातुओं में महिमा पारस पाषाण की
बूटियों में संजीवनी रक्षा करती प्राण की
मनुष्यों में महिमा ऐसे गुरु भगवान की

भक्त ध्रुव प्रह्लाद पर सतगुरु जी ने कृपा करी
गुरु के प्रताप जपे जाप आप मिले हरी
अमर काया बना दई अचल पदवी मिली खरी

गुरु सम दाता नहीं याचक शिष्य के समान
तीन लोक संपदा को सतगुरु करते दान
धाम साल्हावास गुरु महोर सिंह से पाया ज्ञान
अपने अनुचर मनीलाल को, गुरु गुण से बदन भरते हैं

भजन दान बिन दुख दारीदर खोया ना जाता
इन हाथों से धरम करम बिन बोया ना जाता । टेक ।

बिना प्रलय के सुमेरू पर्वत पृथ्वी पर से चलै नहीं
बिन चेतन की सत्ता के तरुवर का पत्ता हिलै नहीं
कोटि प्रकाश करो सरोज वो बिन भानु के खिलै नहीं
कितने ग्रंथ पढो बेशक बिन विवेक मुक्ति मिलै नहीं
बिना छिद्र मणिया में सूत्र कभी पोया ना जाता

इस मन को जीते बिना जगत में होता नहीं जति देखो
बिन सत्संग में गए सठों की सुधरै नहीं मति देखो
योग अभ्यास बिन ब्रह्मरंध्र में जीव की नहीं गति देखो
आत्म ज्ञान बिन गुरु ज्ञान नहीं डटता एक रति देखो
बिना योग सुखमणा सेज में सोया ना जाता

बिन पंडित के सभा रिझै ना बिना कंठ हो गान नहीं
बिना व्याकरण पढ़े पंडित की होती शुद्ध जबान नहीं
वो बात सिद्ध नहीं हो सकती जिसका कोई प्रमान नहीं
बिना कसौटी सोने की हो खोटी खरी पिछान नहीं
बिन सत्संग के मन मैल कभी धोया ना जाता

ज्ञान बिना यो हृदय सूना मद बिन सूना हाथी
बिना कामिनी घर की शोभा होने ना पाती
पात बिना तरवर सूना और पुत्र बिना कुल ख्याति
मनीराम भगवान बिना कोई सच्चा ना साथी
गुरु बिना हृदय ज्ञान का दीपक जोया ना जाता

वेद की उक्ति कर प्रभु भक्ति मुक्तिपद पाना चहिए
कर उमंग सत्संग गंग में मल मलकै न्हाणा चहिए

लख चौरासी बार नरक में पड़-पड़ भोगे दुख महान
मानव जन्म मुक्तिद्वारा गर्भ मांह उपजा था ज्ञान
जन्म जन्म से करी विनती कब राजी होंगे भगवान
सुनी टेर करी मेहेर दयालु मानव शरीर मिला है आन
जान नफा नुकसान अरे इंसान ध्यान लाणा चहिए

मातपिता हैं जन्म के दाता इनकी प्रेम से सेवा कर
लक्ष्मी और विष्णु जानकर सदा चित चरणों में धर
गुरु गणेश गुरु महेश गुरु पारब्रह्म हैं पर्मेश्वर
पा सतगुर से ज्ञान ध्यान ला भवसिंधु से पार उतर
सुमर हरिहर श्रीधर रघुवर नर को गुण गाना चहिए

दिनचर्या कर रात्रिचर्या ब्रह्ममुहूर्त में उठकर जाग
शौचक्रिया स्नानादि से बाहर जाकै मल को त्याग
वेद नियम अनुकूल समय का न्यारा न्यारा बना विभाग
षटचक्रों का चिंतन करिये विषय भोग का तज अनुराग
लागै आग अंतर में दाग नहीं काया के आना चहिए

आठ पहर भज चार पहर भज चार पहर में भज दो याम
दो पहर में दो घड़ी भज ध्यान लगाकर सुबह और शाम
जप तप पूजा यज्ञ दान कुछ परोपकार का करिये काम
अवसर छुके पछतावैगा छूट जाएंगे घर और ग्राम
मनीराम मन थाम नाम रट धाम अचल जाना चहिए

जो पालन करती काया का वो माता कहलाती

समय समय ऋषियों ने प्यारा
वेद भेद किया न्यारा न्यारा
बनाया छ: दस चार अठारा
वो पूर्णब्रह्म की माया जिनका ना भेद श्रुति पाती 1॥

धरणी विद्या और गऊ माता
गंगा सम पापों की त्रात
परमारथ से है ये नाता
जो अंश धर्म जाया का उनके दिल अंदर भाती 2॥

चाणक्य ने जो निति बनाई
माता पांच वहां दर्शाई
जो व्यवहार सदा की वाही
वो शिक्षार्थ धर्म चाया का वेद में ऐसे दर्शाती 3॥

जिनकी कुटिल कूर है नीति
वो क्या करें इन्ही से प्रीति
मनिराम चल सत की रीति
अब फल बाहरी गुण गाया का ये श्वासा बीती जाती 4॥